Death Anniversary Of M. Balamurali Krishna : ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा ‘राष्ट्रीय एकता की भावना लिए ये गीत जब टीवी पर आता था तो हर संगीत प्रेमी का ध्यान अपनी ओर खींच लेता था फिर चाहे वो इंसान किसी भी उम्र का हो, इस गीत में भारत की अलग-अलग बोलियों और संगीत में ढलकर कहा गया ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा’ और इसी गाने में जब कर्नाटक संगीत को दर्शाते तमिल बोल “इसैन्दाल नम्म इरुवरिन सुरमुम नमदक्कुम ,तिसै वॆरु आनालुम आऴि सेर,मुगिलाय मऴैयय पोऴिवदु पोल इसै ,नम इसै. ..” एम. बालामुरलीकृष्ण की दिलकश आवाज़ में हमारे कानो में पहुँचते हैं तो मानो रस घोल देते हैं।
जो इतने लोकप्रिय गायक और संगीतकार थे कि उनके सुरीले कंठ से निकले बोल हर किसी को समझ में आएँ न आएँ लेकिन इन बोलों में समाया संगीत का ताना-बाना हर किसी के दिल में ज़रूर उतर जाता है वो इसलिए भी कि बालमुरलीकृष्ण जी को गायन और वादन दोनों की अच्छी समझ थी और वो मृदंगम और वायलिन वादन में भी मास्टर थे यही नहीं वो बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे और अभिनय में भी पारंगत थे।
परिवार से मिला संगीत का परिवेश :-
एम. बालमुरलीकृष्ण ने सारी दुनिया में कर्नाटक संगीत को लोकप्रिय बनाने में अमूल्य योगदान दिया और भारतीय एकता और अखंडता के लिए कई गीत गाए। 6 जुलाई 1930 को आंध्र प्रदेश के संकरागुप्तम में जन्में एम बालमुरलीकृष्ण बचपन से ही संगीत में रूचि रखते थे क्योंकि संगीत की सुर लहरियाँ उनके आस-पास ही गूंजती थीं ,वो ऐसे कि पिता मंगल्लमपल्ली पट्टाभिरामय्या एक प्रसिद्ध बांसुरी वादक और संगीत के शिक्षक थे और माँ सूर्यकान्थम्मा एक वीणा वादक थीं लेकिन बालामुरलीकृष्ण जब छोटे थे तभी उनकी माँ गुज़र गईं थीं ,ऐसे में मुरलीकृष्ण को उनके पिता ने अकेले पाला और उनकी संगीत की लगन को देखते हुए श्री पारुपल्ली रामकृष्ण पंतुलू से संगीत सिखाया, जो संत त्यागराज की शिष्य परम्परा के सीधे वंशज थे। उनके मार्गदर्शन में बालामुरलीकृष्ण ने कर्नाटक संगीत सीखा।
नाम के आगे ‘बाला’ कैसे लगा :-
बालामुरलीकृष्ण ने महज़ 6 साल की उम्र से ही गाना शुरू कर दिया था ,आठ साल की उम्र में बालामुरलीकृष्ण ने विजयवाड़ा के त्यागराज आराधना में अपना पहला संपूर्ण संगीत कार्यक्रम पेश किया था और 15 साल की उम्र से ही कॉन्सर्ट में परफॉर्म करने लगे थे। ऐसे ही एक बार उन्हें परफॉर्म करते देख प्रतिष्ठित हरिकथा वाचक मुसनुरी सूर्यनारायण मूर्ति भागवतार बहोत प्रभावित हुए और मुरलीकृष्ण को “बाला”यानी बच्चा का उपसर्ग दिया जो उनके नाम के आगे हमेशा लगा रहा।
संगीत शिक्षा में स्कूल पीछे छूट गया :-
