Makar Sankranti 2026 : इस त्योहार में क्यों कहते हैं खिचड़ी ? जानें पौराणिक कथा-धार्मिक महत्व और वैज्ञानिक कारण

Makar Sankranti 2026 : इस त्योहार में क्यों कहते हैं खिचड़ी ? जानें पौराणिक कथा-धार्मिक महत्व और वैज्ञानिक कारण-आखिर मकर संक्रांति पर क्यों खाई जाती है खिचड़ी ? जानें इसके पीछे की पौराणिक कथा, धार्मिक महत्व और वैज्ञानिक कारण भारत में मकर संक्रांति केवल एक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति, आस्था और जीवनशैली के संतुलन का प्रतीक मानी जाती है। वर्ष 2026 में मकर संक्रांति 14 जनवरी 2026 को मनाई जाएगी। इस दिन सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करता है और उत्तरायण काल का आरंभ होता है। शास्त्रों में उत्तरायण को देवताओं का दिन कहा गया है, इसलिए इस अवधि को दान, पुण्य और शुभ कार्यों के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है। मकर संक्रांति का नाम आते ही उत्तर भारत के कई हिस्सों में एक परंपरा स्वतः स्मरण में आती है-खिचड़ी बनाना, खाना और दान करना। यह परंपरा केवल स्वाद या सुविधा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे पौराणिक, ज्योतिषीय, स्वास्थ्य और सामाजिक कारण छिपे हुए हैं। आइए विस्तार से जानते हैं कि आखिर मकर संक्रांति पर खिचड़ी खाने की परंपरा क्यों बनी। मकर संक्रांति 2026 पर खिचड़ी खाने और दान करने की परंपरा क्यों है ? जानिए बाबा गोरखनाथ से जुड़ी पौराणिक कथा,ज्योतिषीय महत्व,स्वास्थ्य लाभ और सामाजिक संदेश।

आइए पहने जानें कौन हैं बाबा गोरखनाथ और कैसे हुआ खिचड़ी का शुभारम्भ

बाबा गोरखनाथ “नाथ” संप्रदाय के महान सिद्ध योगी और भगवान शिव के अवतार माने जाते हैं,जिन्होंने समाज में समरसता और सात्विक जीवनशैली का संदेश दिया। मान्यता और जनश्रुतियों के अनुसार-खिलजी के आक्रमण के समय सैनिकों और योगियों को जल्दी ऊर्जा देने के लिए उन्होंने दाल,चावल और मौसमी सब्जियों को एक साथ पकाकर सरल, पौष्टिक और ऊर्जादायक भोजन यानि खिचड़ी बनाने की परंपरा शुरू की, क्योंकि युद्धकाल में अलग-अलग भोजन पकाने का समय नहीं मिलता था और संयोगवश यह खिचड़ी पहली बार मकर संक्रांति के दिन बनी, जिसके बाद इस पर्व पर खिचड़ी खाने और बाबा गोरखनाथ को चढ़ाने की परंपरा अब तक अनवरत चली आ रही है। ऐसी मान्यता और विश्वास से गोरखपुर के गोरखनाथ मंदिर में भव्य मेले की शुरुआत हुई,जहां खिचड़ी का प्रसाद चढ़ाया जाता है जो कोई व्यंजन नहीं बल्कि आस्था का प्रतिक है और तब से लेकर अभी तक श्रद्धालु मकर संक्रांति पर उन्हें खिचड़ी अर्पित करते हैं।

