Happy Birthday Jeetendra:अपने डांस मूव्स से फिल्म इंडस्ट्री में जंपिंग जैक का खिताब अपने नाम करने वाले जीतेंद्र आज 84 साल के हो गए हैं तो चलिए आज उन्हीं की कुछ ख़ास बातें आपको बताते हैं। 7 अप्रैल 1942 में अमृतसर के एक पंजाबी परिवार में पैदा हुए थे रवि कपूर जिन्होंने फिल्मों में आने के बाद अपना नाम बदला और बन गए हमारे आपके चहीते जीतेंद्र हुआ।
उनके बचपन की बात करें तो जब वो कुछ ही महीनों के थे, तब उनका परिवार मुंबई आकर गिरगांव की श्याम सदन चॉल में रहने लगा था और 10×12 की एक खोली में 8 लोगों का पूरा परिवार रहता था जिसका किराया भी उस वक़्त 6 रुपए था जो जीतेन्द्र के पिता अमरनाथ के लिए बहोत ज़्यादा था क्योंकि वो फिल्मों के सेट में आर्टिफिशियल जूलरी सप्लाई करने का काम करते थे कहते हैं जब उनके घर के हालात थोड़ा सुधरे तो घर में ट्यूबलाइट और पंखा लगा था जो पूरी चॉल में किसी किसी को ही नसीब होता था इसलिए पूरी चॉल वाले जीतेन्द्र के घर उनका पंखा और ट्यूबलाइट देखने पहुंचे थे ,ख़ैर इसी तरह जीतेंद्र 20 साल के हो गए पर इस ग़रीबी ने न केवल उन्हें ज़िंदगी की धूप छाँव को क़रीब से समझने का मौका दिया बल्कि पंजाबी परिवार से होने के बावजूद उन्हें फर्राटेदार मराठी बोलना भी आ गया।
पिता को भरोसा नहीं था कि जीतेंद्र कुछ कर पाएंगे
जीतेंद्र अपने पिता कि वो औलाद रहे जिन पर उन्हें कोई भरोसा न था क्योंकि जीतेन्द्र न पढ़ाई में अच्छे थे न उनके पास कोई ख़ास टैलेंट था पर फिर भी जीतेन्द्र अपने पैरों पर खड़े हो जाएँ इसलिए पिता ने उन्हें अपने साथ आर्टिफिशियल जूलरी के बिज़नेस में लगा लिया और बस कुछ सतरह बरस की उमर में जीतेन्द्र पहुँचे वी.शांताराम की फिल्म ‘नवरंग’ के सेट पर जूलरी पहुँचाने पर फिल्मों के लाइट कैमरा एक्शन के साउंड ने उनका ध्यान अपनी ओर खींच लिया मन किया थोड़ी देर शूटिंग देख लें लेकिन वी. शांताराम की फिल्म की शूटिंग देख पाना आसान नहीं था इसलिए अगले दिन अपने चाचा से सिफारिश लगवाई फिर भी इजाज़त नहीं मिली बिना काम के वहाँ खड़े रहने की। उनकी शर्त थी कि शूटिंग देखना है, तो काम करना पड़ेगा फिर जीतेन्द्र कहाँ पीछे हटने वाले थे उन्होंने काम करने के लिए झट से हाँ करदी और असिस्टेंट ने उन्हें देखकर कहा कि तुम प्रिंस के रोल के लिए कल आ जाना।
ये सुनकर तो जीतेंद्र फूले नहीं समाए और अगले दिन तैयार होकर बस से नहीं बल्कि टैक्सी से सेट पर पहुँचे पर वहाँ पहुँच कर उनके होश उड़ गए जब उन्हें पता चला कि प्रिंस के रोल के लिए वो अकेले नहीं हैं बल्कि वहाँ और 200 लोग प्रिंस बनकर ही बैठे हैं ख़ैर ये देखकर भी जीतेन्द्र ने हार नहीं मानी और उन्हें फिल्म ‘नवरंग’ के गाने तू छुपी है कहाँ…. में उन्हें हीरोइन के पीछे खड़े होने वाले जूनियर आर्टिस्ट का काम मिल गया।
