Is Avimukteshwaranand Really A Shankaracharya: प्रयागराज माघ मेले में योगी की पुलिस ने शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद और उनके शिष्यों सहित बुजुर्ग सन्यासियों के साथ जो हरकत की उससे हिन्दू और हिन्दू संगठन हैरान है. किसी ने यह उम्मीद नहीं कि थी कि जिस राज्य के मुख्य मंत्री खुद एक सन्यासी और सनातन धर्म को मानाने वाले हैं उनकी पुलिस साधुओं को सिर्फ इस लिए पीट-पीटकर ICU पहुंचा देगी। अपनी इस घटिया करतूत पर माफ़ी मांगने की जगह मेला प्रशासन और पुलिस ने शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद को उनके शंकराचार्य होने का सबूत पेश करने चुनौती देदी है. माघ मेला प्रबंधन समिति ने अविमुक्तेश्वरानंद के कैंप के बाहर नोटिस चस्पा करते हुए पुछा है कि आपको शंकराचार्य किसने घोषित किया? जबकि मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है और कोई फैसला नहीं हुआ है.
सवाल ये है कि जब शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद महाकुंभ में आए थे तब किसी सरकार या मेला प्रबंधन ने उनसे यह सवाल नहीं किया था, जब शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद अंबानी के बेटे की शादी में गए और पीएम मोदी ने उनका आशीर्वाद लिया तब भी किसी ने उनके शंकराचार्य होने पर संदेह नहीं किया मगर योगी सरकार उनसे पूछ रही है कि उनको शंकराचार्य किसने बना दिया? आइये इस सवाल का जवाब जानते हैं।
क्या अविमुक्तेश्वरानंद शंकराचार्य हैं?
अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती (Swami Avimukteshwaranand Saraswati) को ज्योतिर्मठ (Jyotirmath) का शंकराचार्य मानने का विवाद लंबे समय से चल रहा है। वर्तमान स्थिति में उनका शंकराचार्य पद वैधानिक रूप से मान्य नहीं है। वे कानूनी रूप से ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य नहीं माने जाते। अक्टूबर 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने उनके “पट्टाभिषेक” पर रोक लगा दी थी। कोर्ट ने कहा कि स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती की वसीयत और उत्तराधिकार का मामला अभी विचाराधीन है। प्रयागराज मेला प्राधिकरण ने जनवरी 2026 में नोटिस जारी किया कि वे शंकराचार्य नहीं हैं और सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना कर रहे हैं। शंकराचार्य परिषद और कई अखाड़ों (जैसे निरंजनी अखाड़ा) ने उनकी नियुक्ति को नियमों के खिलाफ बताया। कई अन्य शंकराचार्य (द्वारका, पुरी, श्रृंगेरी) ने उनकी नियुक्ति को स्वीकार नहीं किया। वे खुद को ज्योतिर्मठ का शंकराचार्य बताते हैं और कई जगहों पर इस टाइटल का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन यह कानूनी रूप से विवादास्पद और अमान्य है।
अविमुक्तेश्वरानंद शंकराचार्य क्यों नहीं हैं?
ज्योतिर्मठ की परंपरा और नियमों के अनुसार शंकराचार्य की नियुक्ति में चारों पीठों (ज्योतिर्मठ, द्वारका, पुरी, श्रृंगेरी) की सहमति और वैधानिक प्रक्रिया जरूरी है। स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती की मृत्यु (2022) के बाद उनकी वसीयत और उत्तराधिकार पर विवाद है। कई संन्यासी अखाड़ों और शंकराचार्यों ने उनकी नियुक्ति को अवैध बताया। सुप्रीम कोर्ट ने स्टे लगाया, इसलिए वे कानूनी रूप से पद पर आसीन नहीं हैं।
अविमुक्तेश्वरानंद खुद को शंकराचार्य क्यों मानते हैं?
वे स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के शिष्य थे और 2022 में स्वरूपानंद की वसीयत के आधार पर उन्हें ज्योतिर्मठ का शंकराचार्य घोषित किया गया था। लेकिन यह घोषणा कोर्ट में चुनौती दी गई और स्टे लग गया। वे कई जगहों पर इस टाइटल का इस्तेमाल करते हैं और अपने समर्थकों के बीच लोकप्रिय हैं, लेकिन कानूनी मान्यता नहीं है।
लेकिन भले ही अविमुक्तेश्वरानंद के शंकराचार्य होने के केस कोर्ट में पेंडिंग है लेकिन इसका ये मतलब नहीं हो जाता है कि पुलिस उनका अपमान करे और उनके शिष्यों को पीटे। योगी पुलिस और प्रशासन की इस हरकत से देशभर के हिन्दुओं में आक्रोश है और माफ़ी की मांग जी जा रही है.
