वर्ष 1960 में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान के बीच कराची में ‘सिंधु जल संधि’ (Indus Waters Treaty – IWT) पर हस्ताक्षर किए गए थे। पिछले छह दशकों से अधिक समय तक इस संधि को दुनिया के सबसे सफल और लचीले जल-बंटवारा समझौतों में से एक माना जाता रहा। इसके तहत नदियों को दो हिस्सों में बांटा गया: पूर्वी नदियाँ (रावी, ब्यास और सतलज) भारत को मिलीं, और पश्चिमी नदियाँ (सिंधु, झेलम और चिनाब) मुख्य रूप से पाकिस्तान को आवंटित की गईं।
लेकिन आज, यानी वर्ष 2026 में, यह संधि अपने इतिहास के सबसे गंभीर रणनीतिक चौराहे पर खड़ी है। भारत ने इस संधि को ‘स्थगित’ (Abeyance) स्थिति में डाल दिया है। पाकिस्तान इस कदम के खिलाफ दुनिया भर के देशों, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) और अंतरराष्ट्रीय अदालतों के चक्कर काट रहा है, लेकिन उसका ‘विक्टिम कार्ड’ यानी पीड़ित बनने का दांव हर जगह बेअसर साबित हो रहा है।
पहलगाम आतंकी हमला (2025): जहाँ से बदला भारत का रुख
इस पूरे विवाद में निर्णायक मोड़ पिछले साल आया। 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम (बैसरण घाटी) में पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों ने एक क्रूर हमला किया, जिसमें 26 निर्दोष नागरिकों की जान चली गई। इस घटना ने भारत के धैर्य की सीमा को समाप्त कर दिया।
“पानी और खून एक साथ नहीं बह सकते”
पहलगाम हमले के ठीक अगले दिन, भारत की ‘कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी’ (CCS) ने एक अभूतपूर्व फैसला लेते हुए सिंधु जल संधि को तत्काल प्रभाव से स्थगित (Abeyance) करने की घोषणा कर दी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पुराने बयान “पानी और खून एक साथ नहीं बह सकते” को अमली जामा पहनाते हुए भारत ने साफ कर दिया कि तकनीकी सहयोग और आतंकवाद एक साथ नहीं चल सकते। भारत ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि जब तक पाकिस्तान अपनी धरती से सीमा पार आतंकवाद को “विश्वसनीय और अपरिवर्तनीय” रूप से बंद नहीं करता, तब तक यह संधि ठंडे बस्ते में ही रहेगी।
हेग (PCA) का फैसला और भारत का कड़ा रुख
पाकिस्तान ने इस स्थिति का फायदा उठाने के लिए अंतरराष्ट्रीय कानूनी मंचों का रुख किया। मई 2026 में हेग स्थित ‘स्थायी मध्यस्थता न्यायालय’ (Permanent Court of Arbitration – PCA) ने सिंधु नदी प्रणाली पर भारतीय जलविद्युत परियोजनाओं की जल-संग्रह क्षमता (Pondage) को लेकर एक फैसला सुनाया, जो पाकिस्तान के पक्ष में झुकता हुआ प्रतीत हो रहा था।
भारत ने क्यों खारिज किया मध्यस्थता न्यायालय का फैसला?
