EPISODE 11: कृषि आश्रित समाज के भूले बिसरे मिट्टी के उपकरण य बर्तन FT. पद्मश्री बाबूलाल दहिया

पद्म श्री बाबूलाल दाहिया जी के संग्रहालय में संग्रहीत उपकरणों एवं बर्तनों की जानकारी की श्रृंखला में आज हम लेकर आए हैं , कृषि आश्रित समाज के भूले बिसरे मिट्टी के उपकरण या बर्तन (11वी किस्त) कल हमने मिट्टी शिल्पियों द्वारा बनाए जाने वाले पइना,मरका एवं तरछी की जानकारी दी थी।आज उसी श्रंखला में उन्ही शिल्पियों द्वारा निर्मित कुछ अन्य बर्तनों की जानकारी प्रस्तुत कर रहे हैं।

नाद

प्राचीन समय में जब गाय बैल हमारे परिवार के अंग जैसे हुआ करते थे तब नाद हर घरके लिए महत्वपूर्ण बर्तन थी। क्योकि पालतू पशुओं को उसी में पानी भर कर पिलाया जाता था। कुछ लोग तो गाय भैंस को नाद में ही रख कर भूसा सानी भी खिलाते थे. नाद को चाक में नही बनाया जाता था बल्कि उसके लिए एक अलग से मिट्टी का साँचा होता था जिसे जमीन में औंधा रख उसी में मिट्टी थोप कर बराबर कर दी जाती जो सूखने पर नाद हो जाती। बाद में उसे आबे में पका लिया जाता। अब पशुओं के घर से निकल जाने से नाद का बनना पूरी तरह समाप्त है। विकल्प के रूप में यदि बनती भी है तो इन दिनों एक सीमेन्ट की नाद भी आ गई है ।

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डहरी

डहरी आनाज रखने का एक बर्तन था जो नाद से बड़ा और आकार में 4 फीट ऊंचा कुठली की तरह बनाया जाता था। इसे भी दो खण्ड में सांचे से ढाल एक खण्ड में मोहड़ा बना दोनों को जोड़ दिया जाता और सूख जाने पर आबा में पका दिया जाता था। बस डहरी तैयार। पर टीन की कोठियां आजाने और पक्के मकान बन जाने के कारण डहरी अब पूरी तरह से चलन से बाहर है।

कूँड़ा

कूँड़ा ऊपर की ओर उभरा और नीचे सकरा एक ऐसा पात्र था जो बर्तन आदि साफ करने के लिए मजनोरा में पानी भर कर रखने के काम आता था। इसका दल लगभग 3 अंगुल मोटा होता था। यह दो प्रकार के और बनते थे। एक में कुम्हार अपने वर्तनों में लपेटने के लिए राख रखते थे और दूसरे को चर्मकार समुदाय के लोग अपना काम करते समय चमड़ा भिगोने के उपयोग में लाते थे।

नगड़िया की कूड़

प्राचीन समय में कृषि आश्रित समाज में नगड़िया का बहुत बड़ा महत्व था। क्योकि जैसे ही बसंत पंचमी आजाती तो फाग गायन शुरू हो जाता जिसकी बगैर नगड़िया कल्पना ही नही की जा सकती थी। क्योकि बसंत के मौसम में जहाँ हाड़ कंपाने वाली ठंडी समाप्त हो जाती है वही फागुन में घर में नया अनाज आकर परिवार में वह भी नई खुशियां ला देता था। नगड़िया दो ग्रामीण शिल्पियों के परिकल्पना का मूर्त रूप है।

  1. मिट्टी शिल्पी अपने हुनर से उसे घोट कर चिकनी कूंड़ बनाता और आबा में लगा धुंआ से पका उसका रंग काला कर देता। पर कुछ कूंड़ लाल भी रहती थीं।
  2. चर्म शिल्पी चमड़ा मढ़कर उसे मजबूत एवं अपनी बुनाई द्वारा कलात्मक बनाता। पर जैसे- जैसे इस लोक वाद्य की उपयोगिता समाप्त होती जा रही है मिट्टी शिल्पी भी इसे बनाना बन्द करते जा रहे हैं। नगड़िया से एक बड़े कूँड़ का वाद्य यंत्र भी होता था जो प्राचीन समय में युध्य काल में बजाया जाता था वह नगाड़ा कहलाता था। पर वह अब पूर्णतः चलन से बाहर है।

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