विंध्य की जीवन रेखा Bansagar Dam बनने की कहानी

History Of Bansagar Dam In Hindi: बाणसागर परियोजना (Bansagar Project), जिसे विंध्य-बघेलखंड की जीवनरेखा कहा जाए तो गलत नहीं होगा। सोन नदी से निकलने वाली यह विशाल नदी अपने साथ अथाह जलप्रवाह लेकर करीब 780 किलोमीटर का सफर तय करते हुए आखिरकार गंगा में समा जाती है। लेकिन कभी किसी ने सोचा अगर इस बहते हुए पानी को रोक दिया जाए, तो यह सूखे इलाकों की प्यास बुझाने के साथ बिजली भी बना सकता है? इसी दूरदर्शी सोच ने बाणसागर बांध (Bansagar Dam) को जन्म दिया।

डिंबा की प्रेरणा से हुई बाणसागर की परिकल्पना

सोन नदी के विशाल जलप्रवाह को बांधने का सबसे पहला विचार रीवा राज्य के तत्कालीन महाराज गुलाब सिंह को आया था। कहा जाता है कि आज जहाँ बाणसागर बांध बना है, उस जगह को पहले गऊघाट कहा जाता था। यहीं डिंबा नाम का एक आदिवासी साधु रहता था। एक बार महाराज गुलाब सिंह जब इस क्षेत्र में आए, डिंबा उनसे मिला और उसने महाराज से ठेठ बघेली में कहा- तय राजा आहे, त बंधा बनवाय दे गउ घाट मा। यानी, तुम राजा हो, तो गऊघाट में बांध बनवा दो। जिसके बाद महाराज ने यहाँ बांध बनवाने के उद्देश्य से सर्वे कार्य प्रारंभ करवाया। इस कथा का एक दूसरा वर्जन भी मिलता है, जब रीवा राज्य के इंजीनियर यहाँ सर्वे इत्यादि का कार्य कर रहे थे, तो डिंबा आदिवासी द्वारा नदी के कम चौड़े पाट पर, नदी को बांधने का सुझाव देते हुए यह स्थान दिखाया गया था।

गउघाट की रोचक लोककथा

गउघाट नाम के पीछे भी एक रोचक लोककथा प्रचलित है। कहा जाता है कि कभी यहाँ एक गर्भिणी गाय प्रसव पीड़ा से लेटी थी। उसी समय दक्षिण दिशा से शोण नद प्रचंड वेग से आगे बढ़ रहे थे। गाय ने शोणभद्र से अपना मार्ग बदलने की प्रार्थना की। लोकविश्वास है कि दयालु शोणभद्र ने अपना रास्ता बदल लिया और ऊंचे कैमोर पर्वत को चीरते हुए अपेक्षाकृत सँकरे मार्ग से आगे बढ़ गए। तभी से यह स्थान गउघाट कहलाया। लेकिन अगर हम इस किस्से को नहीं भी माने, तो प्रतीत होता है सोन नदी के प्रवाह मार्ग में यहाँ कुछ बदलाव तो आया है। आज भी पुराने प्रवाह क्षेत्र के गाँवों में नदी की रेत नीचे मिलती है, जो इस बदलाव की ओर संकेत करती है। तो यहाँ बांध बनाना प्राकृतिक रूप से उपयुक्त था। लेकिन जो भी हो, यह तय है इस स्थल पर बांध बनाने की प्रेरणा डिंबा से ही मिली थी, इसीलिए प्रारंभ में इसका नाम डिंबा परियोजना रखा गया। लेकिन तब रीवा राज्य के पास परियोजना में लगने वाली लागत के लिए पर्याप्त धन, तकनीकी साधन और विशेषज्ञता का आभाव था। रियासत की परिस्थितियाँ भी अनुकूल नहीं थीं। इसलिए यह योजना आगे नहीं बढ़ सकी।

