Akhilesh Yadav Visit Ram Mandir : आखिर वह समय आ गया, जब समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव अयोध्या जाएंगे और भगवान राम लला के दर्शन करेंगे। राम मंदिर के निर्माण के बाद से ही हर कोई ये सवाल पूछ रहा था कि आखिर अखिलेश रामलला के दर्शन कब करेंगे? इसी महीने 8 अक्टूबर को जब अखिलेश यादव अयोध्या गए थे और रामलला के दर्शन नहीं किए थे, तो यूपी के डिप्टी सीएम और भाजपा नेता बृजेश पाठक ने उनके हिंदू नैरेटिव को साधते हुए अखिलेश यादव को तुष्टिकरण की राजनीति करने वाले नेता बताया था। लेकिन अब वो घड़ी आ गई है। जब नवंबर में दीवाली के बाद अखिलेश यादव राम लाल के दर्शन करेंगे।
दरअसल, अखिलेश यादव ने संकल्प लिया था कि वो केदारेश्वर के निर्माण और पूजन के बाद ही रामलला के दर्शन करेंगे। इसी के साथ आपको ये बता दें कि इससे पहले 5 अगस्त को जनेश्वर मिश्र की जयंती पर सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने ब्राह्मणों को साफ संकेत दिया था कि PDA में सामाजिक न्याय के साथ ब्राह्मणों यानी सवर्णों के लिए भी जगह है।
अखिलेश यादव ने PDA में पंडितों को जोड़ा
उत्तर प्रदेश में 2027 का विधानसभा चुनाव कोई आम चुनाव नहीं होगा बल्कि यह सपा के लिए सियासी विरासत को बचाने की लड़ाई तो भाजपा के लिए तीसरी बार योगी सरकार बनाने की साख की लड़ाई होगी। क्योंकि यूपी चुनाव में ये लड़ाई अब सिर्फ PDA बनाम बीजेपी तक सीमित नहीं रहने वाली है, जिसकी वजह है कि समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने अपनी सियासत में एक नया अध्याय जोड़ने के संकेत दे दिए हैं। एक तरफ सपा की PDA यानी पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वोटों को मजबूत करने की रणनीति है तो दूसरी तरफ सनातन, संतों, मंदिरों और ब्राह्मण समाज के जरिए सपा के सामाजिक आधार को विस्तार देने की एक नई कोशिश है।
नवंबर में रामलला के दर्शन करेंगे अखिलेश यादव
इस बात को और भी गहराई से समझने के लिए आपको याद दिला दें अखिलेश यादव का वो संकल्प, जब अखिलेश ने ऐलान किया था कि इटावा में केदारेश्वर धाम का निर्माण पूरा होने के बाद वह अयोध्या में रामलला के दर्शन करेंगे। यानी राम मंदिर को लेकर जिस सवाल पर बीजेपी लगातार समाजवादी पार्टी को घेरती रही है, अब उसी मुद्दे पर अखिलेश अपनी राजनीतिक स्थिति को साप करने वाले हैं। क्योंकि अखिलेश यादव राम मंदिर में दर्शन को लेकर अपना रुख साफ कर चुके हैं। उनका कहना है कि उन्होंने संकल्प लिया था कि इटावा में केदारेश्वर धाम का निर्माण पूरा होने के बाद ही वह अयोध्या में रामलला के दर्शन करेंगे। इतना ही नहीं उन्होंने सपा नेता पवन पांडेय से महंतों और पंडितों की सलाह लेकर रामलला के दर्शन के लिए शुभ मुहूर्त निकलवाने को भी कहा था। अब वह मुहूर्त दीवाली के बाद का निकाला गया है।
अब भले ही ये शुभ मुहूर्त पंडितों की सलाह पर हुआ हो या राजनीतिक सलाहकार की विधानसभा चुनाव से पहले राममंदिर जाने की सलाह पर हुआ हो। लेकिन समाजवादी पार्टी का कहना है कि अखिलेश यादव किसी राजनीतिक दबाव में नहीं, बल्कि अपने संकल्प के अनुसार ही रामलला के दर्शन करेंगे। अखिलेश यादव को बीजेपी से रामभक्ति का प्रमाणपत्र लेने की जरूरत नहीं है।
‘रामंदिर’ से अखिलेश बनाएंगे सवर्णों को PDA से जोड़ने की योजना
लेकिन राजनीकित विशेषज्ञों का कहना है कि चुनाव से ठीक कुछ महीने पहले अखिलेश यादव का अयोध्या के राम मंदिर में दर्शन करने का फैसला सिर्फ धार्मिक आस्था या उनका संकल्प नहीं है, बल्कि 2027 से लिए सवर्णों की नजर में उनकी राजनीतिक छवि को सुधारने की एक सियासी योजना है। क्योंकि भाजपा मंत्री दयाशंकर सिंह ने सपा पर ये आरोप लगाया था कि अखिलेश यादव केवल एक विशेष समुदाय के वोट बैंक के खिसकने के डर से रामलला के दर्शन करने से बचते हैं।
अब समाजवादी पार्टी बीजेपी के अखिलेश यादव के संकल्प का हवाला देकर इन भाजपा के सवालों का जवाब दे रही हैं। केदारेश्वर धाम का निर्माण पूरा होने के बाद रामलला के दर्शन करने से अखिलेश यादव कहीं न कहीं, अयोध्या की जनता को ये संकेत देना चाह रहे हैं कि सनातन और धार्मिक आस्था पर केवल बीजेपी का एकाधिकार नहीं है।
क्या CM योगी को अखिलेश यादव देंगे ब्राह्मण वोट पर चुनौती?
