History Of Socialism In Vindhya: भारत की आज़ादी के बाद जब पूरा देश लोकतंत्र की नई सुबह का स्वागत कर रहा था, तब विंध्य की धरती अपने अंदर एक और उबाल समेटे हुए थी, यहाँ स्वतंत्रता की लड़ाई केवल अंग्रेजी शासन से ही नहीं, बल्कि सामजिक असमानताओं और सामंती बेड़ियों से भी लड़ी जा रही थी। रीवा आजादी के बाद लोकतांत्रिक संघर्षों का अखाड़ा बनने वाला था, क्योंकि यहीं से निकले थे वे नौजवान, जिन्होंने सत्ता के गलियारे में समाजवाद की आवाज बुलंद करते हुए, उस दौर में नेहरू-गांधी के प्रभाव वाली कांग्रेस को चुनौती देते हुए, विंध्यप्रदेश को देश के राजनीति के केंद्र में ला दिया था। यह कहानी है रीवा के लोकतांत्रिक यात्रा को स्वर देने वाले समाजवाद की, जिसकी गूँज विंध्य क्षेत्र में ऊंचे महलों की दीवारों से लेकर गलियों में आमजनता तक सुनी जा सकती है।
कैसे हुआ कांग्रेस के भीतर समाजवादी विचारधारा का जन्म
दरसल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अंदर एक समाजवादी गुट था, जिसकी स्थापना 1934 में उन लोगों ने की थी जिन्हें महात्मा गांधी के आध्यात्मिक रहस्यवादी सोच और तर्क विरोधी विचार पसंद नहीं था, लेकिन इसके साथ ही यह कम्युनिस्ट पार्टी के रवैये से भी सहमत नहीं थे, जिसके फलस्वरूप इन्होंने कांग्रेस के अंदर ही एक सोशलिस्ट गुट की स्थापना की। जिसका उद्देश्य था एक विकेंद्रीकृत समाज, जहाँ आर्थिक शक्ति बड़े पूंजीवादियों के पास ही ना होकर- किसान, मजदूर, सहकारी समितियों और स्थानीय निकायों के पास भी हो, अर्थात सभी को बराबर हक और आर्थिक अधिकार मिले। इस गुट के प्रमुख नेता थे जयप्रकाश नारायण, आचार्य नरेंद्र देव, राममनोहर लोहिया और मीनू मसानी। आजादी के पूर्व तक यह दल कांग्रेस में ही रहा, पर आगे कांग्रेस नेतृत्व से मतभेदों के चलते हुए यह कांग्रेस से अलग हो गया।
विंध्य में सोशलिस्ट चेतना का उदय | History Of Socialism In Vindhya
विंध्य में भी कांग्रेस पार्टी के कुछ युवा कार्यकर्ता, इस सोशलिस्ट गुट से अत्यंत प्रभावित थे, ऐसे ही युवाओं ने 1946 में जगदीश चंद्र जोशी के नेतृत्व में कांग्रेस सोशलिस्ट की नींव यहाँ पर रखी थी। सोपा के राष्ट्रीय सचिव मोहनलाल गौतम ने इसे विधिवत मान्यता दी थी। जगदीशचंद्र जोशी के नेतृत्व में बने इस समाजवादी गुट में यमुना प्रसाद शास्त्री, कृष्णपाल सिंह, श्रीनिवास तिवारी, चंद्रप्रताप तिवारी, अच्युतानंद मिश्रा और शिवकुमार शर्मा शामिल थे।
विंध्य में सोशलिस्टों के उदय के क्या कारण थे
दरसल विंध्य के राजनीति में ये सोशलिस्ट दूसरी पीढ़ी का नेतृत्व कर रहे थे, सामान्य ग्रामीण परिवेशों से निकली वह पीढ़ी जो स्कूल और कॉलेज में पढ़ रही थी और उम्र के उस दौर से गुजर रही थी, जिसे तरुणाई कहते हैं। यह पीढ़ी कांग्रेस के राष्ट्रवादी विचारों से प्रभावित तो थी। लेकिन साथ ही यह रीवा में लोकप्रिय महाराज गुलाब सिंह के विरुद्ध ब्रिटिश सरकार के षडयंत्रो को और उससे होने वाली फजीहत को भी देख रही थी। इसके साथ ही राज्यभर में किसानों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी, पवाईदारों