डॉ. के.एल. राव साहब के प्रयास से शुरू हुई परियोजना

लेकिन देश की आजादी के बाद जब विंध्यप्रदेश बना, तब यहां पंडित शंभूनाथ शुक्ल के नेतृत्व वाली सरकार ने, केंद्रीय जल आयोग के पास सोन नदी पर बांध बनाने का प्रस्ताव भेजा। जिसके बाद वर्ष 1956 में केंद्रीय जल आयोग ने पुनः डिंबा नाम की इस परियोजना पर कार्य प्रारंभ किया, लेकिन फिर भी इसकी प्रगति धीमी ही थी। लेकिन इस परियोजना को गति मिली वर्ष 1963 में, जब डॉ. के एल राव साहब देश के सिंचाई मंत्री बने। राव साहब खुद एक कुशल इंजीनियर थे और उन्हें भारत के आधुनिक सिंचाई प्रणाली का जनक माना जाता है, नागार्जुन सागर बांध के डिजाइनर भी वही थे। उन्होंने देश में लंबित कई नदी परियोजनाओं में रुचि ली। केंद्रीय जल आयोग ने सोन नदी के विशाल जल प्रवाह को संचित करके उसके उपयोग के उद्देश्य से एक बड़ी परियोजना की रूपरेखा तैयार की। इसके तीन प्रमुख लक्ष्य थे- सिंचाई, विद्युत उत्पादन और बाढ़ नियंत्रण। लेकिन अब चूंकि सोन नदी एक अंतर-राज्यीय नदी है, यह मध्यप्रदेश से निकलते हुए उत्तरप्रदेश और बिहार में भी प्रवाहित होती है। इसलिए उसके पानी का सही ढंग से बंटवारा एक बड़ी राजनीतिक और कानूनी चुनौती थी। इसीलिए बांध बनने से पहले तीनों राज्यों के मध्य सहमति होना जरूरी था, और जाहिर है ऐसे काम एक दिन में नहीं हो पाते हैं।

गोविंदनारायण सिंह के प्रयास से शुरू हुआ सर्वे कार्य

लेकिन वर्ष 1967 में जब गोविंद नारायण सिंह मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बने, तो उन्होंने इस परियोजना में गहरी रुचि ली, यह स्वाभाविक भी था, क्योंकि वह विंध्य क्षेत्र से संबंध रखते थे। उन्होंने राज्यों के आपसी सहमति बने बिना और केंद्र से स्वीकृति के बिना ही बाणसागर के लिए प्री-कंस्ट्रक्शन वर्क, जैसे-सर्वे इत्यादि के कार्य राज्य के खर्चे से प्रारंभ करवा दिए। गउघाट जहाँ आज बांध बना है, उसके पहले बांध बनाने के लिए एक सर्वे, सोन के प्रवाह मार्ग नीचे की तरफ, इस स्थान से तीस किलोमीटर दूर, शिकारगंज के पास स्थित चंद्रेह-भंवरसेन में भी किया गया। इस स्थान पर सोन और बनास नदियों के साथ ही बाण नाम का एक और जल स्त्रोत का संगम होता है। यह स्थान अपने इतिहास और प्राकृतिक सुंदरता के लिए भी प्रसिद्ध रहा है। माना जाता है- कन्नौज के प्रतापी राजा हर्षवर्धन के दरबारी, संस्कृत के महानतम गद्य लेखक बाणभट्ट का जन्म “प्रीतिकूट” नामक स्थान में हुआ था। जिसकी आधुनिक पहचान कुछ विद्वानों ने चंद्रेह-भंवरसेन से की है, मान्यता है बाणभट्ट ने यहीं सोन और बनास नदी के मनोहारी संगम पर बैठकर “कादम्बरी” की रचना की थी। फिर भी यहाँ बांध नहीं बन पाया क्योंकि यहाँ नदी के तल की चट्टानें भूवैज्ञानिक रूप से कमजोर थीं। जिससे पानी के रिसाव की समस्या बनी रहती, इसके साथ ही यहाँ एक भ्रमर पर्वत को छोड़कर कोई ज्यादा ऊंचे पहाड़ भी नहीं थी, इसीलिए यह स्थान तकनीकी दृष्टि से यह अनुपयुक्त था। गउघाट ही बांध के लिए सबसे उपयुक्त स्थान था।

