रीवा के गुरगी-सिलचट की प्राचीन काली प्रतिमा का रहस्य

Gurgi Kali Statue History: वैसे तो विंध्यक्षेत्र में देवी काली को समर्पित अनेक मंदिर और प्रतिमाएं हैं। उन्हीं में से एक अत्यंत प्राचीन, दुर्लभ और आकर्षक काली प्रतिमा रीवा जिला मुख्यालय से करीब 25 किलोमीटर दूर, प्राचीन पुरातात्विक स्थल स्थल गुरगी के निकट सिलचट गाँव से प्राप्त होती है। यह प्रतिमा कलचुरीकालीन मानी जाती है और अपनी उत्कृष्ट कलात्मकता और भाव-भंगिमा के कारण विशेष महत्व रखती हैं। प्रतिमा में देवी के रौद्र स्वरूप का अत्यंत सजीव और प्रभावशाली अंकन किया गया है, यह प्रतिमा ना केवल उस समय के उच्चकोटि की शिल्पकला का प्रमाण है, बल्कि उस युग की धार्मिक चेतना और शाक्त उपासना की परंपरा को भी दर्शाती है। तो आइए इस प्रतिमा के इतिहास और रहस्य जानने का प्रयास हम इस वीडिओ में करते हैं। लेकिन उससे पहले विंध्य में शक्तिपूजन के इतिहास और संस्कृति पर एक नजर डाल लेते हैं।

विंध्य क्षेत्र में शक्ति उपासना की प्राचीन परंपरा

रीवा और विंध्यक्षेत्र में भी शक्ति उपासना अत्यंत प्राचीन समय से प्रचलित रही है। महाभारत और हरिवंशपुराण इत्यादि ग्रंथों में देवी दुर्गा का निवास स्थान विंध्य पर्वत को ही बताया गया है। आदिगुरु शंकराचार्य द्वारा रचित और स्तुतित महिषासुरमर्दिनी स्त्रोत में देवी को “गिरिवरविंध्यशिरोधिनिवासिनी” विंध्य पर्वत की ऊंची चोटी में रहने वाली कहा गया है। सीधी की सोनघाटी से प्राप्त प्रागैतिहासिक कालीन बाघोर स्टोन को भी शक्ति की उपासना से जोड़ा जाता है, जिसे खोजकर्ता आठ-नौ हजार वर्ष पुराना मानते हैं। आगे शक्ति पूजन की परंपरा हमें ऐतिहासिक अभिलेखों में भी दिखाई देती है। छठवीं शताब्दी में गुप्तकालीन सामंतों, परिब्राजक महाराज संक्षोभ और उच्चकल्प के महाराज शर्वनाथ के सतना जिले में ऊंचेहरा के निकट खोह से प्राप्त ताम्रलेखों में पिष्टपुरिका देवी के मंदिर तथा उनकी पूजा के लिए ग्राम दान का उल्लेख मिलता है।

पुरातत्वविदों की नजर में गुरगी की काली प्रतिमा | Gurgi Kali Statue

इसी सुदीर्घ शक्ति परंपरा की निरंतरता हमें गुरगी क्षेत्र से प्राप्त काली प्रतिमा में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। इसे खोजने और प्रकाश में लाने का श्रेय भारतीय पुरातत्व के संस्थापक सर कनिंघम को जाता है, उन्होंने 1883-84 की अपनी गुरगी यात्रा के दौरान इस प्रतिमा को देखा था, जिसका जिक्र उन्होंने अपनी किताब “रिपोर्ट्स ऑफ ए टूर इन बुंदेलखंड एंड रीवा” में भी किया है, हालांकि उन्होंने कोई विशिष्ट बात नहीं बताई थी, लेकिन इस प्रतिमा को उन्होंने काली: द स्केलेटन गॉडेस अर्थात काली-कंकाली देवी कहा था। बाद में सुप्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता आर. डी. बनर्जी ने भी 1918 में अपनी गुरगी यात्रा के दौरान इस देवी मूर्ति को देखा और अपनी किताब “द हैहयाज़ ऑफ त्रिपुरी एंड देयर मॉन्यूमेंट्स” में इसके बारे में और ज्यादा जानकारी देते हैं।

