Gyanesh Kumar vs Peri Shastri : चुनाव में हर व्यक्ति का मतदान जरूरी होता है। एक-एक मत चुनाव को जीत की ओर ले जाता है। आज देश में हर वो नागरिक जो 18 साल का है, मतदान कर सकता है। लेकिन, क्या आप जानते हैं कि भारत में एक समय ऐसा था जब मतदान करने के लिए 21 साल का होना जरूरी था।
भारत के चुनावी इतिहास में RVS पेरी शास्त्री का कार्यकाल कई अहम बदलावों का गवाह रहा। उनके समय में मतदान की न्यूनतम उम्र 21 से घटाकर 18 वर्ष की गई, ईवीएम के इस्तेमाल को कानूनी आधार मिला और पहली बार चुनाव आयोग को तीन सदस्यीय बनाया गया। इसी दौर में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार और मुख्य चुनाव आयुक्त के बीच आयोग की स्वतंत्रता को लेकर मतभेद भी सामने आए। पेरी शास्त्री का जिक्र इस समय इसलिए हो रहा है कि क्योंकि देश भर में वर्तमान चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग उठ रही है।
कौन थे पेरी शास्त्री?
RVS पेरी शास्त्री का पूरा नाम रुद्राबतला वेंकट सूर्य पेरी शास्त्री था। उनका जन्म 1 फरवरी 1929 को आंध्र प्रदेश के भीमुनिपटनम में हुआ था। उन्होंने अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त की और बाद में कानून की पढ़ाई की। वर्ष 1956-57 में उन्होंने भारत के विधि आयोग में कनिष्ठ विधि अधिकारी के रूप में काम शुरू किया. आगे चलकर वह कानून मंत्रालय में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालते हुए भारत सरकार के सचिव बने।
पेरी शास्त्री ने 1 जनवरी 1986 को देश के आठवें मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में कार्यभार संभाला। वह 25 नवंबर 1990 को अपने निधन तक इस पद पर रहे। उनके कार्यकाल में 1989 का लोकसभा चुनाव हुआ, मतदान की उम्र घटाने का संवैधानिक संशोधन लागू हुआ और चुनाव आयोग की संरचना में बड़ा बदलाव देखने को मिला।
पेरी शास्त्री ने मतदाता की आयु घटाकर 18 वर्ष की
दरअसल, भारत में पहले मतदान की न्यूनतम उम्र 21 वर्ष थी। इसे घटाकर 18 वर्ष करने के लिए संविधान का 61वां संशोधन किया गया। संसद ने 1988 में इस संशोधन को मंजूरी दी और यह 28 मार्च 1989 से प्रभावी हुआ। इसके बाद 18 से 20 वर्ष के युवा भी लोकसभा और विधानसभा चुनावों में मतदान करने के पात्र हो गए। ये बदलाव पेरी शास्त्री के मुख्य चुनाव आयुक्त रहते लागू हुआ, लेकिन इसका फैसला संवैधानिक संशोधन के जरिए संसद ने किया था। इसलिए इसे अकेले पेरी शास्त्री की उपलब्धि कहना सही नहीं होगा। उनके कार्यकाल की अहमियत यह है कि इसी दौरान भारतीय लोकतंत्र में युवा मतदाताओं की भागीदारी बढ़ाने वाला यह बड़ा बदलाव लागू हुआ। इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी ईवीएम के इस्तेमाल की कहानी पेरी शास्त्री के कार्यकाल से पहले शुरू हो चुकी थी। वर्ष 1982 में केरल के परूर विधानसभा क्षेत्र के कुछ मतदान केंद्रों पर ईवीएम का प्रयोग किया गया था। हालांकि, इनके इस्तेमाल के लिए स्पष्ट कानूनी आधार जरूरी था।
1988 में EVM के इस्तेमाल का रास्ता खुला