बांध के नामकरण ‘बाणसागर’ की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

लेकिन बांध यहाँ भले ही नहीं बन पाया, लेकिन इसके नामकरण की एक प्रेरणा यहाँ से मिल गई। मुख्यमंत्री गोविंद नारायण सिंह जो बड़े विद्वान थे, वह इस नाम पर विचार कर रहे थे। सीधी जिले से संबंध रखने वाले सोशलिस्ट लीडर चंद्रप्रताप तिवारी ने सुझाव दिया इस बांध का नामकरण बाणभट्ट के नाम से बाणसागर रखा जाए, क्योंकि यह स्थान उनकी साधना स्थली रहा है। अपनी बात सिद्ध करने के लिए, उन्होंने बाणभट्ट द्वारा रचित हर्षचरित और कादंबरी जैसे ग्रंथों का सहारा लिया और उसमें वर्णित ऐतिहासिक भूगोल के आधार पर अपनी बात रखी। लेकिन प्रोजेक्ट से जुड़े अधिकारियों ने इस पर थोड़ी सी आपत्ति जताई, क्योंकि पुराने दस्तावेजों में इस परियोजना का नाम डिंबा था, जिसके कारण हो सकता है विश्वबैंक इत्यादि से प्राप्त होने वाली आर्थिक मदद में कुछ दिक्कत आए। लेकिन मुख्यमंत्री गोविंद नारायण सिंह जो खुद बड़े विद्वान थे, वह स्वतः ही इस नाम पर विचार कर रहे थे, चंद्रप्रताप जी के समर्थन के बाद, उन्होंने यह निश्चित कर लिया इस बांध का नाम बाणसागर होगा। तो आज जिस बाणसागर बांध को हम देखते हैं उसकी मूल परिकल्पना गोविंद नारायण सिंह जी ने ही की थी।

देवलोंद की भू-वैज्ञानिक विशेषताएँ

गउघाट अर्थात देवलोंद में बांध बनाने का प्रमुख आधार था इसकी भौगोलिक स्थिति। यहाँ आकर सोन नदी अपने प्रवाह मार्ग से एकदम अस्सी डिग्री टर्न लेती हुई ऊंचे कैमोर के पर्वत के बीच से बहती हुई आगे बढ़ती है। यह स्थान प्राकृतिक रूप से भी बांध बनाने के लिए अनुकूल था। साथ भू-वैज्ञानिकों ने पाया कि संरचनात्मक रूप से, यहां जमीन के नीचे मजबूत विंध्यन बलुआ पत्थर और दूसरी कठोर चट्टानों की परतें मौजूद थीं। ये चट्टानें इतनी मजबूत थीं कि एक विशाल बांध के भार और उसके पीछे जमा होने वाले पानी के भारी दबाव को संभाल सकती थीं। इंजीनियरों ने पाया कि देवलोंद में दो पहाड़ियों के बीच की अपेक्षाकृत तंग घाटी, वहां का मजबूत रॉक-बेड, यही विशेषता देवलोंद में बांध बनाने का प्रमुख आधार थी और निश्चित हुआ बांध यहीं बनेगा और इसका नाम होगा बाणसागर परियोजना।