बता दें कि उत्तर प्रदेश में अयोध्या, राम मंदिर, हिंदुत्व और सांस्कृतिक पहचान को भारतीय जनता पार्टी और सीएम योगी बड़े स्तर पर उठाते आ रहे हैं। सीएम योगी अपनी जनसभाओं में राममंदिर का जिक्र भी बार-बार करते देखे गए हैं।
ऐसे में अगर अखिलेश यादव भी धार्मिक आस्था को अपनी सार्वजनिक और चुनावी राजनीति में प्रमुखता देते हैं, तो मुकाबला केवल मंदिर जाने या न जाने का नहीं रहेगा बल्कि अब इस बात का होगा कि अयोध्या में क्या जनता केवल सनातन की राजनीति को स्वीकार करेगी या विकास की लहर को? क्या अयोध्या में केवल सवर्णों के वोट ही चुनाव को प्रभावित करेंगे?
यह सवाल इसलिए उठ रहा है कि क्योंकि PDA के साथ चुनाव लड़ने की घोषणा करने वाली समाजवादी पार्टी ने सीधे तौर पर एलान कर दिया है कि PDA में केवल पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक ही नहीं होंगे बल्कि ब्राह्मण भी शामिल हैं। इससे साफ है अखिलेश यादव सवर्ण वर्ग की वोटों को भी सपा से जोड़ने का काम कर रहे हैं। यही नहीं, सपा ने ‘सत्ताईस का संकल्प’ के तहत ‘पीडीए का प्रणपत्र’ नाम से अपना ‘जन-मन का मैनिफेस्टो’ 26 नवंबर को जारी करने का ऐलान भी किया है।
अखिलेश यादव को क्यों आई सवर्णों की याद?
अब यहां दूसरा सवाल ये है कि आखिर समाजवादी पार्टी को चुनाव से पहले सवर्णों की याद क्यों आ गई? तो इसका जवाब, 2024 के लोकसभा चुनाव से जुड़ा है। 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश में 37 सीटें जीतकर अपनी राजनीतिक ताकत दिखाई थी। इस चुनाव में PDA की रणनीति को सपा की सफलता का एक अहम कारण माना गया। इसलिए सपा ने PDA का नैरेटिव 2027 के लिए बदल दिया है अब सपा के PDA में P फॉर पंडित को भी जोड़ दिया गया है। क्योंकि, जाहिर है कि सपा की राजनीति लंबे समय तक M-Y यानी मुस्लिम और यादव के समीकरण तक ही सीमित रहती थी। 2024 लोकसभा चुनाव ने सपा को अपना आधार बढ़ाने का मौका दिया। पहली बार अति-पिछड़े वर्गों के साथ दलितों का भी सपा को समर्थन मिला।
अब अखिलेश यादव 2027 विधानसभा चुनाव से पहले इस आधार को सवर्णों तक बढ़ाना चाहते हैं। उसके फोकस में ब्राह्मण समाज हैं, जिसकी आबादी प्रदेश में लगभग 12% है। पिछले 4 चुनावों में ब्राह्मण समाज भाजपा के कोर वोटर रहें हैं। अखिलेश इसके साथ सपा पर लगे सनातन विरोध का दाग भी धो देना चाहते हैं। यही वजह कि 2024 के बाद से उनके आचरण में सॉफ्ट हिंदुत्व की झलक दिखने लगी है। अब सपा की गतिविधियों में ब्राह्मणों, संतों और धार्मिक आयोजनों की संख्या बढ़ती दिखेगी। इसीलिए 2027 से पहले अखिलेश यादव अब PDA के साथ ब्राह्मणों और दूसरे सवर्ण मतदाताओं तक पहुंच बनाने की कोशिश कर रहें हैं। इसके लिए सपा ने अयोध्या से तेज नारायण पांडेय उर्फ पवन पांडेय को उम्मीदवार बनाया है, जिससे ब्राह्मण सम्मेलन के जरिए इस समुदाय तक पहुंच सकें। दूसरी तरफ, माता प्रसाद पांडेय को सपा ने बड़ी जिम्मेदारी दी है। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के पद पर माता प्रसाद पांडेय की नियुक्ति कराकर सपा ब्राह्मण नेतृत्व का संकेत देकर सवर्ण वोटों को साधने की कोशिश करेगी।
खासकर, सपा की कोशिश है कि PDA के सामाजिक न्याय के एजेंडे के साथ ऐसे मतदाताओं को भी जोड़ा जाए, जो परंपरागत रूप से बीजेपी के समर्थक रहे हैं।
खैर, अखिलेश यादव भले ही सनातन की राह चल पड़े हों, लेकिन यूपी में क्या अखिलेश का सॉफ्ट हिंदुत्व सीएम योगी के लिए चुनौती बनेगा? ये सवाल इसलिए भी है क्योंकि योगी आदित्यनाथ की राजनीतिक पहचान ही हिंदुत्व, कानून-व्यवस्था, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, दंगा-फसाद पर हमला और विकास के दावों पर आधारित रहा है। बीजेपी 2027 के चुनाव में इन्हीं मुद्दों को अपनी ताकत के तौर पर पेश कर रही है। दूसरी तरफ, बीजेपी यह सवाल उठा सकती है कि अगर सपा की धार्मिक आस्था पहले भी थी, तो राम मंदिर के मुद्दे पर उसकी स्थिति को लेकर विवाद क्यों हुआ? हां, लेकिन अखिलेश यादव के रामलला के दर्शन के बाद बीजेपी के हाथ से अखिलेश के तुष्टिकरण की रानजीति करने वाला मुद्दा जरूर निकल जाएगा।