के शासन वाले रियासत के क्षेत्रों में पचास प्रतिशत किसान भूमि से बेदखल थे। चूंकि महाराज गुलाब सिंह द्वारा नए पवाई रूल्स लगाकर सामंतों को नियंत्रित करने का प्रयास किया गया था, इसके साथ ही उनकी सादगी और सामजिक सुधार के कई प्रयासों के कारण, इन तरुण युवाओं के मन में महाराज गुलाब सिंह के प्रति सहानभूति थी। ये सभी युवा रीवा के दरबार कॉलेज में पढ़ा करते थे, इन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था। लेकिन वैचारिक रूप से ये कांग्रेस के बुजुर्ग नेताओं से कई मामलों में असहमत होते थे।
महाराज गुलाब सिंह का प्रोत्साहन
इसके साथ ही महाराज गुलाब सिंह भी कांग्रेस के विरुद्ध इन युवाओं को प्रोत्साहित कर रहे थे, जैसे कि स्वयं जगदीश चंद्र जोशी ने कभी यह बात स्वीकार की थी, वह बराबर महाराज गुलाब सिंह से परामर्श लिया करते थे। इसीलिए ये युवा नेता महाराजा गुलाब सिंह के पक्षधर थे, जबकि दूसरी तरफ कांग्रेस के बुजुर्ग नेता राजप्रमुख मार्तंड सिंह के पक्षधर थे। तो अगर देखा जाए तो उस समय की राजनीति में भी राजमहल की केंद्रीय भूमिका थी।
भूमिहीन किसानों के लिए पहला आंदोलन
भारत छोड़ो आंदोलन के समय ये तरुण छात्र, महात्मा गांधी के एक आह्वान और पदमधर सिंह की शहादत से प्रभावित होकर आंदोलन में कूदे थे, चूंकि रीवा में भारत छोड़ो के समानांतर ही राजा बहोरा आंदोलन भी चल रहा था। इन समाजवादी गुट युवाओं ने जो पहला आंदोलन राज्यभर में किया था, वह था भूमिहीन किसानों और जमींदार उन्मूलन के लिए किया था, जिसके कारण तत्कालीन रीवा सरकार को टेनेंसी एक्ट में कुछ संशोधन करने पड़े थे। ये युवा समाजवादी पूरे राज्यभर के गांवों का पैदल ही भ्रमण करते हुए किसान और मजदूरों से मिलते थे। बताइए कांग्रेस में रहते हुए ही यह गुट अपनी ही सरकारों के विरुद्ध आवाज उठाता रहता था।
जगदीश चंद्र जोशी का नेतृत्व
देश की आजादी के बाद 3 जून 1948 को रीवा और बुंदेलखंड की 34 रियासतों को मिलाकर विंध्यप्रदेश का निर्माण हुआ और 10 जुलाई को कप्तान अवधेश प्रताप सिंह के नेतृत्व में यहाँ का मंत्रीमंडल बना, लेकिन कांग्रेस के समाजवादी गुट के युवा तुर्क इस मंत्रीमंडल के प्रखर विरोधी थे, जगदीश चंद्र जोशी उनके लीडर थे, जिनके पीछे युवाओं का हुजूम था, जिनके आदर्श जयप्रकाश नारायण थे।
लोहिया का आगमन और सोशलिस्ट राजनीति का उभार
दरसल महात्मा गांधी की हत्या के बाद ही मार्च 1948 में नासिक में हुए कांग्रेस सम्मेलन में, सोशलिस्टों ने कांग्रेस पार्टी छोड़ने का फैसला कर लिया था, और इसके साथ ही अब वह अपनी पार्टी का विस्तार चाहते थे, विंध्य में समाजवादी युवा तुर्कों के आंदोलनों ने केंद्रीय नेतृत्व को अत्यंत प्रभावित किया, यह भूमि उन्हें सोशलिस्ट राजनीति के अनुकूल लग रही थी, जिसके फलस्वरूप आजादी की पहली वर्षगांठ में ही राममनोहर लोहिया का यहाँ आगमन हुआ, उनके स्वागत में युवा छात्रों का हुजूम उमड़ पड़ा, इससे अभिभूत हो लोहिया जी ने यहाँ नारा दिया- “एक पाँव रेल में, एक पाँव जेल में”। 