पंद्रह साल की उम्र तक वो सभी 72 मेलाकर्थ रागों में महारत हासिल कर चुके थे और उन्हीं में उन्होंने नई कृतियों की रचना की। जनक राग मंजरी 1952 में प्रकाशित हुई थी और इसे संगीता रिकॉर्डिंग कंपनी ने 9 खंडों की श्रृंखला में ‘रागानंगा रावली’ के नाम से रिकार्ड किया था। बालामुरलीकृष्ण जल्द ही अपनी प्रतिभा के दम पर प्रसिद्ध हो गये लेकिन धीरे -धीरे स्कूल की पढाई छुट गई पर वो संगीत में दिन ब दिन पारंगत होते चले गए और गाने के साथ-साथ, कंजीरा, मृदंगम, वाइला और वायलिन बजाने में भी महारत हासिल कर ली ,कई संगीत कार्यक्रमों में नित नए आयाम तय करते हुए दुनिया भर में क़रीब 25000 संगीत कार्यक्रम पेश किये।
फिल्मों में भी गीत गाए और अभिनय भी किया :-
शास्त्रीय संगीत के अलावा बालामुरलीकृष्ण ने तेलगू, कन्नड़, संस्कृत और तमिल सहित कई भाषाओं की फिल्मों में गाने गाए, यही नहीं कुछ तेलगू और तमिल फिल्मों में अभिनय भी किया। अभिनय की शुरुआत उन्होंने 1967 में आई तेलुगू फिल्म ‘भक्त प्रहलाद’ में नारद की भूमिका के साथ की थी और अपने लिए गीत भी गाये थे ,इसके अलावा कुछ और फिल्मों में भी काम किया। अपने गायन से क़रीब चार दशकों तक हमें मंत्रमुग्ध करने वाले बालमुरलीकृष्ण को सबसे ज़्यादा पसंद किया गया 1965 में आई शिवाजी गणेशन अभिनीत फिल्म ‘तिरूविलयादल’ में उनके तमिल गीत ‘ओरू नाल पोथुमा’ में।
बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे :-
बालमुरलीकृष्ण जी ने हिन्दुस्तानी घराने में भी शीर्ष संगीतकारों के साथ जुगलबंदी की और इसकी पहल उन्होंने पंडित भीमसेन जोशी के साथ की थी फिर पंडित हरिप्रसाद चौरसिया और किशोरी अमोनकर के साथ भी जुगलबंदी की जो देश भर में लोकप्रिय हुई। साथ ही उन्होंने श्री भद्राचल रामदास और श्री अन्नामाचार्य की संगीत रचनाओं को लोकप्रिय बनाने में अहम भूमिका निभाई , उनके गायन में सुर कौशल और शास्त्रीय संगीत के तालबद्ध पैटर्न का अनुपम मेल देखा जाता था और अपनी इस खूबी के साथ उन्होंने अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, इटली, फ्रांस, रूस, श्रीलंका, मलेशिया, सिंगापुर, मध्य पूर्व सहित कई देशों में अपनी गायन प्रस्तुतियाँ दीं ,यूँ तो उनकी मातृभाषा तेलुगू थी पर वो न केवल तेलुगू, बल्कि कन्नड़, संस्कृत, तमिल मलयालम, हिन्दी, बंगाली, पंजाबी ,सहित कई भाषाओं में गाते थे । उन्होंने फ्रेंच भाषा में भी गाया है और यहाँ तक कि मलेशियाई राजघराने के लिए आयोजित समारोह में अग्रणी कर्नाटक वाद्य शिक्षक श्री टी.एच.सुभाषचंद्रन के साथ जाज़ फ्यूजन में भी हाँथ आज़माया।
रचनाकार भी रहे :-