त्रिपक्षीय समझौता और राज्यों के बीच लागत व जल हिस्सेदारी

बांध का स्थान तय हो जाने के बाद भी अब तक तीनों राज्यों के मध्य जल बंटवारे को लेकर बात हो रही थी। उत्तरप्रदेश और बिहार की अपनी चिंताएं थीं। दरसल बिहार में अंग्रेजों के समय में ही 1877 में सोन नदी से सिंचाई के लिए नहर प्रणाली काम कर रही थीं, जिसके लिए बिहार सरकार ने इंद्रपुरी बैराज का निर्माण करवाया था, उसे डर था मध्यप्रदेश में बांध बनने के कारण उसे पानी कम मिलेगा। इसी तरह उत्तरप्रदेश ने भी मध्यप्रदेश से सटे क्षेत्रों में सूखे से निपटने के लिए, सोन नदी पर उद्वहन सिंचाई की योजना बना रखी थी उसे भी यही डर था। लेकिन मध्यप्रदेश उदारता दिखाते हुए जल बंटवारे के लिए सहमत हो गया। जिसके बाद नई दिल्ली में 14 सितंबर 1973 को मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री पी. सी. सेठी, बिहार के मुख्यमंत्री अब्दुल गफ़ूर और उत्तर प्रदेश के राज्यपाल अकबर अली खान के मध्य एक ऐतिहासिक त्रिपक्षीय दस सूत्रीय समझौता हुआ, चूंकि यूपी में उस समय राष्ट्रपति शासन था इसीलिए उसका प्रतिनिधित्व वहाँ के तत्कालीन राज्यपाल ने किया था। समझौते के अनुसार बाणसागर परियोजना की लागत और जल हिस्सेदारी 2:1:1 के अनुपात में तय की गई। कुल 4 MAF अर्थात मिलियन एकड़-फीट पानी में से मध्य प्रदेश को 2 MAF, जबकि उत्तर प्रदेश और बिहार को 1-1 MAF हिस्सा निर्धारित हुआ। साथ ही परियोजना में आने वाली लागत भी इसी अनुपात में तय की गई। इस समझौते को करवाने में तत्कालीन सिंचाई मंत्री डॉ के. एल. राव साहब की भी बड़ी भूमिका रही।

बाणसागर कंट्रोल बोर्ड का गठन और निर्माण की रूपरेखा

इसके बाद वर्ष 1976 में तीनों राज्यों से परामर्श के बाद बाणसागर परियोजना के शीघ्र क्रियान्वयन के लिए बाणसागर कंट्रोल बोर्ड के गठन का निर्णय लिया गया। बोर्ड के अध्यक्ष देश के सिंचाई मंत्री, जबकि केंद्रीय विद्युत मंत्री, तथा तीनों राज्यों के मुख्यमंत्री, वित्त एवं सिंचाई मंत्री एवं मध्य प्रदेश के विद्युत मंत्री इसके सदस्य बनाए गए। तीनों राज्यों के मुख्यमंत्री बारी-बारी से एक-एक वर्ष के लिए उपाध्यक्ष बनेंगे, जिसकी शुरुआत मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री से होनी थी। साथ ही तय हुआ बांध का निर्माण कार्य मध्यप्रदेश सरकार द्वारा कंट्रोल बोर्ड के निर्देशन में करवाया जाएगा। लेकिन 18 नवंबर 1976 को इसमें संशोधन किया गया। इसके बाद बोर्ड की जिम्मेदारी केवल बांध के निर्माण तक सीमित कर दी गई, जबकि नहरों का निर्माण संबंधित राज्य सरकारों को अपने खर्च पर करवाना था।

मोरारजी देसाई ने रखी बांध की आधारशिला

इधर, आपातकाल के बाद 1977 के चुनाव में सत्ता परिवर्तन हुआ और जनता पार्टी की सरकार बनी। रीवा से यमुना प्रसाद शास्त्री सांसद चुने गए। उन्होंने मध्यप्रदेश सरकार के साथ मिलकर परियोजना का काम जल्द शुरू कराने के प्रयास किए। नतीजतन 14 मई 1978 को तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने बाणसागर परियोजना की आधारशिला रखी। राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद 20 मई को बाणसागर का मुख्यालय रीवा में बनाया गया, और उसी वर्ष अगस्त में योजना आयोग ने परियोजना के लिए प्रथम निवेश को मंजूरी दी, जिसके बाद निर्माण कार्य शुरू हुआ। वर्ष 1980 में मध्यप्रदेश में फिर सत्ता परिवर्तन हुआ और अर्जुन सिंह मुख्यमंत्री बने। इसी दौरान ब्यौहारी के पंडित रामकिशोर शुक्ल प्रदेश के वित्त मंत्री बने। उन्होंने बाणसागर परियोजना में विशेष रुचि लेते हुए यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया कि धन की कमी निर्माण में बाधा न बने। इसके लिए उन्होंने प्रत्येक पंचवर्षीय योजना में परियोजना के लिए आवश्यक धनराशि उपलब्ध कराने पर विशेष ध्यान दिया।