बाबा गोरखनाथ से जुड़ी पौराणिक कथा से जुड़ा एक यह भी तथ्य

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार,मकर संक्रांति पर खिचड़ी खाने की परंपरा का संबंध योगीराज बाबा गोरखनाथ से जोड़ा जाता है। कथाओं के अनुसार,एक समय योगियों और साधुओं को कठिन परिस्थितियों, ठंड और असुरक्षा के कारण नियमित भोजन बनाना कठिन हो गया था। ऐसे समय में बाबा गोरखनाथ ने दाल, चावल और मौसमी सब्जियों को एक साथ पकाने की सलाह दी। यह भोजन जल्दी बन जाता था लंबे समय तक ऊर्जा देता था ठंड में शरीर को गर्म रखता था धीरे-धीरे यह साधु-संतों का भोजन बना और फिर समाज के सामान्य लोगों तक पहुंचा। कालांतर में मकर संक्रांति जैसे पुण्य पर्व से इसका संबंध जुड़ गया और इस दिन खिचड़ी बनाना व दान करना शुभ माना जाने लगा।

ज्योतिषीय और धार्मिक दृष्टि से खिचड़ी का महत्व

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, मकर संक्रांति पर सूर्य का मकर राशि में प्रवेश ग्रहों की स्थिति में शुभ परिवर्तन का संकेत देता है। इस दिन किया गया दान कई गुना फल देता है। खिचड़ी में प्रयुक्त सामग्री जैसे चावल-दाल-घी मौसमी हरी सब्जियां इन सब को सात्विक आहार माना गया है। मान्यता है कि-खिचड़ी का दान करने से सूर्य दोष शांत होता है,शनि और राहु से जुड़े कष्ट कम होते हैं। जीवन में स्थिरता और सकारात्मकता आती है जबकि मौसम से तालमेल बैठाती खिचड़ी सर्दी की जकड़न से निजात दिलाने के लिए बनाने में सरल और खाने में सुपाच्य होती है इसी कारण लोग पवित्र स्नान के बाद खिचड़ी का दान करते हैं और फिर उसे प्रसाद रूप में ग्रहण करते हैं।

स्वास्थ्य की दृष्टि से क्यों उपयुक्त है खिचड़ी ?

मकर संक्रांति के समय ठंड अपने चरम पर होती है। ऐसे मौसम में खिचड़ी को आयुर्वेदिक रूप से श्रेष्ठ भोजन माना गया है।
खिचड़ी के स्वास्थ्य लाभ-हल्का और सुपाच्य भोजन,पाचन तंत्र को मजबूत करता है,ठंड में शरीर को ऊर्जा और ऊष्मा देता है
घी-वात दोष को संतुलित करता है। यही कारण है कि यह भोजन बुजुर्गों,बच्चों और रोगियों के लिए भी आदर्श माना जाता है।

सामाजिक और मानवीय संदेश

मकर संक्रांति पर खिचड़ी का दान केवल धार्मिक कर्म नहीं बल्कि सामाजिक समरसता का प्रतीक भी है। इस दिन जरूरतमंदों को भोजन, अनाज या सामग्री दान करने से सहयोग और करुणा की भावना बढ़ती है जिससे समाज में समानता और सेवा का संदेश जाता है। खिचड़ी सभी वर्गों के लिए समान रूप से उपलब्ध भोजन है, इसलिए यह समता और एकता का प्रतीक भी बन गई।

निष्कर्ष (Conclusion)-मकर संक्रांति पर खिचड़ी खाने और दान करने की परंपरा पौराणिक आस्था, ज्योतिषीय विश्वास, स्वास्थ्य विज्ञान और सामाजिक मूल्यों का सुंदर संगम है-यह परंपरा हमें सिखाती है कि साधारण भोजन भी महान संदेश दे सकता है,दान और संयम से जीवन में संतुलन आता है। प्रकृति के साथ तालमेल ही सच्चा उत्सव है इसीलिए मकर संक्रांति पर खिचड़ी केवल एक व्यंजन नहीं, बल्कि संस्कृति, करुणा और जीवन दर्शन का प्रतीक बन चुकी है जो मकर संक्रांति के पवन पर्व पर ज़रूर बनाई और खाई तो जाती ही है बल्कि इसके दान करने का भी सभावनापूर्ण विचार मन गया है।

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