चित्रकूट। मध्यप्रदेश के सतना जिले और उत्तर प्रदेश की सीमा पर स्थित पाताल लोक जिसे विराध कुंड के नाम से जाना जाता है। यह एक पौराणिक स्थल है। विराध कुंड केवल एक कुंड नहीं, बल्कि रामायण काल की जीवंत स्मृति, आस्था की गहराई और प्रकृति के अनसुलझे रहस्यों का अद्भुत प्रतीक है। यह स्थल हमें न सिर्फ अपनी संस्कृति से जोड़ता है, बल्कि प्रकृति के प्रति संवेदनशील रहने का संदेश भी देता है।
रामनवमी पर्व पर पहुचते है श्रद्धालु
रामनवमी के पावन अवसर पर पाताल लोक यानि विराध कुंड न केवल श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र बन जाता है, बल्कि इतिहास, पौराणिकता और रहस्य का ऐसा संगम प्रस्तुत करता है, जो हर किसी को सोचने पर मजबूर कर देता है।
ऐसी है मान्यता
मान्यता है कि यहाँ भगवान राम-लक्ष्मण ने विराध राक्षस का वध कर उसे दफनाया था। यह घने जंगलों के बीच, जमुनिहाई गाँव के पास स्थित है। यह स्थल धार्मिक आस्था, प्राकृतिक सौंदर्य और प्राचीन इतिहास का संगम है, जो पर्यटकों और श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है।
विराध कुंड की विशेषताएं और मान्यताएंः
ऐतिहासिक संदर्भः कहा जाता है कि वनवास के दौरान श्री राम ने स्वयं इस कुंड को खोदा था।
रहस्यमयी गहराईः इस कुंड का पानी बेहद साफ है, लेकिन इसकी गहराई अज्ञात है, जिसे अब तक कोई नहीं माप पाया है।
विराध राक्षस का वधः पौराणिक कथाओं के अनुसार, विराध नामक राक्षस का उद्धार करने के बाद राम-लक्ष्मण ने उसे इसी स्थान पर दबाया था।
अन्य जानकारीः यह शबरी जलप्रपात के पास स्थित है और आसपास के क्षेत्र में रामायण काल से जुड़े अन्य स्थल भी हैं।
भगवान राम साढ़े 11 साल चित्रकूट में रहे
संस्कृति विभाग का मानना है कि भगवान राम अपने वनवास के दौरान साढ़े ग्यारह साल चित्रकूट में रहे थे. इसके बाद सतना, पन्ना, शहडोल, जबलपुर, विदिशा के वन क्षेत्रों से होकर दंडकारण्य चले गये थे. भगवान श्री राम नचना, भरहुत, उचेहरा, भेड़ाघाट एवं बांधवगढ़ होते हुए छत्तीसगढ़ गये थे. इन जिलों के नाम रामायण, पौराणिक ग्रंथों और व्यापक सर्वेक्षण के आधार पर निकाले गए।
सतना जिले के कई स्थानों से गुजरे थें भगवान राम
भगवान राम वनवास के दौरान सतना जिले के कई स्थानों से होकर गुजरे थे. उनमें सरभंगा आश्रम व सिद्धा पहाड़ भी था. रामचरित मानस के अरण्य कांड में सरभंगा आश्रम का जिक्र है. सरभंगा ऋषि के तपोबल से मंदाकिनी नदी का उद्गम यहां से हुआ. नदी के उद्गम स्थल को ब्रह्म कुण्ड कहा जाता है. इस कुण्ड में अस्थि विसर्जन भी किया जाता है. भगवान राम वनवास के दौरान अपने अनुज लक्ष्मण के साथ इस आश्रम में भी आए थे. रामचरित मानस के ही अनुसार भगवान राम जब चित्रकूट की ओर बढ़े, तो सिद्धा पहाड़ मिला, यह पहाड़ अस्थियों का था. तब राम को मुनियों ने बताया कि राक्षस कई मुनियों को खा गए हैं और यह अस्थियां उन्हीं मुनियों की हैं. भगवान राम ने यहीं पर राक्षसों के विनाश की प्रतिज्ञा लिए थें।
रामवन में किए थें विश्राम
चित्रकूट के पास ही सतना (मध्यप्रदेश) स्थित अत्रि ऋषि का आश्रम था। हालांकि अनुसूइया पति महर्षि अत्रि चित्रकूट के तपोवन में रहा करते थे, लेकिन सतना में ’रामवन’ नामक स्थान पर भी श्रीराम रुके थे, जहां ऋषि अत्रि आश्रम था।
अत्रि ऋषि का आश्रम
चित्रकूट के पास ही सतना मध्यप्रदेश स्थित अत्रि ऋषि का आश्रम था। महर्षि अत्रि चित्रकूट के तपोवन में रहा करते थे। वहां श्रीराम ने कुछ वक्त बिताया। अत्रि ऋषि ऋग्वेद के पंचम मंडल के द्रष्टा हैं। अत्रि ऋषि की पत्नी का नाम है अनुसूइया, जो दक्ष प्रजापति की चौबीस कन्याओं में से एक थी। अत्रि पत्नी अनुसूइया के तपोबल से ही भगीरथी गंगा की एक पवित्र धारा चित्रकूट में प्रविष्ट हुई और ‘मंदाकिनी’ नाम से प्रसिद्ध हुई।