1949 में सोशलिस्टों का पटना में सम्मेलन हुआ। रीवा से जगदीश चंद्र जोशी, यमुना प्रसाद शास्त्री और श्रीनिवास तिवारी के नेतृत्व में सैकड़ों युवाओं का जत्था पटना रवाना हुआ, इस सम्मेलन के तुरंत बाद ही जोशी जी सोशलिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय कार्यसमिति में आ गए, जबकि उनकी उम्र उस समय चुनाव लड़ने की भी नहीं थी। इस सम्मेलन में रीवा के युवा तरुणाईयों को लोहिया, जयप्रकाश, अच्युतपटवर्धन और आचार्य नरेंद्र देव का मार्गदर्शन मिला और वे रीवा लौटकर दोगुने उत्साह के साथ सक्रिय हो गए।
विंध्य विलयन के विरुद्ध सोशलिस्टों का आंदोलन
लेकिन इसी बीच अवधेश प्रताप सिंह के नेतृत्व वाला मंत्रीमंडल महज दस माह ही चल सका, गृहमंत्री सरदार पटेल विंध्य प्रदेश को मध्यप्रांत में मिलने की धारणा बना चुके थे। किसानों की बेदखली के बाद समाजवादियों को एक नया मुद्दा मिल गया, रामनोहर लोहिया ने आंदोलन छेड़ने का निर्देश दिया, जिसके बाद 2 जनवरी 1950 को समाजवादियों ने विंध्य के विलयन के विरुद्ध आंदोलन छेड़ दिया, पहले ही दिन बस स्टैन्ड पर चक्का जाम करवाने आए युवाओं और पुलिस के मध्य झड़प हो गई, जिसके बाद हुए गोलीकांड में गंगा, चिंताली और अजीज, विंध्यप्रदेश के विलीनीकरण आंदोलन में शहीद हो गए। लिहाजा युवा भड़क गए और आंदोलन ज्यादा तीव्र हो गया। आंदोलन को लीड कर रहे जगदीश जोशी, यमुनाप्रसाद शास्त्री, श्रीनिवास तिवारी और अच्युतानंद मिश्रा जैसे नेताओं को गिरफ्तार करके रीवा के केंद्रीय जेल भेज दिया गया, लेकिन वहाँ के अधिकारियों से झड़प के बाद इन्हें मैहर जेल में शिफ्ट कर दिया गया।
रीवा में हिन्द किसान पंचायत
यह नेता लगभग दो महीने जेल में रहे, इसी बीच सोशलिस्ट पार्टी ने रीवा में किसान हिन्द पंचायत का आयोजन बुलाया था, जिसके बाद इन्हें मैहर जेल से उसी दिन रिहा किया गया जिस दिन आयोजन होने वाला था, सरकार की शायद यह मंशा थी, इनकी अनुपस्थिति में आयोजन की तैयारी कौन करेगा और आयोजन असफल हो जाएगा, लेकिन इसके उलट रीवा में हजारों की भीड़ निपनियाँ के सभा मैदान में इकट्ठी थी, और आयोजन शुरू हो चुका था, उसी समय मैहर जेल से छूट कर ये नेता जब सभा स्थल पहुंचे, तो राममनोहर लोहिया जी इन्हें देखकर जोर से चिल्लाए- जोशी, जमुना, श्रीनिवास, भीड़ बस इसी पल का इंतजार कर रही थी और हजारों की भीड़ जिंदाबाद, जिंदाबाद करते हुए इन नेताओं का अभिवादन करने लगी।
प्रथम आमचुनावों की तैयारी
दरसल समाजवादी युवाओं के इस जबरजस्त आंदोलन ने सरकार को विंध्य का विलय रोकने पर विवश कर दिया और विंध्यप्रदेश का अस्तित्व बरकरार रहा। लेकिन सरकार ने इसके पूर्ण राज्य की जगह केंद्रशासित प्रदेश का दर्जा दिया था। जिसके बाद समाजवादी नए नारे-“विंध्यप्रदेश बचाएंगे, धरणा सभा बनाएंगे” के साथ इस आंदोलन की तैयारी करने लगे इसी बीच देशभर में प्रथम आमचुनावों की घोषणा कर दी गई। इतिहास में पहली बार भारतीय जनता लोकतांत्रिक सरकार चुनने वाली थी। विंध्यप्रदेश में विधानसभा की 60 सीटें थीं, युवा समाजवादियों ने जोश के साथ चुनावों की तैयारी शुरू कर दी, एकतरफ कांग्रेस और उसके साधन सम्पन्न उम्मीदवार थे, तो दूसरी तरफ संसाधनविहीन सोशलिस्ट युवा राजनेता, लेकिन उसके बाद भी इन युवा तुर्कों ने कांग्रेस को जबरजस्त टक्कर दी, देश की आजादी की अगुआ और सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस को विंध्य में कड़े मुकाबले का सामना करना पड़ा।