समय के साथ बढ़ती गई निर्माण लागत

प्रारंभ में इस बांध की अनुमानित लागत 91 करोड़ 32 लाख रुपये थी और निर्माण का लक्ष्य 10 वर्ष रखा गया था, यानि इसे 1988 में पूरा होना था। लेकिन वित्तीय समस्यायों, राज्यों के मध्य समन्वय की कुछ कमियों, भूमि अधिग्रहण में होने वाली देरी और कुछ तकनीकी कारणों से यह 18 वर्ष की देरी से 2006 में बन कर पूरी हुआ। निर्माण में देरी से लागत बढ़ने के कारण 1998 में इसकी संशोधित लागत अनुमानतः 1,054 करोड़ 96 लाख रुपये पहुंच गई। कैग की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2006 में इस परियोजना की लागत करीब 1251 करोड़ रुपये हो चुकी थी। उसी वर्ष देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई ने इसे 25 सितंबर 2006 को इस बहुउद्देशीय परियोजना का उद्घाटन करके इसे राष्ट्र को समर्पित कर दिया।

बांध निर्माण में कई तकनीकी चुनौतियाँ

बाणसागर का निर्माण समय कई तकनीकी चुनौतियां भी थीं। परियोजना में काम करने वाले इंजीनियर वी. टी. लोंढे के एक लेख के अनुसार- बांध की चिनाई, पानी के दबाव को नियंत्रित करने वाली संरचनाएं और ग्लेसिस कंक्रीट जैसे काम काफी चुनौतीपूर्ण थे। लेकिन इंजीनियरों और मजदूरों ने बड़ी मेहनत और कुशलता पूर्वक कार्य किया। बांध निर्माण की खास बात यहां उपलब्ध अच्छे गुणवत्ता के लगभग घनाकार बलुआ पत्थरों को बेहद सघन तरीके से जमाना था। जिसके लिए मजदूर 3/4 इंच की लोहे की छड़ों से गारे को हाथ से दबाकर और हिलाकर जमाते थे, ताकि पत्थरों के भीतर खाली जगह न बचे। नतीजा यह हुआ कि गारे की खपत भी सैद्धांतिक रूप से तय मात्रा 42 प्रतिशत ही रही, इससे ज्यादा नहीं हुआ। लेकिन प्रारंभ में केंद्रीय जल आयोग के अधिकारियों को इस बात पर आसानी से विश्वास नहीं हुआ। जब वे परियोजना का निरीक्षण करने पहुंचे, तो उन्होंने चिनाई में ड्रिल करके स्वयं इस बात की जांच की, लेकिन चिनाई लगभग पूरी तरह जल अभेद्य थी।