डॉ॰ बालामुरलीकृष्ण ने तेलुगु, संस्कृत और तमिल सहित विभिन्न भाषाओं में 400 से भी ज्यादा संगीत रचनाएं की हैं। उनकी रचनाएं, भक्ति संगीत से लेकर वर्णाम, कीर्थि, जवेली और थिलान तक हैं इसी कड़ी में उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है सभी मूलभूत 72 रागों में की गईं उनकी रचनाएं। गणपति, श्रावश्री, सुमुखम, लावंगी जैसे रागों का श्रेय उन्हें ही जाता है। उन्होंने जिन रागों का आविष्कार किया, वे उनकी नई सीमाओं की खोज का ही प्रतिनिधित्व करते हैं। उनके बनाये गये महाथी, लावंगी, सिद्धि, सुमुखम जैसे रागों में केवल चार नोट है, तो वहीं सर्व श्री, ओंकारी, गणपति, जैसे रागों में तीन ही नोट हैं।
ताल में भी किये नये प्रयोग :-
बालामुरलीकृष्ण जी ने ताल प्रणाली में भी कुछ नया किया और ताल की वर्तमान किड़यों के हिस्से “सा शब्द क्रिया” में “गति बेदम” शामिल किया और इस प्रकार ताल प्रणाली की एक नई श्रृंखला शुरू कर दी। संत अरुंगिरिनादर अपने प्रसिद्ध ‘थिरुपुगाज’ में ऐसी ही प्रणालियों को शामिल किया करते थे, लेकिन केवल संधाम के रूप में, जबकि बालामुरलीकृष्ण जी ऐसे संधामों को अंगम और परिभाषा के साथ एक तार्किक लय में ढालने के लिए अग्रणी संगीतकार के रूप में जाने जाते हैं। उन्होंने अपनी नई ताल प्रणाली को त्रि मुखी, पंचमुखी, सप्त मुखी और नव मुखी नाम दिये थे।
थिलान का विस्तार :-
जब उनकी संगीत रचनाओं की बात होती है, तो उनके थिलान खुद उनके गौरव की गाथा कहते हैं। बालामुरलीकृष्ण थिलान में संगथी का प्रवेश कराने के क्षेत्र में भी अग्रणी माने जाते हैं। थिल्लन कर्नाटक संगीत की एक शैली के अंतर्गत किया जाने वाला गायन है। ये भारतीय शास्त्रीय संगीत के ‘तराना’ जैसा है जो तेज़ गति का होता है और शब्दों से नहीं, बल्कि अर्थहीन ध्वनियों जैसे “ता ना धिम डेरे” से बना होता है। ये भी कहा गया कि बालामुरलीकृष्ण के रागों ने त्यागराज के प्रयास को चरमोत्कर्ष पर पहुँचाया। त्यागराज की एक और रचना ‘रंजानी’ आज एक सौ से अधिक कृतियों पर भारी है, जिनमें बालामुरलीकृष्ण की वंदे मातरम, आंदी मा तरम भी शामिल है।
सम्मानों की बात करें तो :–
वे एकमात्र कर्नाटक संगीतकार हैं, जिन्हें तीन राष्ट्रीय पुरस्कार -सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायक, सर्वश्रेष्ठ संगीतकार और सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक के रूप में मिले हैं। उन्हें कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाज़ा गया और भारत के तीनों पद्म पुरस्कार- पद्म विभूषण, पद्म भूषण और पद्म श्री से उन्हें सम्मानित किया गया। वे एकमात्र कर्नाटक संगीतकार हैं, जिन्हें फ्रांस सरकार की ओर से चेविलियर्स ऑफ द आर्डर डेस आर्ट्स एट डेस लेटर्स मिला था, इन सब के अलावा, उन्हें विभिन्न प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों की ओर से कई मानद डॉक्टरेट की उपाधियां भी प्रदान की गईं ,बालमुरलीकृष्ण जी 22 नवंबर 2016 को लम्बी बीमारी के बाद इस दुनिया से चले गए मगर संगीत प्रेमियों के दिलों में उनकी सुर लहरियाँ सदा विद्यमान रहेंगी और संगीत के विद्यार्थियों का मार्गदर्शन करेंगी।