विंध्य के प्रथम चुनाव में युवा समाजवादियों की चौंकाने वाली जीत
हालांकि लोकसभा के चुनावों में तो कांग्रेस को ही सफलता मिली, लेकिन 60 सदस्यीय विंध्य प्रदेश में 11 सीटें जीतकर सोशलिस्ट पार्टी सबसे बड़ा विपक्षी दल बनकर उभरा। जबकि 44 सीटें जीतकर कांग्रेस ने पंडित शंभूनाथ शुक्ल के नेतृत्व में सरकार बनाई। उस समय रीवा जिले में 11 विधानसभा सीटें हुआ करती थीं, जिसमें छः सीटें कांग्रेस ने जीतीं थीं, जबकि 3 सीटें सोपा ने, इस चुनाव में विंध्य की जनता ने युवा समाजवादियों को हाथों-हाथ लिया था, रीवा विधानसभा से जगदीश चंद्र जोशी और मनगवां से श्रीनिवास तिवारी विधायक बने, तिवारी जी ने तो बघेलखंड कमेटी के पहले अध्यक्ष और मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार लाल यादवेंद्र सिंह को चुनाव हराया था। जबकि इनके एक और प्रमुख साथी यमुना प्रसाद शास्त्री सिरमौर विधानसभा सीट से, हरौल साहब से चुनाव हार गए थे। सोचिए क्या अद्भुत चुनाव रहे होंगे, आज सोचकर भी मन रोमांचित हो उठता है। एक-दूसरे का बराबर सम्मान, कोई कटुता नहीं। सोपा के तीसरे विजेता मऊगंज आरक्षित सीट से साहदेई थे। बाकि सीटों में एक निर्दलीय और एक रामराज्य परिषद ने जीती थी, जबकि एक सीट किसान मजदूर पार्टी ने सिरमौर जीती थी, दरसल विंध्य में कांग्रेस के संस्थापक और कप्तान साहब के कैबिनेट मंत्री नर्मदा प्रसाद सिंह ने कांग्रेस छोड़कर आचार्य कृपलानी की मजदूर पार्टी ज्वाइन कर ली थी, वह मजदूर पार्टी के प्रदेशअध्यक्ष भी थे और सिरमौर सीट से विधायक चुने गए थे।
सीधी जिले में कांग्रेस की शर्मनाक हार
लेकिन समाजवादियों को सर्वाधिक सफलता मिली सीधी जिले में जब वहाँ से देवसर को छोड़कर जहाँ जनसंघ को जीत मिली थी। बाकि सभी विधानसभा सीटों में सोशलिस्टों को ही विजय मिली, जहाँ सिंगरौली विधानसभा से सुमित्री देवी और श्याम कार्तिक को विजय मिली, तो सीधी-मड़वास से चंद्रप्रताप तिवारी और दाढ़ी चुनाव जीते, चुरहट से जगत बहादुर सिंह और कनपुरा विधानसभा से भाईलाल मिश्र को जीत मिली थी। कांग्रेस के लिए यह बहुत बड़े झटके के समान था, वह इस जिले में अपना खाता तक नहीं खोल पाई थी। सोपा के ही टिकट पर शहडोल क्षेत्र के ब्योहारी से रामकिशोर शुक्ल भी विधायक चुने गए थे। विंध्यप्रदेश की जनता ने समाजवादियों को हाथों हाथ लिया था, चुनाव जीते श्रीनिवास तिवारी और जगदीश चंद्र जोशी तो 25 से कम उम्र का होकर चुनाव जीता था, जिसे हाईकोर्ट में चुनौती भी दी गई थी, चुनाव के बाद जगदीश चंद्र जोशी देश के इतिहास में सबसे कम उम्र के नेता प्रतिपक्ष बने।
सोपा–प्रसोपा का विलय और विंध्य में दो समाजवादी धड़े
