भारतीय सिनेमा में बिना संवाद वाली फिल्में कम ही बनती हैं। साल 1987 की ‘पुष्पक विमान’ के बाद अब निर्देशक किशोर बेलेकर ‘Gandhi Talks’ के साथ एक बड़ा प्रयोग लेकर आए हैं। विजय सेतुपति, अरविंद स्वामी और अदिति राव हैदरी जैसे बड़े सितारों से सजी यह फिल्म भ्रष्टाचार और नैतिकता के इर्द-गिर्द घूमती है, जहाँ केवल विजुअल्स और संगीत ही कहानी बयान करते हैं।
कहानी का ताना-बना और ‘गांधी’ का अर्थ
फिल्म की कहानी मुंबई की पृष्ठभूमि पर आधारित है। यहाँ ‘गांधी’ शब्द का इस्तेमाल महात्मा गांधी के आदर्शों के लिए नहीं, बल्कि उन रुपयों के नोटों के लिए किया गया है जिन पर बापू की तस्वीर छपी है। फिल्म दिखाती है कि कैसे आज के दौर में ईमानदारी की जगह भ्रष्टाचार ने ले ली है। पूरी फिल्म में कोई भी डायलॉग नहीं है, जो इसे तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण बनाता है।

किरदारों का संघर्ष और परिस्थितियां
विजय सेतुपति ने महादेव का किरदार निभाया है, जो बेरोजगार है और अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए संघर्ष कर रहा है। उसे सरकारी नौकरी के लिए रिश्वत देनी है, वरना उसकी प्रेमिका गायत्री (अदिति राव हैदरी) की शादी कहीं और हो जाएगी। दूसरी तरफ, अरविंद स्वामी एक बिल्डर मोहन की भूमिका में हैं, जो कर्ज के जाल में फंसा हुआ है। इन दोनों किरदारों का मिलना और फिर शुरू होने वाली लुका-छिपी फिल्म का मुख्य हिस्सा है।
निर्देशन और तकनीकी पहलू
किशोर बेलेकर ने एक साहसी फैसला लिया है, लेकिन Gandhi Talks Movie Review करते समय यह साफ नजर आता है कि फिल्म की स्क्रिप्ट में इतनी ज्यादा जानकारी और उप-कहानियां हैं, जिन्हें बिना बोले समझाना मुश्किल हो जाता है। फिल्म में ए.आर. रहमान का बैकग्राउंड स्कोर ही वह तत्व है जो जान फूंकने का काम करता है। संगीत के माध्यम से किरदारों की भावनाओं को व्यक्त करने की कोशिश की गई है।
अभिनय और प्रदर्शन
विजय सेतुपति अपनी आंखों और शरीर की भाषा से संवाद करने में माहिर हैं और यहाँ भी वह निराश नहीं करते। सिद्धार्थ जाधव ने एक पॉकेटमार की भूमिका में कुछ मजेदार पल दिए हैं। वहीं, अरविंद स्वामी ने एक हताश अमीर व्यक्ति के हाव-भाव बखूबी पकड़े हैं। हालांकि, संवाद न होने के कारण कई बार स्थितियां बहुत ज्यादा खींची हुई महसूस होती हैं, खासकर चोरी वाला सीक्वेंस।

क्या प्रयोग सफल रहा?
एक मूक फिल्म (Silent Film) बनाना अपने आप में जोखिम भरा होता है। ‘गांधी टॉक्स’ कुछ दृश्यों में तो बहुत प्रभावी है, जैसे महादेव के चाल (Chawl) की जिंदगी का चित्रण। लेकिन फिल्म की गति (Pace) कई जगह धीमी हो जाती है। निर्देशक ने विजुअल्स के जरिए जो कहने की कोशिश की है, वह कई बार दर्शकों तक उस स्पष्टता से नहीं पहुंच पाती जितनी संवादों के साथ पहुंचती।
तकनीकी बारीकियां और ए.आर. रहमान का जादू
फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष इसका संगीत और साउंड डिजाइन है। जब पात्र बात नहीं करते, तो ध्वनियां (Ambient Sounds) महत्वपूर्ण हो जाती हैं। रहमान का संगीत केवल फिल्म के पीछे नहीं बजता, बल्कि वह खुद एक पात्र की तरह कहानी सुनाता है। इसके बावजूद, फिल्म की एडिटिंग और सिनेमैटोग्राफी उतनी प्रभावशाली नहीं है कि यह अंत तक दर्शकों को बांधे रख सके।
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