भारत ने बिना किसी झिझक के हेग की इस अदालत (PCA) के फैसले को पूरी तरह से खारिज कर दिया। भारत का रुख बेहद स्पष्ट और तार्किक है:
- अवैध गठन: भारत इस मध्यस्थता न्यायालय के गठन को ही ‘अवैध’ मानता है।
- संधि का निलंबन: चूंकि संधि 2025 के हमले के बाद से पहले ही स्थगित है, इसलिए इसके तहत किसी भी अदालती प्रक्रिया का कोई कानूनी आधार नहीं बचता।
समानांतर कानूनी प्रक्रियाओं का पाकिस्तानी खेल ध्वस्त
दरअसल, सिंधु जल संधि के विवादों को सुलझाने के दो तरीके हैं—पहला ‘न्यूट्रल एक्सपर्ट’ (Neutral Expert) और दूसरा ‘कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन’ (CoA)। भारत न्यूट्रल एक्सपर्ट की कार्यवाही में शामिल हो रहा था, लेकिन पाकिस्तान ने जानबूझकर समानांतर रूप से मध्यस्थता अदालत को भी सक्रिय कर दिया। भारत ने इस दोहरे खेल का पूर्ण बहिष्कार किया और विश्व बैंक को भी अपनी चिंताओं से अवगत कराया।
दुनिया के सामने क्यों बेअसर हुआ पाकिस्तान का ‘पीड़ित’ बनने का दांव?
पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार और वहां के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर लगातार पश्चिमी देशों और संयुक्त राष्ट्र में गुहार लगा रहे हैं कि भारत पानी को एक “हथियार” (Weaponisation of water) की तरह इस्तेमाल कर रहा है। यहाँ तक कि पाकिस्तानी सेना ने इसे “युद्ध की कार्रवाई” (Act of War) तक कह डाला। इसके बावजूद दुनिया ने पाकिस्तान की बात पर ध्यान नहीं दिया। इसके पीछे मुख्य रूप से तीन कारण हैं:
1. आतंकवाद को सरकारी नीति बनाना भारी पड़ा
अंतरराष्ट्रीय समुदाय अब भली-भांति समझता है कि पाकिस्तान एक तरफ भारत में आतंक की फंडिंग करता है और दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय नियमों की दुहाई देता है। कूटनीति में ‘पारस्परिकता’ (Reciprocity) का नियम चलता है। यदि आप पड़ोसी देश की सुरक्षा को खतरे में डालेंगे, तो आप उससे सद्भावना और संधि के पालन की उम्मीद नहीं रख सकते।
2. संप्रभुता बनाम संधि की शर्तों की गलत व्याख्या
हेंडरसन और पश्चिमी विचारकों के विश्लेषण के अनुसार, सिंधु जल संधि (Article II-2) केवल पानी के ‘उपयोग के आवंटन’ को नियंत्रित करती है, यह भारत की अपनी नदियों पर क्षेत्रीय संप्रभुता (Territorial Sovereignty) को खत्म नहीं करती। भारत पाकिस्तान का पानी पूरी तरह रोक नहीं रहा है, बल्कि वह पश्चिमी नदियों पर अपने वैध अधिकारों—जैसे जलविद्युत उत्पादन, भंडारण और सिंचाई परियोजनाओं (जैसे किशनगंगा और रतले परियोजना)—को गति दे रहा है।
3. वैश्विक विश्वसनीयता का न्यूनतम स्तर
वर्तमान में पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति बदहाल है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसकी साख अपने सबसे निचले स्तर पर है। जब कोई देश आर्थिक और रणनीतिक रूप से पूरी तरह दूसरों पर निर्भर हो, तो उसकी अलार्म बजाने वाली भाषा (जैसे परमाणु युद्ध या एक्ट ऑफ वॉर की धमकियां) को दुनिया गंभीरता से नहीं लेती।
पाकिस्तान के लिए क्यों ‘अस्तित्व का संकट’ बन गया है IWT का निलंबन?