बाणसागर बांध की विशेषता

रीवा-अमरकंटक मार्ग में शहडोल और सतना अब मैहर जिले की सीमाओं में स्थित यह एक मैसेनरी डैम है, जो अपने आप में इस तरह का अनोखा बाँध है क्योंकि नदी यहाँ एकदम से 80डिग्री मुड़ती है, इसीलिए ऊपर की तरफ से देखने में यह नदी के प्रवाह के एकदम समानांतर दिखता है, और यही स्थिति उसे यूनिक बनाती है। बाणसागर बांध की ऊंचाई करीब 67 मीटर और लंबाई 1020 मीटर है। यह करीब 18 हजार 648 वर्ग किलोमीटर इलाके से आने वाले पानी को समेटता है। इसके पीछे बना जलाशय बहुत बड़ा है। जब जलभराव अपने पूरे निर्धारित स्तर अर्थात पीक लेवल तक पहुंचता है, तो यह बांध करीब 51 हजार 789 हेक्टेयर क्षेत्र में फैल जाता है। और इसमें कुल मिलाकर करीब 6 हजार 370 मिलियन घन मीटर पानी जमा हो सकता है। इसमें से लगभग 5 हजार 410 मिलियन घन मीटर पानी ऐसा है, जिसे जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल किया जा सकता है। वहीं, भारी बारिश या जलाशय में पानी का स्तर बढ़ने पर अतिरिक्त पानी को सुरक्षित तरीके से बाहर निकालने के लिए करीब 405 मीटर लंबा स्पिलवे बनाया गया है जिसमें 18 बड़े रेडियल गेट लगे हैं। मुख्य बांध में कंक्रीट के साथ ही इसके कुछ हिस्सों में रॉकफिल यानी पत्थर और मिट्टी से भी इस्तेमाल किया गया है।

चूना पत्थर खदानों को बचाना बड़ी चुनौती

बाणसागर बांध के निर्माण के दौरान एक बड़ी चुनौती भी आई। यह थी कटनी जिले के विजयराघवगढ़ की कुटेश्वर चूना पत्थर खदानों को लेकर, जो SAIL अर्थात स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया द्वारा वर्ष 1973 से संचालित हो रही थीं और देश के कई इस्पात संयंत्रों के लिए जरूरी चूना पत्थर उपलब्ध कराती थीं। लेकिन समस्या तब सामने आई, जब बाणसागर बांध को उसके पूरे जलस्तर तक भरने की योजना बनी। आकलन में पता चला कि इस लेवल में बांध का पानी पीछे फैलते हुए कुटेश्वर की खदानों तक पहुंच सकता है, जिससे उनके डूबने का खतरा था। इस स्थिति से निपटने के लिए खदान क्षेत्र के आसपास रिंग बांध बनाया गया, जिसका उद्देश्य था बांध के पानी को खदानों तक सीधे पहुंचने से रोकना। लेकिन इसके बाद भी एक नई समस्या आ गई, वर्ष 2006 में जब बाणसागर बांध में पानी भरना शुरू हुआ, तो जलस्तर बढ़ने के साथ खदानों के आसपास पानी का दबाव भी बढ़ने लगा। जिसके कारण रिंग बांध के नीचे से पानी रिसते हुए खदानों तक पहुँचने लगा। जिसके बाद खदानों को सुरक्षित रखने के लिए और इस रिसते हुए पानी को लगातार बाहर निकालने के लिए वहां भारी पंपिंग व्यवस्था करवाई गई।

बाणसागर परियोजना के प्रमुख उद्देश्य

इस परियोजना का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य सिंचाई है। इससे मध्य प्रदेश के पुराने रीवा, सीधी, सतना और शहडोल जिले में हर साल लगभग 2.49 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इसी उद्देश्य हेतु इससे कई नहर परियोजना को विकसित किया गया है, जिनमें- आरबीसी, भितरी, सिहावल, क्योटी, पूर्वा, बहुती, गुढ़-मऊगंज उद्वहन और त्योंथर प्रमुख हैं। वहीं उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर और प्रयागराज जिलों में लगभग 1.50 लाख हेक्टेयर और बिहार में पुराने सोन नदी-नहर तंत्र को व्यवस्थित करते हुए लगभग 0.94 लाख हेक्टेयर क्षेत्र की इसके साथ ही उसका दूसरा प्रमुख उद्देश्य विद्युत उत्पादन है। पूरी परियोजना में मध्यप्रदेश के चार जगहों देवलोंद, झिन्ना, सिलपरा में पावर हाउस बनाए गए हैं, जिनकी कुल उत्पादन क्षमता करीब 425 मेगावाट है। इनमें से सबसे बड़ा पावर प्लांट चचाई का है। बाद में यहाँ पर्यटन पर भी जोर दिया गया, इसमें निर्मित सरसी आईलैंड इसी योजना का विस्तार है। बाणसागर जलाशय का जलस्तर मानसून और सिंचाई की मांग के अनुसार घटता-बढ़ता रहता है, केंद्रीय जल आयोग इसके जलस्तर और उपलब्ध जल की नियमित निगरानी करता है।

