मध्यप्रदेश। झाबुआ महोत्सव, जिसे मुख्य रूप से भगोरिया उत्सव के नाम से जाना जाता है, मध्य प्रदेश के झाबुआ और अलीराजपुर जिलों में होली से सात दिन पहले मनाया जाने वाला एक प्रमुख आदिवासी प्रेम और संस्कृति का महापर्व है। 2026 में, यह उत्साह का उत्सव 24 फरवरी से शुरू होकर सात दिनों तक चलेगा, जिसमें पारंपरिक ढोल-मांदल की थाप पर आदिवासी समाज लोक नृत्य करेगा। यह उत्सव आदिवासी संस्कृति, व्यापार और उमंग का एक अनूठा संगम है, जो सात दिनों तक पूरे क्षेत्र को उत्सव के माहौल में बदल देता है।
गांव लौटने लगे प्रवासी आदिवासी
यह उत्सव भील और गरासिया समुदायों द्वारा मनाया जाने वाला एक आदिवासी त्योहार है। यह मुख्य रूप से पश्चिमी मध्य प्रदेश और दक्षिणी राजस्थान में होली से पहले लगभग सात दिनों तक मनाया जाता है। भगोरिया उत्सव को लेकर आदिवासी अंचलों में उत्साह का माहौल है। जो लोग काम-धंधे के सिलसिले में अपने गांवों से बाहर गए थे, वे भी अब वापस लौटने लगे हैं। बाजारों में रंग-बिरंगी पारंपरिक वेशभूषा और सजावट की तैयारी दिखाई देने लगी है।

ऐसे होता है उत्सव
भगोरिया हाट साप्ताहिक बाजार की तरह आयोजित होते हैं, लेकिन इनमें आदिवासी संस्कृति, परंपरा और लोकजीवन की विशेष झलक देखने को मिलती है। मध्यप्रदेश और गुजरात के सीमावर्ती क्षेत्रों के साथ-साथ अंदरूनी आदिवासी गांवों में भी यह उत्सव धूमधाम से मनाया जाता है। यह पर्व आज भी आदिवासी समाज की पुरानी परंपराओं को जीवित रखे हुए है।
भगोरिया उत्सव की मुख्य बातें
समय और अवधि- होली से सात दिन पहले शुरू होता है। 2026 में, इसकी शुरुआत 24 फरवरी से हो रही है।
सांस्कृतिक महत्व- यह भील, भिलाला और पटलिया जनजाति का मुख्य त्योहार है, जो फसल कटाई की खुशी में मनाया जाता है।
हाट बाजार- इस दौरान आदिवासी गांवों में 35 से अधिक विशेष हाट (बाजार) लगते हैं, जहां से लोग होली की खरीदारी करते हैं।
प्रेम का त्योहार- इसे श्जीवन और प्रेम का उत्सवश् भी कहा जाता है, जहां युवा अपना साथी चुनते हैं।
आकर्षण- रंग-बिरंगे पारंपरिक वस्त्र, मांदल और बांसुरी की धुन पर लोक नृत्य, और महुआ का रस इस उत्सव का विशेष आकर्षण होते हैं।
