राजा मोहन राय की जन्म जंयतीः जिन्होंने आधुनिक भारत की रखी नींव, समाज की कुरीतियों का ऐसे किए विरोध

राजा मोहन राय की जन्म जंयतीः भारतीय पुनर्जागरण के जनक और महान समाज सुधारक राजा राममोहन राय का आज जन्म जंयती वर्ष हैं। उनका जन्म 22 मई, 1772 को पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के राधानगर में हुआ था। उन्होंने सती प्रथा के उन्मूलन, बाल विवाह के विरोध और महिला शिक्षा के लिए लड़ाई लड़ी, साथ ही 1828 में ब्रह्म सभा की स्थापना की। उनका जीवन आधुनिक भारत की नींव रखने के लिए समर्पित था। उन्होने 1829 में सती प्रथा को गैरकानूनी घोषित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किए, मूर्तिपूजा व सामाजिक कुरीतियों का विरोध किए थें।

आधुनिक भारत के माने जाते है जनक

राजा राममोहन राय को भारतीय पुनर्जागरण का अग्रदूत और आधुनिक भारत का जनक माना जाता है, जिन्होंने 19वीं सदी में देश के अंदर फैली तमाम बुराईयों को विरोध किए और शैक्षिक एवं सामाजिक सुधारों की नींव रखी। राजा मोहन राय ऐसे विद्वानों में सुमार थें, जिन्हे बांग्ला, संस्कृत, फारसी, अरबी, अंग्रेजी सहित कई भाषाओं का न सिर्फ ज्ञान था बल्कि सभी भाषाओं के ज्ञाता थें। उनका निधन 27 सितंबर, 1833 को ब्रिस्टल इंग्लैंड में हुआ था।

सामाजिक सुधार

उन्होंने सती प्रथा के खिलाफ जोरदार आंदोलन चलाया, जिसके परिणामस्वरूप 1829 में इसे अवैध घोषित किया गया। उन्होंने बाल विवाह, बहुविवाह और पर्दा प्रथा का कड़ा विरोध किया तथा विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया।

धार्मिक सुधार

उन्होंने एकेश्वरवाद (एक ईश्वर में विश्वास) पर जोर दिया और मूर्तिपूजा, कर्मकांडों तथा अंधविश्वासों की आलोचना की। उन्होंने 1814 में आत्मीय सभा और बाद में ब्रह्म समाज के माध्यम से हिंदू धर्म में सुधार का प्रयास किया।

नारी शिक्षा और अधिकार

मोहन राय ने महिलाओं की शिक्षा और उन्हें संपत्ति में समान अधिकार दिलाने के लिए पुरजोर वकालत की। उन्होंने भारत में आधुनिक शिक्षा (पाश्चात्य शिक्षा, विज्ञान) का समर्थन किया और हिंदी, बंगाली व फारसी में समाचार पत्र चलाकर जनजागरण किया।

राजा राममोहन राय की समाजशास्त्रीय दृष्टि

रीवा टीआरएस कॉलेज के प्रोफेसर समाज शास्त्री डॉक्टर अखिलेश शुक्ला ने अपने लेख के माध्यम से बताया कि भारत के सामाजिक इतिहास में राजा राममोहन राय का योगदान अत्यंत प्रेरणादायक और क्रांतिकारी माना जाता है। 22 मई 1772 को बंगाल के राधानगर गांव में जन्मे राजा राममोहन राय ने भारतीय समाज को अंधविश्वास, कुरीतियों और सामाजिक असमानताओं से मुक्त कराने के लिए आजीवन संघर्ष किया। उन्हें आधुनिक भारत का जनक और भारतीय पुनर्जागरण का अग्रदूत कहा जाता है। क्योकि उस समय समाज सती प्रथा, बाल विवाह, जातिवाद और महिलाओं के प्रति अन्याय जैसी अनेक बुराइयों से घिरा हुआ था। राजा राममोहन राय ने इन कुरीतियों का साहसपूर्वक विरोध किया और समाज को नई सोच प्रदान की।

समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण

समाज शास्त्रीय श्री शुक्ल लिखते है कि उनका समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण परंपरा और आधुनिकता के संतुलन पर आधारित था। वे भारतीय संस्कृति का सम्मान करते थे, लेकिन उन परंपराओं को स्वीकार नहीं करते थे जो मानवता और समानता के विरुद्ध थीं। उन्होंने महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए ऐतिहासिक आंदोलन चलाया, जिसके परिणामस्वरूप 1829 में सती प्रथा को गैर-कानूनी घोषित किया गया। 1828 में स्थापित ब्रह्म समाज ने सामाजिक सुधार, धार्मिक सहिष्णुता और तर्कशीलता की भावना को मजबूत किया। वे शिक्षा, वैज्ञानिक सोच और स्वतंत्र पत्रकारिता को समाज परिवर्तन का सबसे प्रभावी माध्यम मानते थे।

युवाओे के लिए प्रेरणा

डॉक्टर अखिलेश शुक्ला ने कहा कि आज के युवाओं के लिए राजा राममोहन राय का जीवन एक प्रेरणा है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि एक जागरूक और शिक्षित व्यक्ति पूरे समाज की दिशा बदल सकता है। वर्तमान समय में युवाओं को उनके विचारों से प्रेरणा लेकर सामाजिक जिम्मेदारी, मानवता, समानता और वैज्ञानिक सोच को अपनाना चाहिए। राजा राममोहन राय का जीवन हमें यह संदेश देता है कि सच्ची आधुनिकता वही है, जो समाज को प्रगतिशील, न्यायपूर्ण और मानवीय बनाए। उनकी जन्म जयंती केवल स्मरण का अवसर नहीं, बल्कि समाज सुधार और राष्ट्र निर्माण के लिए प्रेरणा लेने का भी दिन है।

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