बलुआ पत्थर में उकेरी गई अद्वितीय दिव्य आकृति

लाल बलुआ पत्थर से निर्मित करीब पांच फीट लंबी और तीन फीट चौड़ी यह प्रतिमा उस समय के शिल्पकला का अद्भुत उदाहरण है और अभी भी पूर्ण अवस्था में है अर्थात टूटी या खंडित नहीं है। देवी काली की यह प्रतिमा एक वर्टिकल पत्थर की शिला में मध्यम आकार से उभरी हुई उत्कीर्ण हैं। इस प्रतिमा में देवी दो परतों वाले पेडेस्टल पर एक गद्दीनुमा आसान पर बायाँ पैर नीचे की तरफ लटकाए ललितासन मुद्रा में बैठी हुई हैं। उनकी चार भुजाएं हैं और उसमें उनके अंकित किए हुए आयुध और चिन्ह स्पष्ट तौर पर समझ आते हैं। उन्होंने अपने ऊपरी बाएं हाथ में एक नरमुंड अर्थात कटा हुआ सर ले रखा है और ऊपर के दाएं हाथ में सर विहीन शव को उठा रखा है। जबकि निचले बाएं हाथ में एक लहरदार तलवार और नीचे वाले दाएं हाथ में कपाल रूपी खप्पड़ को पकड़े हुए हैं।

प्रतिमा की शारीरिक संरचना और भाव-भंगिमा

इस दिव्य प्रतिमा की शैली अत्यंत रोचक है, देवी की देहयष्टि हष्ट-पुष्ट और सुडौल दिखाई देती है और उनका ऊपरी शरीर पूर्णतः अनावृत है अर्थात बिना कपड़ों का है, इसमें उनके उन्नत स्तन स्पष्ट तौर पर उभरे प्रतीत होते हैं। जबकि वह शरीर के निचले भाग में एक साधारण सा अंगवस्त्र धारण किए हुए हैं, जिसमें कुछ सिलवटें अर्थात प्लेट्स दिखाई देती हैं पर इसमें ज्यादा अलंकरण भी नहीं है। इसके साथ ही उनके आभूषण भी साधारण हैं और ज्यादा अलंकृत नहीं है। उन्होंने गले में केवल एक हार, भुजाओं में बाजूबंद, दोनों कानों में कुंडल और चारों हाथों में एक-एक कंगन धारण किए हैं। उनके कोमल और सुडौल शारीरिक चित्रण के विपरीत उनके चेहरे के भाव बेहद उग्र हैं, उनकी आंखे बड़ी और बाहर की ओर निकली हुई प्रतीत होती हैं। उनके चेहरे में आँखों के नीचे स्पष्ट तौर पर झुर्रियों के चिन्ह हैं, जो उनके मुसकुराते हुए मुख के चित्रण के कारण और भी उभरे प्रतीत होते हैं। उसका मुंह बहुत बड़ा और खुला हुआ है, होंठ मोटे हैं, दांत बाहर की ओर दिखाई देते हैं और हंसने के कारण ही मुंह के दोनों किनारों पर दो लंबे नुकीले दांत भी निकले हुए स्पष्ट तौर पर अंकित हैं। जबकि उनके बाल छोटे-छोटे और घुँघराले हैं और एक बड़े जूड़े में बंधे हुए हैं और उनमें कुछ मोटी चोटी जैसी लटें भी दिखाई देती हैं। जूड़े के बीच में दो हाथों के साथ उभरी और हँसती हुई खोपड़ी की आकृति बनी हुई है, कई विद्वान इसे कीर्तिमुख कहते हैं। और उनके सिर के चारों ओर कमल की पंखुड़ियों के आकार का एक प्रभामंडल है जो देवी प्रतिमा को दिव्यता प्रदान करता है। मूर्ति के ऊपर दोनों तरफ उत्कीर्ण दो स्त्री गंधर्व भी स्पष्ट तौर पर अंकित दिखाई देते हैं। जबकि उसके नीचे बायीं तरफ धँसे हुए एक कोने में देवी के वाहन सिंह को लेटी हुई अवस्था में उत्कीर्ण किया गया है।