सिंधु जल संधि का अधर में लटकना पाकिस्तान के लिए कोई मामूली बात नहीं है, यह उसके अस्तित्व से जुड़ा संकट है। इसे निम्नलिखित आंकड़ों और तथ्यों से समझा जा सकता है:
- कृषि पर निर्भरता: पाकिस्तान की जीडीपी (GDP) का लगभग 21% और देश का 45% रोजगार सीधे तौर पर कृषि क्षेत्र से आता है।
- सिंधु बेसिन का महत्व: पाकिस्तान की कुल कृषि भूमि का 80% से अधिक हिस्सा केवल सिंधु नदी तंत्र के पानी से सींचा जाता है।
- डेटा शेयरिंग बंद: संधि स्थगित होने के कारण भारत ने पाकिस्तान के साथ पानी के बहाव और बाढ़ से जुड़ा ‘रियल-टाइम डेटा’ साझा करना बंद कर दिया है। इससे पाकिस्तान में सूखे और अचानक आने वाली बाढ़ का खतरा कई गुना बढ़ गया है।
भारत अब पश्चिमी नदियों पर ‘रणबीर नहर’ के विस्तार और ‘चिनाब-ब्यास लिंक टनल’ जैसी परियोजनाओं पर तेजी से काम कर रहा है। भारत का उद्देश्य पाकिस्तान को सुखाना नहीं, बल्कि संधि के तहत अपने हिस्से के पानी का अधिकतम और सर्वोत्तम उपयोग करना है, जिसे उसने पिछले 60 सालों से केवल ‘सद्भावना’ के चलते छोड़ रखा था।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: सिंधु जल संधि (IWT) क्या है और यह कब हुई थी?
उत्तर: सिंधु जल संधि भारत और पाकिस्तान के बीच नदियों के पानी के बंटवारे को लेकर 1960 में हुआ एक समझौता है। इसकी मध्यस्थता विश्व बैंक ने की थी।
प्रश्न 2: भारत ने सिंधु जल संधि को क्यों स्थगित (Abeyance) किया है?
उत्तर: 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने कड़ा रुख अपनाते हुए संधि को स्थगित कर दिया। भारत का रुख है कि आतंकवाद और जल सहयोग साथ-साथ नहीं चल सकते।
प्रश्न 3: किशनगंगा और रतले परियोजनाएं क्या हैं और इन पर विवाद क्यों है?
उत्तर: किशनगंगा (झेलम की सहायक नदी पर 330 MW) और रतले (चिनाब नदी पर 850 MW) भारत की जलविद्युत परियोजनाएं हैं। पाकिस्तान इनके तकनीकी डिजाइन और जल-संग्रह क्षमता पर आपत्ति जताता रहा है, जबकि भारत इन्हें संधि के नियमों के भीतर बताता है।
प्रश्न 4: क्या भारत पाकिस्तान का पानी पूरी तरह से बंद कर सकता है?
उत्तर: भारत अंतरराष्ट्रीय कानूनों और अपनी जिम्मेदारियों के तहत पानी को पूरी तरह नहीं रोक रहा है। भारत केवल अपने हिस्से के पानी का अधिकतम उपयोग करने के लिए बुनियादी ढांचे का निर्माण कर रहा है, जो अब तक अधूरा था।
प्रश्न 5: हेग के मध्यस्थता न्यायालय (PCA) पर भारत का क्या स्टैंड है?
उत्तर: भारत ने हेग की अदालत के फैसले को अवैध और एकतरफा बताते हुए पूरी तरह खारिज कर दिया है, क्योंकि भारत केवल ‘न्यूट्रल एक्सपर्ट’ की द्विपक्षीय प्रक्रिया को ही वैध मानता है।
निष्कर्ष (Conclusion)
सिंधु जल संधि पर पाकिस्तान की वैश्विक अपील का फेल होना इस बात का प्रमाण है कि कूटनीति अब खोखली धमकियों से नहीं, बल्कि जमीनी हकीकतों और साख से तय होती है। भारत ने यह साफ कर दिया है कि वह अपनी सुरक्षा और संप्रभुता से कोई समझौता नहीं करेगा। पाकिस्तान के पास अब केवल एक ही रास्ता बचा है—वह आतंकवाद के ढांचे को पूरी तरह नष्ट करे और भारत के साथ द्विपक्षीय (Bilateral) मेज पर आकर सीधे बात करे, क्योंकि तीसरे पक्ष या अंतरराष्ट्रीय अदालतों का सहारा लेकर भारत को झुकाने का उसका दौर अब हमेशा के लिए खत्म हो चुका है।
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