गांधी जंयतीः जेन-जी वाली उम्र में गांधी जी ने मांसखाया, बीड़ी के लिए पैसे चुराए, वेश्यालय गए फिर मोहन से बने महात्मा

गांधी जंयती। महात्मा गांधी अपने किशोर और युवावस्था यानि की जेन-जी वाली उम्र के दिनों में एक सामान्य, शर्मीले और गलतियों से सीखने वाले इंसान थे, कई ऐसे तथ्य मिलते है जो कि उनके उम्र के शुरूआती दौर में ऐसी गलतियां किए जिसका उन्हे पक्षतावा हुआ। इतना ही नही गलतियों के चलते वे इतना ज्यादा भावुक हो गए कि जीवन न जीने का मन तक बना लिए, लेकिन बाद में अपने प्रयोगों, आत्म-सुधार और सत्य-अहिंसा के मार्ग पर चलकर महात्मा बने।

मांस सेवन का प्रयोग

मोहनदास अपने दोस्तों के बहकावे आकर यह मानकर कि मांसाहारी अंग्रेज मजबूत होते हैं और देश पर राज करते हैं, उन्होंने मित्र के साथ छुपकर मांस खाने की कोशिश की थी, लेकिन बाद में उन्हें भारी ग्लानि हुई। गांधी जी की आत्मकथा सत्य के प्रयोग के अनुसार, उनके एक मुस्लिम मित्र ने उन्हें यह कहकर मांस खाने के लिए प्रेरित किया था कि अंग्रेजों की तरह शारीरिक रूप से ताकतवर और मजबूत बनने के लिए मांसाहार जरूरी है। मित्र के बहकावे में आकर उन्होंने एक शाम मांस खाया था, लेकिन उस रात उन्हें बेचौनी हुई और उन्हें ऐसा लगा जैसे उनके पेट के अंदर कोई जीवित बकरी मिमिया रही हो। इस घटना के बाद उन्हें भारी पश्चाताप हुआ और उन्होंने मांसाहार से तौबा कर लिया। जब गांधीजी वकालत की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड गए थे, तब उनकी मां ने उनसे मांस और मदिरा का सेवन न करने की कसम ली थी। इंग्लैंड में कई बार कठिनाइयों और शाकाहारी भोजन न मिलने के बावजूद उन्होंने अपनी मां को दी गई कसम का पालन किया और आजीवन शाकाहारी रहे।

वेश्या ने धक्का देकर बाहर किया था

गांधी जी एक मित्र के दबाव में वे वेश्या के कोठे पर गए थे, लेकिन कमरे में अकेले पहुँचकर वे इतना डर गए और काँपने लगे कि वह महिला खुद ऊब कर उन्हें बाहर निकाल दिया। इस बात का उन्हें जीवन भर अपराध बोध रहा। यह प्रसंग देश के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के जीवन से जुड़ा है, जिसका जिक्र उन्होंने स्वयं अपनी आत्मकथा सत्य के प्रयोग में किया है। उनकी आत्मकथा के अनुसार किशोर उम्र में उनके एक करीबी मित्र (शेख मेहताब) ने उन्हें यह मानकर वेश्यालय जाने के लिए उकसाया और दबाव डाला कि इससे उनका डर खत्म हो जाएगा। कस्तूरबा से विवाह के बाद इस घटना में वह अपने मित्र के कहने पर वेश्या के कोठे पर गए थे। कमरे के भीतर जाने के बाद वह भयंकर कुंठा, डर और भारी अपराध बोध से घिर गए। वहां मौजूद महिला ने जब उनकी ऐसी घबराई हुई स्थिति देखी, तो उसने उन्हें डांटा और बाहर जाने को कहा, जिसके बाद वह सकुशल और बेदाग बाहर लौट आए। इस घटना ने उनके मन में नैतिकता और आत्मसंयम के बीज बोए।

बीड़ी-सिगरेट की लत और चोरी

किशोर उम्र में उन्होंने अपने एक रिश्तेदार के साथ बीड़ी पीने का शौक पाल लिया था। पैसे न होने पर उन्होंने नौकर के पैसे चुराए और कर्ज चुकाने के लिए सिगरेट के टुकड़े भी चुराए। चोरी करने और पारिवारिक आज्ञा के विरुद्ध किए गए कार्यों के कारण उपजे गहरे अपराध-बोध और घुटन के चलते उन्होंने अपने जीवन में एक बार आत्महत्या करने की कोशिश भी की थी, लेकिन वे हिम्मत हार गए और खुद को रोक लिया।

मोहनदास से महात्मा बनने की यात्रा

इंग्लैंड से लौटने के बाद जब वे वकालत करने दक्षिण अफ्रीका गए, तो वहाँ उन्होंने गोरों द्वारा अश्वेतों और भारतीयों पर किए जाने वाले नस्लीय भेदभाव को खुद झेला। इस अपमान और अन्याय के खिलाफ उन्होंने गुस्से से नहीं, बल्कि आत्मबल, गरिमा और शांतिपूर्ण प्रतिरोध का रास्ता चुना, जिसे सत्याग्रह का नाम दिया गया। गांधीजी ने अपनी आत्मकथा सत्य के प्रयोग में अपनी इन सभी कमियों और गलतियों को बिना किसी छुपाव के पूरी ईमानदारी से स्वीकार किया।

जनता से जुड़ाव

1915 में भारत लौटने के बाद उन्होंने देश के आम आदमी के दुखों को अपना समझा। उनके इसी नैतिक साहस, सच्चाई, सादगी और अहिंसक आंदोलनों (जैसे असहयोग आंदोलन और नमक सत्याग्रह) के कारण जनता ने उन्हें प्रेम और सम्मान से महात्मा की उपाधि दी।

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