अभिलेख और पहचान का विवाद

इससे संबंधित एक और रोचक तथ्य है, जिसका जिक्र राखलदास बनर्जी करते हैं, उनके अनुसार प्रतिमा में पेडेस्टल के नीचे वाले भाग में एक वोटिव इनस्क्रिप्शन अर्थात मनौती अभिलेख भी दर्ज है, जिसमें पौनविज नाम के एक व्यक्ति का नाम अंकित है, जिससे संभावना है इस प्रतिमा का निर्माण उसी ने करवाया होगा। हालांकि वर्तमान में ऐसा कोई भी अभिलेख मूर्ति के नीचे की तरफ दृष्टिगत नहीं होता है। चूंकि अलेक्जेंडर कनिंघम ने अपनी किताब में प्रतिमा को काली-कंकाली देवी की मूर्ति माना था, इसीलिए उनके बाद आए राखलदास बनर्जी ने भी इसी आधार पर इसे काली प्रतिमा माना। लेकिन कुछ आधुनिक शोधकर्ता इस मत से सहमत नहीं हैं, इन्हीं में से एक युवा पुरातत्वविद शिवम दुबे भी हैं, उनके अनुसार इस प्रतिमा के लक्षण किसी भी दृष्टि से काली देवी के नहीं लगते हैं, बल्कि यह संभवतः देवी चंडी की मूर्ति हो सकती है। शिवम दुबे एक और संभावना जताते हैं और मानते हैं, सिलचट में स्थित यह प्रतिमा जिसे देवी काली के नाम से जाना जाता है, वह योगिनी कौल संप्रदाय से संबंधित हो सकती है।

योगिनी कौल संप्रदाय क्या है

अब आपके मन में एक स्वाभाविक सा प्रश्न उठ सकता है, यह योगिनी कौल संप्रदाय क्या है? दरसल यह संप्रदाय शाक्तधर्म के अंतर्गत आने वाली एक तांत्रिक परंपरा थी, जिसमें देवी के 64 योगिनी रूपों की पूजा की जाती थी। यह धर्म सर्वाधिक लोकप्रिय मध्य और पूर्वी-भारत में था, यानि आज के हिसाब से देखा जाए तो मुख्यतः मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और ओड़ीसा में, यहीं पर 64 योगिनियों के मंदिर भेड़ाघाट, शहडोल, खजुराहो, मितावली और दुधई इत्यादि से प्राप्त होते हैं।

तंत्र, ज्योतिष और साधना के केंद्र

दरसल शाक्त धर्म की उपासना में योगिनी कौल संप्रदाय एक महत्वपूर्ण साधना परंपरा के रूप में विकसित हुआ। इन मंदिरों में मुख्यतः केंद्र में शिवलिंग स्थापित होता था और उसके चारों तरफ वृत्ताकार स्थिति में योगिनी प्रतिमाओं की स्थापना की जाती थी, ये मंदिर तंत्र के साथ ही समय गणना और ज्योतिष अध्ययन के भी प्रमुख केंद्र हुआ करते थे। विद्या दहेजिया की किताब “योगिनी कल्ट एंड टेंपल: ए तांत्रिक ट्रेडिशन” के अनुसार इस संप्रदाय का व्यवस्थित रूप से अभ्युदय लगभग 5वीं शताब्दी के आसपास माना जाता है, लेकिन इसकी दार्शनिक और सांस्कृतिक जड़ें इससे कहीं अधिक प्राचीन हैं। इसमें शक्ति-साधना, योगिनी उपासना तथा तांत्रिक अनुष्ठानों की प्रमुख भूमिका होती थी, जिसके माध्यम से साधक आध्यात्मिक सिद्धि और अलौकिक शक्तियों की प्राप्ति का प्रयास किया करते थे। इस संप्रदाय का उदय भारतवर्ष के कई संस्कृतियों और धर्मों के समावेश से हुआ था, इसीलिए इसने समाज के प्रत्येकवर्ग को प्रभावित किया।

जनजातीय और वैदिक संस्कृति का संगम

एक मत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि योगिनी कौल संप्रदाय जिन क्षेत्रों में विकसित हुआ, वे मूलतः आदिवासी बाहुल्य थे। हमारे विंध्य क्षेत्र में कोल, गोंड समेत कई जनजातियों की प्रमुखता रही है। कुछ विद्वानों का मत है ब्राम्हण और स्थानीय जनजातीय संस्कृति के आपसी मेल से ही इस संप्रदाय का उद्भव हुआ। दरसल जनजातीय समाज मूलतः मातृसत्तात्मक रहा है और तांत्रिक परंपरा में भी स्त्री तत्व को विशेष महत्व दिया गया है। इसी कारण इस परंपरा के विकास में वैदिक मान्यताओं के साथ ही स्थानीय आदिवासी संस्कृति का भी समन्वय था। जैसे इन देवियों के नाम संस्कृत में प्राप्त होते हैं, किंतु स्थानीय बोलियों में इनके विविध नाम प्रचलित रहे हैं। इसके अलावा इस क्षेत्र से प्राप्त योगिनी मूर्तियों में से कई की पहचान अर्थात नाम और लक्षण इत्यादि पुराणों में वर्णित योगिनियों से नहीं मिलते, उनकी पहचान स्वतंत्र है, इसीलिए विद्वान मानते हैं प्रारंभ में वह कोई स्थानीय जनजाति देवी की मूर्ति रही होगी जिसे कालांतर में शाक्त संप्रदाय में अभिन्न कर लिया गया। हम इस साम्यता का एक अच्छा सा उदाहरण भी ले सकते हैं, यहाँ जनजातियों में सतबहिनियों का कान्सेप्ट है, नवरात्रों में गाए जाने वाले बघेली देवी भगतों में देवी शारदा की सात बहन मानने का उल्लेख मिलता है यह सात बहने स्थानीय देवी फूलमती, शीतला इत्यादि होती हैं। ध्यान से अगर हम पुराणों को पढ़े तो उसमें भी देवी चंडी और चामुंडा सहित सप्तमातृकाओं का जिक्र है जिन्होंने शुंभ-निशुंभ और उनकी सेनाओं के साथ युद्ध किया था।