लेकिन सोशलिस्ट राजनीति को धक्का तब लगा, जब आचार्य नरेंद्र देव और आचार्य कृपलानी चुनाव हार गए, जेपी और लोहिया ने चुनाव लड़ा ही नहीं था, इसके बाद 1953 में मध्यप्रांत के पचमढ़ी में सोपा के सम्मेलन में यह निर्णय लिया गया, समाजवाद की मजबूती के लिए, समान विचारधारा वाले दलों का आपस में विलयन कर दिया जाए, जिसके बाद आचार्य कृपलानी की कृषक मजदूर पार्टी का विलय सोपा में हो गया और सोपा बन गई प्रसोपा अर्थात प्रजा सोशलिस्ट पार्टी। अब एक मजेदार बात और देखिएगा, अब इस नई पार्टी के विंध्य इकाई के अध्यक्ष पता है कौन बने, हरौल नर्मदा प्रसाद सिंह, जिन्होंने रीवा में कांग्रेस की स्थापना में प्रमुख भूमिका निभाई थी। खैर यह भी वक्त और राजनीति की बात है। लेकिन जल्द ही 1955 में यह दल फिर से दो गुटों में बट गया। प्रसोपा के अध्यक्ष थे आचार्य नरेंद्र देव और और सोपा के थे, लोहिया जी। इस विघटन के बाद विंध्य में भी दो सोशलिस्ट गुट हो गए। प्रसोपा के यमुना प्रसाद शास्त्री और चंद्रप्रताप तिवारी, जबकि सोपा के जगदीश जोशी और श्रीनिवास तिवारी प्रमुख नेता थे।
विंध्य को बचाने के लिए समाजवादियों का अंतिम बड़ा संघर्ष
1956 में एक बार फिर से राज्यपुनर्गठन आयोग की सिफारिशों पर विंध्यप्रदेश का मध्यप्रदेश में विलयन का फैसला किया गया, जिसका सामाजवादियों ने विरोध करने का फैसला किया और इन्होंने सड़क से लेकर विधानसभा तक जबरजस्त लड़ाई लड़ी, लेकिन सरकार ने इस बार विंध्य विलय को ठान रखा था। परिणामस्वरूप विंध्य का विलय मध्यप्रदेश में हो गया, लेकिन समाजवादियों की धाक वहाँ भी कम नहीं हुई, जब प्रसोपा के चंद्रप्रताप तिवारी मध्यप्रदेश विधानसभा के नेताप्रतिपक्ष बने। इसके बाद विंध्य के समाजवादियों ने लोहिया के नेतृत्व में गोवा मुक्ति आंदोलन में बढ़-चढ़ के हिस्सा लिया था, शास्त्री जी की आँख इसी दौरान खराब हुई थी।
लोहिया के बाद समाजवादी राजनीति का अवसान
लेकिन पहले आचार्य नरेन्द्र देव और फिर 1967 में लोहिया के मृत्यु के बाद समाजवादी दल कमजोर हो चले थे, जेपी ने सक्रिय राजनीति से किनारा कर लिया था, लिहाजा समाजवादी बिखरने लगे थे, इसी बीच चंद्रशेखर जैसे युवा तुर्क समाजवादी के प्रभाव में आकर इंदिरा गांधी ने, कई ऐसे फैसले लिए जो सोशलिस्टों के अनुसार थे, जैसे बैंकों का एकीकरण, राजाओं के प्रिवी पर्स का खात्मा, जिसके बाद बहुत सारे समाजवादियों का रुझान कांग्रेस की तरफ हो गया, जगदीश जोशी और श्रीनिवास तिवारी के नेतृत्व में विंध्य के कई पुराने सोशलिस्ट कांग्रेस में चले गए, लेकिन शास्त्री जी बने रहे, जबकि कृष्णपाल सिंह और रामकिशोर शुक्ल पहले ही कांग्रेस में चले गए थे। 1975 में जेपी के नेतृत्व में चले पूर्ण स्वराज्य और आपातकाल के आंदोलन बाद शास्त्री जी दो बार लोकसभा पहुंचे, एक तरह से वह विंध्य में सोशलिस्ट राजनीति के आखिरी स्तम्भ थे। और उनके निधन के साथ ही समाजवादी राजनीति का भी अवसान हो गया। आज भले ही रीवा में कुछ गिनती के सोशलिस्ट कार्यकर्ता बचे हों, लेकिन कांग्रेस सरकार के विरुद्ध किए गए उनके संघर्ष आज भी याद किए जाते हैं।
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