बांध से विस्थापन, पुनर्वास और स्थानीय लोगों का संघर्ष

लेकिन साथ ही इस बांध के निर्माण के कारण कई सामाजिक और प्राकृतिक चुनौतियों का सामना भी करना पड़ा। बाणसागर बांध के निर्माण के कारण विंध्यक्षेत्र के रामनगर-ब्योहारी तहसीलों में बहुत बड़े पैमाने पर विस्थापन हुआ। इस बांध का कुल डूब क्षेत्र लगभग 58,408 हेक्टेयर है। जिसमें निजी कृषि भूमि के साथ-साथ वन और राजस्व भूमि भी शामिल थी। इससे सतना, शहडोल, कटनी और उमरिया जिले के कुल 336 गाँव प्रभावित हुए, जिसमें रामनगर और देवराजनगर सहित 79 गाँव पूरी तरह जलमग्न हो गए और 257 गाँव आंशिक रूप से प्रभावित हुए। बाणसागर नियंत्रण बोर्ड के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार इस परियोजना के कारण 23397 परिवारों के लगभग 1लाख 42 हजार लोगों को विस्थापन का सामना करना पड़ा। आंकड़ों के हिसाब से देखें तो यह सरदार सरोवर और हीराकुंड बांध के बाद देश का तीसरा बड़ा विस्थापन था। परियोजना से बतौर चीफ इंजीनियर जुड़े रहे एस. बी. सिंह परिहार बताते हैं, शायद यह ऐसी पहली परियोजना थी, जिसके विस्थापितों ने बांध के लिए अपना सब कुछ छोड़ दिया, वह रोते रहते थे पर खुश भी थे, न कोई विरोध प्रदर्शन न कोई आंदोलन। रोते थे अपनी जन्मभूमि, पुरखों का घर, अपनी यादों को लेकर, लेकिन खुशी थी बांध बनने की, जो विंध्य की तकदीर बदलने वाली थी। हालांकि सरकार द्वारा प्रभावितों के पुनर्वास के लिए भी कई कार्य किए गए। उनके लिए दो नए टाउन और 18 मॉडल गाँव बसाए गए। परियोजना के विस्थापितों को पुनर्वास के लिए मुआवजा, कृषि योग्य भूमि, आवास व अन्य जीवन उपयोगी सुविधाओं का वितरण किया गया, लेकिन मुआवजे और पुनर्वास की धीमी प्रगति पर इसकी बहुत आलोचना भी हुई। पारिवारिक विस्थापन के साथ ही, वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास भी प्रभावित हुए। वन्य पशुओं, पक्षियों और गाय-भैंस इत्यादि विचरण क्षेत्र भी डूब गया क्योंकि हजारों हेक्टेयर वन भूमि और हरी-भरी वनस्पतियां हमेशा के लिए जलमग्न हो गईं।