गुरगी-सिलचट योगिनी उपासना के संभावित केंद्र

दरसल योगिनी मूर्तियां विंध्यक्षेत्र में भी बहुतायत से प्राप्त होती हैं, कई देशभर के विभिन्न संग्रहालयों सुरक्षित हैं। हमें सिलचट के इस काली मंदिर के निकट ही कई देवी या योगिनी प्रतिमाएं खंडित अवस्था में पड़ी हुई दिखी हैं, इसीलिए इनकी पहचान करना बहुत सरल तो नहीं है, लेकिन इन प्रतिमाओं के लक्षण, भेड़ाघाट और अन्य योगिनी मूर्तियों से मिलते-जुलते हैं, इसीलिए बहुत संभव है कि भेड़ाघाट के चौंसठ योगिनी मंदिर सदृश्य कोई मंदिर यहाँ भी रहा हो। यद्यपि इस विषय में निश्चित तौर पर कुछ कहना कठिन है, पर फिर भी यह तो निश्चित है कि विंध्य क्षेत्र में शाक्त धर्म के योगिनी कौल संप्रदाय की व्यापक उपस्थिति अवश्य थी।

कला, धर्म और स्थापत्य का स्वर्ण युग था कलचुरी काल

दरसल अत्यंत महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल गुरगी के निकट सिलचट में हमारी टीम को कलचुरीकालीन विभिन्न मूर्तियाँ और स्थापत्य अवशेष बड़ी संख्या में गाँव के रास्ते, तालाबों और खेतों के किनारे और स्थानीय ग्रामीणों के घरों में बहुतायत में दिखे, इन बिखरे हुए पुरावशेषों की प्रचुरता इस बात का स्पष्ट संकेत देती है, यह क्षेत्र कभी कला और स्थापत्य का समृद्ध केंद्र रहा होगा, जो कालांतर में नष्ट होकर आज इन अवशेषों के रूप में बिखरे पड़े हैं। दरसल पूर्वमध्यकाल में 9वीं से 13वीं शताब्दी के मध्य इस पूरे क्षेत्र में कलचुरी वंश का प्रभावशाली शासन स्थापित हुआ, जिनकी राजधानी त्रिपुरी थी। कलचुरी शासक केवल पराक्रमी योद्धा और कुशल प्रशासक मात्र नहीं थे, बल्कि वे तत्कालीन धर्म, संस्कृति और कलाओं के महान संरक्षक भी थे। उनके संरक्षण में डाहल मंडल के विभिन्न क्षेत्रों में कई मंदिरों तथा असंख्य उत्कृष्ट मूर्तियों का निर्माण हुआ। कलचुरीकालीन मूर्तिकला अपनी परिपक्वता, सौंदर्य और कलात्मकता के कारण अत्यंत समृद्ध और उन्नत मानी जाती है। इस काल में त्रिपुरी और गुरगी जैसे कई स्थान कला और संस्कृति के महत्वपूर्ण केंद्रों के रूप में प्रतिष्ठित थे। यद्यपि कलचुरी शासक मुख्यतः शैव धर्म के अनुयायी थे, तथापि उनकी धार्मिक नीति उदार और समन्वयवादी थी। उनके संरक्षण में वैष्णव, जैन, बौद्ध तथा शाक्त संप्रदायों की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराएँ भी समान रूप से फली-फूली।

