राजा भोज ने भोजशाला का करवाया था निर्माण, अलाउद्दीन खिलजी ने पहुचाया नुकसान, कोर्ट के फैसले से जश्न

धार। मध्य प्रदेश के धार जिला स्थित ऐतिहासिक भोजशाला का निर्माण परमार वंश के प्रतापी राजा भोज (1010-1053 ईस्वी) ने करवाया था। इसे ज्ञान और कला के केंद्र के रूप में स्थापित किया गया था, जो मुख्य रूप से देवी सरस्वती का मंदिर और एक संस्कृत विद्यापीठ (गुरुकुल) थी।

क्या कहता है इतिहास

भारतीय इतिहास में परमारवंशीय राजा भोजदेव यानि की राजा भोज का नाम बड़े ही सम्मान के साथ लिया जाता है। राजा भोज का शासनकाल 1000 से 1055 ई. तक रहा। वे मालवा स्थित उज्जयिनी (अब उज्जैन) के महान राजा विक्रमादित्य की वंश परंपरा के 11वें राजा थे। राजा भोज के शासनकाल के पूर्व यहां की राजधानी उज्जयिनी हुआ करती थी, जिसे राजा भोज ने अपने शासन काल के दौरान धार में स्थानांतरित कर दिया था।

देश-विदेश से पढ़ने आते थे छात्र

राजा भोज चूंकि कला एवं शिक्षा के रक्षक थे, इसलिए उन्होंने अपने शासनकाल में कई जगहों पर ‘भोजशालाओं’ की स्थापना की। उनमें धार स्थित भोजशाला विश्वविख्यात है। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है कि भोजशाला दो शब्दों से मिलकर बना है- भोज एवं शाला। अर्थात् राजा भोज द्वारा स्थापित शाला। मगर यह केवल बच्चों की शाला नहीं थी, बल्कि एक असाधारण विश्वविद्यालय था, जहां अध्ययन के लिए देश-विदेश से भी छात्र आया करते थे।

अलाउद्दीन खिलजी ने पहुचाया नुकसान

14वीं सदी में धार स्थित भोजशाला पर अलाउद्दीन खिलजी ने हमला किया था. अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल में भोजशाला की संरचनाओं को नुकसान पहुंचाया गया. भोजशाला में परिवर्तन शुरू कर दिया गया इसके बाद 14वीं सदी के बाद दिलावर खान घोरी ने भोजशाला परिसर के हिस्से में एक मस्जिद बना दी. यह परिवर्तन बहुत ही छोटी जगह पर किया गया था. इसके बाद भी यह कई बार विवादों में रही है।

अब हुआ वाग्देवी मंदिर

हाईकोर्ट ने तथ्यों के आधार पर भोजशाला को वाग्देवी का मंदिर माना है और अब यह भोजशाला मंदिर के रूप में ही पूजी जाएगी। कोर्ट ने उस आदेश को भी निरस्त कर दिया है। जिसमें शुक्रवार को एवं त्यौहार के दिन मुस्लिम परिवार के लोग नमाज अदा कर सकते थे, यानि अब भोजशाला में नमाज नही पढ़ सकेगे। भोजशाला की लंदन में मौजूद बग्गादेवी मूर्ति को लाने के लिए विचार करने का निणर्य दिया है, ऐसे में लंदन से मूर्ति लाने का रास्ता साफ हो गया है। कोर्ट के इस फैसले के बाद भोजशाला एवं सनातनियों में जश्न का माहौल है और सदियों से चला आ रहा भोजशाला विवाद पर हाईकोर्ट ने विराम लगा दिया है।

भोजशाला के बारे में मुख्य तथ्य

मूल संरचना- इसे 11वीं सदी में मां सरस्वती (वाग्देवी) के मंदिर के रूप में बनवाया गया था, जिसे सरस्वती कंठाभरण भी कहा जाता था।
केंद्र- यह उस समय संस्कृत शिक्षा, काव्य और योग का एक प्रमुख विद्या केंद्र था।
विवाद और वर्तमान स्थिति- 14वीं शताब्दी के बाद इसे कमाल मौला मस्जिद में परिवर्तित कर दिया गया, लेकिन हिंदू पक्ष इसे मंदिर मानता है।
हाईकोर्ट का निर्णय- मई 2026 की नवीनतम रिपोर्टों के अनुसार, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने इसे मंदिर माना है और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अनुसार, यह सरस्वती मंदिर का ही एक प्राचीन स्थल है।

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