संसद ने दिसंबर 1988 में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में धारा 61ए जोड़ी। यह प्रावधान 15 मार्च 1989 से प्रभावी हुआ और इससे ईवीएम के इस्तेमाल का कानूनी रास्ता खुला। यह बदलाव पेरी शास्त्री के कार्यकाल में हुआ, लेकिन देशभर में ईवीएम से मतदान उनके समय लागू नहीं हुआ। मशीनों का व्यापक इस्तेमाल बाद के वर्षों में आगे बढ़ा। पेरी शास्त्री के कार्यकाल का एक चर्चित प्रसंग 1987 के राष्ट्रपति चुनाव से जुड़ा है। उस समय राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह और प्रधानमंत्री राजीव गांधी के संबंध तनावपूर्ण थे। चुनाव आयोग के इतिहास पर प्रकाशित एक व्याख्या के मुताबिक, राष्ट्रपति चुनाव की नामांकन प्रक्रिया के समय को लेकर सरकार और मुख्य चुनाव आयुक्त के बीच मतभेद हुए।
इस विवाद के बाद सरकार और पेरी शास्त्री के बीच अविश्वास बढ़ने की बात सामने आई. इस घटनाक्रम को चुनाव आयोग की स्वतंत्रता से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग के रूप में देखा जाता है। अब आपको ये भी बता दें कि 1989 में चुनाव आयोग को तीन सदस्यीय क्यों बनाया गया था। लोकसभा चुनाव से ठीक पहले अक्टूबर 1989 में चुनाव आयोग की संरचना बदल दी गई।
पेरी शास्त्री ने किया था बड़ा बदलाव
राष्ट्रपति R. वेंकटरमन ने 7 अक्टूबर को मुख्य चुनाव आयुक्त के अतिरिक्त दो पद बनाने की अधिसूचना जारी की। 16 अक्टूबर 1989 को RS धनोआ और VS सैगल को चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया। इस तरह पहली बार आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त के साथ दो अन्य चुनाव आयुक्त भी शामिल हुए। इस बदलाव को राजीव गांधी सरकार और पेरी शास्त्री के बीच पहले से चल रहे मतभेदों के किस्सों में देखा जाता है। इसे मुख्य चुनाव आयुक्त की शक्तियां सीमित करने के प्रयास के रूप में भी समझा गया। नवंबर 1989 में नौवीं लोकसभा के चुनाव हुए। कांग्रेस सबसे बड़ा दल बनी, लेकिन उसे बहुमत नहीं मिला। जनता दल के नेतृत्व में राष्ट्रीय मोर्चे की सरकार बनी और VP सिंह प्रधानमंत्री बने।
1990 में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की व्यवस्था समाप्त हो गई
नई सरकार ने जनवरी 1990 में अतिरिक्त चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति वाली व्यवस्था समाप्त कर दी और आयोग फिर एक सदस्यीय हो गया। इस तरह बहुसदस्यीय चुनाव आयोग का पहला प्रयोग कुछ ही महीनों में खत्म हो गया। बाद में 1 अक्टूबर 1993 को दो अतिरिक्त चुनाव आयुक्तों की फिर नियुक्ति हुई। तब से आयोग की बहुसदस्यीय व्यवस्था लगातार बनी हुई है। लेकिन 25 नवंबर 1990 को पेरी शास्त्री का निधन हो गया और फिर उनके बाद VS रमादेवी ने 26 नवंबर से 11 दिसंबर 1990 तक मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संभाला। इसके बाद 12 दिसंबर 1990 को TN शेषन इस पद पर नियुक्त किया गया। बाद में शेषन को चुनावी नियमों को सख्ती से लागू कराने और चुनाव आयोग की शक्तियों के प्रभावी इस्तेमाल के लिए व्यापक पहचान मिली।
विवादों में रहा पेरी शास्त्री का कार्यकाल
ऐसा नहीं है कि पेरी शास्त्री का कार्यकाल बिना विवादों के रहा। पेरी शास्त्री का कार्यकाल भी वर्तमान मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की तरह भारतीय चुनाव व्यवस्था में बदलावों और संस्थागत तनाव के दौर के रूप में याद किया जाता है। मतदान की उम्र 21 से घटाकर 18 वर्ष करने वाला संशोधन उनके समय ही लागू हुआ,,, ईवीएम के इस्तेमाल को कानूनी आधार भी उन्ही के कार्यकाल में मिला और चुनाव आयोग को पहली बार तीन सदस्यीय भी उनके कार्यकाल में बनाया गया।
इस दौरान पेरी शास्त्री को लेकर देश में राजनीतिक विवाद बढ़ गया था। अब एक बार फिर ज्ञानेश कुमार को लेकर देश भर में विवाद हो रहा है।