गुरगी-सिलचट में 64 योगिनी मंदिर की संभावना

विद्वान यह भी मानते हैं जब चेदि देश और डाहलमंडल में अर्थात रीवा और जबलपुर क्षेत्र में कल्चुरियों ने अपना शासन स्थापित किया तब यहाँ मातृदेवियों की पूजा अत्यंत प्रचलित रही है। इसीलिए भेड़ाघाट से एक और शहडोल में दो चौंसठयोगिनी मंदिर के अवशेष प्राप्त होते हैं। लेकिन बाद में युवराजदेव कलचुरी की पत्नी रानी नोहला देवी के साथ आए शैवों का मत्तमयूर संप्रदाय जब यहाँ पल्लवित होने लगा और शैवाचार्यों का आगमन हुआ, तो शैवधर्म की यहाँ प्रधानता हो गई। संभवतः इसीलिए इतने महत्वपूर्ण स्थल होने के बाद भी इन योगिनी मंदिरों का जिक्र कलचुरी अभिलेखों में नहीं हुआ। तो जैसा हमने पहले भी कहा था कि इस बात की बहुत संभावना है कि गुरगी के निकट ही कहीं कोई ऐसा ही चौसठ योगिनी मंदिर रह होगा, यहाँ स्थित काली और कई खंडित पड़ी मूर्तियों के अतिरिक्त गुरगी से प्राप्त कई योगिनी मूर्तियाँ धुबेला संग्रहालय में भी सुरक्षित है, जिसका जिक्र एस. के. दीक्षित ने अपनी 1957 की अपनी किताब “ए गाइड टू द स्टेट म्यूजियम धुबेला” में किया है।

शैव-शाक्त समन्वय के केंद्र थे 64 योगिनी मंदिर

विद्वानों का यह भी मत है कि इन देवियों की उपासना और उनसे संबंधित मूर्तिकला का विकास वृत्ताकार मंदिरों में हुआ, उल्लेखनीय है कि इस प्रकार के कलचुरीकालीन मंदिर इस पूरे क्षेत्र में बहुतायत से प्राप्त होते हैं। ध्यान देने योग्य एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह है, कि कालांतर में मत्तमयूरों ने अपने मठों की स्थापना इन चौंसठ योगिनी मंदिरों के अत्यंत समीप की थी। यह केवल एक भौगोलिक संयोग ही नहीं, बल्कि शैव और शाक्त साधना के संबंधों का संकेत भी प्रतीत होता है। उदाहरणस्वरूप भेड़ाघाट के चौंसठ योगिनी मंदिर के निकट स्थित गोलकी मठ इसका स्पष्ट प्रमाण है। इन्हीं आधार पर यह स्वाभाविक अनुमान लगता है, कि सिलचट के समीप गुरगी में भी कोई महत्वपूर्ण शैव मठ जरूर रहा होगा। क्योंकि इस धारणा को बल इस तथ्य से भी प्राप्त है कि शैव सन्यासी प्रशांतशिव चंद्रेह जाने से पूर्व गुरगी में ही निवास करते थे, इस क्षेत्र में आस-पास महसाँव और खजुहा समेत कई कल्चुरिकालीन मंदिर और उनके अवशेष आज भी प्राप्त होते हैं।

पुरावशेषों के संरक्षण की आवश्यकता

अब यह प्रतिमा चाहे देवी काली की हो, चंडी को हो या किसी अन्य योगिनी शक्ति की, समय के साथ इतिहास में बहुत कुछ बदलता रहा है। धर्म, परंपराएं और मान्यताएं भी निरंतर रूपांतरित होती रही हैं। किन्तु एक बात जो कभी नहीं बदली, वह है जनमानस की अटूट आस्था, युगों के इस परिवर्तन के बावजूद भी यह प्रतिमा आज भी उसी गहरी श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के साथ पूजित हो रही है। बस जरूरत है इन मूर्तियों और पुरावशेषों के संरक्षण की, पुरातत्व विभाग को चाहिए कि वह इस तरफ ध्यान दे, लोगों से भी अनुरोध है वह इन्हें नुकसान नहीं पहुंचाएं और मूर्ति के रूप से छेड़छाड़ ना करें, रास्ते में हमें एक विशाल प्रतिमा दिखी जिसे ग्रामीण जन हनुमान प्रतिमा कहते हैं, लेकिन ऑफ कैमरा हमें बताया गया हनुमान जी के हाथ में गदा बाद में रॉड और सीमेंट के सहारे लगाया गया क्योंकि पहले हाथ की मुद्रा दूसरी तरह थी, इसके साथ ही इसमें सिंदूर पोत दिया गया जिसके कारण हम इसके वास्तविक महत्व को नहीं समझ पाए।

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