कई वादे अभी अधूरे

बाणसागर बांध के लोकार्पण को आज 20 वर्ष पूरे हो चुके हैं। इस परियोजना में बतौर चीफ इंजीनियर काम कर चुके एस. बी. सिंह जी बताते हैं कि अकेले मध्यप्रदेश को अब तक इस बांध से इतना लाभ मिल चुका है कि इसकी पूरी निर्माण लागत की भरपाई हो चुकी है। लेकिन बावजूद इसके परियोजना के निर्माण के साथ ही कई वायदे किए गए थे जो अब तक पूरे नहीं किए गए। जिसमें मुख्यतः तीनों राज्यों के सहयोग से इस बांध के प्रभावितों के लिए बाणसागर विस्थापित कल्याण कोष बनाने का, पर अब तक इसके लिए कोई कार्य नहीं किया गया। भू-कंपीय अध्ययन के लिए बांध क्षेत्र में पांच सिसमोग्राफ यंत्र लगाने का भी प्रस्ताव था जिस पर अभी कोई कार्य नहीं किया गया है, बांध की सुरक्षा की दृष्टि से यहाँ सीआईएसएफ के जवानों की तैनाती का भी प्रस्ताव था, लेकिन उस पर भी अभी कोई ठोस कार्य नहीं हुआ है। बांध को सिल्टेशन अर्थात गाद से बचाने और स्लोप स्टेबिलाइज़ेशन के लिए बांध के कैचमेंट क्षेत्र के 15 मीटर के दायरे में वृक्षारोपण करके ग्रीनबेल्ट का भी प्रस्ताव था, जिस पर अभी कोई ठोस कार्य नहीं किया गया है। और सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण बाणसागर जलाशय को वन विभाग को सौंप कर उसे अभ्यारण्य के रूप में घोषित करने का। इसके साथ ही इसमें पर्यटन और सौन्दर्यीकरण के और भी कई काम प्रस्तावित जो अभी तक नहीं पूरे नहीं हो सकें हैं, पर हम उम्मीद करते है इन पर जिम्मेदारों द्वारा जल्द ही विचार किया जाएगा।

बाणसागर – संघर्ष, उम्मीद और विकास की गाथा

बाणसागर केवल एक बांध के निर्माण की यात्रा नहीं थी, बल्कि लाखों लोगों के एक लंबे सपने के पूरा होने की कहानी भी है। इस यात्रा में सरकारें बदलीं, योजनाएं बदलीं, तकनीकी मुश्किलें सामने आईं और हजारों परिवारों को अपनी जमीन और घर छोड़ने पड़े। लेकिन इन सबके बीच भी एक उम्मीद बनी रही, सोन के पानी को विंध्य की ताकत बनाने की उम्मीद। आखिरकार जब बाणसागर बना, तो सोन का वही पानी, जो कभी बहकर विंध्य से दूर चला जाता था, आज नहरों के जरिए यहाँ के खेतों तक पहुंचने लगा। सिंचाई का विस्तार होने से धीरे-धीरे इस क्षेत्र की कृषि और अर्थव्यवस्था की तस्वीर बदलने लगी। बाणसागर से रीवा शहर को भी पीने के लिए पानी मिला, बीहर नदी सदानीरा बन गई। आज विंध्य कृषि और विद्युत उत्पादन में, मध्यप्रदेश का अग्रणी क्षेत्र है, जिसमें बाणसागर की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। लेकिन आज इस इस विशाल बांध को देखें तो इसमें, केवल सोन का पानी नहीं है। इसमें उन परिवारों की पीड़ा के आँसू भी हैं, जिन्होंने इसके लिए अपनी जमीन और घर छोड़े। उन इंजीनियरों और मजदूरों की मेहनत का पसीना भी है, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों के बीच इसे खड़ा किया। उन जननेताओं के प्रयास हैं, जिन्होंने दशकों तक इस परियोजना को आगे बढ़ाया, और उन पीढ़ियों का सपना भी है, जिन्होंने कभी सोचा था कि सोन का पानी एक दिन विंध्य की धरती को जरूर सींचेगा। शायद इसलिए बाणसागर सिर्फ एक बांध नहीं, बल्कि एक लंबे संघर्ष, उम्मीद और विकास की अमिट कहानी समेटे हुए एक जीता-जागता युगपुरुष है। जिसके अंक में तरल सोने के रूप में यह अनमोल खजाना सुरक्षित है, जो आज विंध्य की धरती को समृद्ध बना रहा है। अब यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम बाणसागर के महत्व को समझें, इसकी उपयोगिता को पहचानें और आने वाली पीढ़ियों के लिए इस जल-संपदा को सुरक्षित रखें। क्योंकि बाणसागर में सिर्फ पानी नहीं है, इसमें विंध्य का भविष्य भी बहता है।

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