वी.शांताराम किस बात से हुए प्रभावित :-
फिल्म में काम करने का ये पहला अनुभव जीतेन्द्र के लिए इतना अच्छा रहा कि उन्होंने एक्टिंग में हाँथ आज़माने की ठान ली और मौका मिलते ही डायरेक्टर वी.शांताराम से उनकी बोली यानी मराठी में ही कहा – मुझे फिल्मों में काम करना है और शांताराम जीतेन्द्र की मराठी सुनकर और ये जानकार हैरान रह गए कि जीतेन्द्र पंजाबी होते हुए इतनी अच्छी मराठी बोल रहे हैं और बस इस बात से खुश होकर उन्होंनें 100 रुपए महीने की तनख्वाह पर फिल्म ‘सेहरा’ की शूटिंग के दौरान बस सेट पर मौजूद रहने का काम दे दिया ताकि वो वक़्त ज़रूरत काम कर सकें।
संध्या का बॉडी डबल बनकर लगाई जान की बाज़ी :-
जल्द ही सेट पर जीतेन्द्र की ज़रूरत आन पड़ी जिसे पूरा करना बहोत जोखिम भरा था लेकिन जीतेन्द्र ने इस काम के लिए भी न नहीं कहा दरअसल हुआ यूँ कि वी शांताराम की पत्नी अभिनेत्री संध्या को आग के ऊपर से छलांग लगानी थी और खतरनाक स्टंट होने की वजह से एक लड़की को बुलाया गया था , बॉडी डबल के लिए ताकि वो संध्या के गेटअप में आकर छलांग लगा सके लेकिन आग देखकर उसने बॉडी डबल का ये रोल प्ले करने से मना कर दिया फिर दूसरी लड़की को बुलाया गया लेकिन वो भी डर गई तब वी.शांताराम ने जीतेंद्र को ही ये काम दे दिया और जीतेंद्र हूबहू एक्ट्रेस संध्या की तरह तैयार हुए और आग के ऊपर से छलांग लगा दी जो एक परफेक्ट शॉट की तरह फ़ाइनल हो गया और दर्शकों ने यही माना कि संध्या ने छलांग लगाई है।
पहला डायलॉग ही ग़लत बोला था जीतेंद्र ने :-
जीतेंद्र की हिम्मत ने वी.शांताराम का दिल जीत लिया और उन्होंनें जीतेन्द्र को फिल्म में एक डायलॉग भी बोलने के लिए दे दिया ये डायलॉग था ‘सरदार, दुश्मनों का दल टिड्डियों की तरह आगे बढ़ रहा है” जिसे बोलते हुए जीतेन्द्र इतना घबरा गए कि 25 रीटेक के बावजूद भी डायलॉग ठीक से नहीं बोल पाए और वी.शांताराम ने परेशान होकर ग़लत डायलॉग के साथ ही ये सीन फाइनल कर दिया क्योंकि वो उन्हें ऐसा ही जचने लगा और जीतेन्द्र का अंदाज़ उन्हें इतना भाया की अपनी अगली फिल्म ‘गीत गाया पत्थरों ने’ में उन्होंनें जीतेन्द्र को लीड रोल दे दिया जिसमे हीरोइन थीं उनकी बेटी राज श्री।
पहली फिल्म कुछ ख़ास कमाल न दिखा पाई
साल 1964 में रिलीज़ हुई फिल्म ‘गीत गाया पत्थरों ने’ से जीतेन्द्र को बड़ी उम्मीदें थीं पर फिल्म कुछ ख़ास कमाल न कर पाई इसका अंदाज़ा उन्हें तब हुआ जब जीतेन्द्र अपने माता पिता को अपने अभिनय का जलवा दिखाने थिएटर लेके गए और गेट पर खड़े शख्स से पूछा, हमें कहाँ बैठना है और जवाब मिला, पूरा थिएटर खाली है, जहाँ बैठना है बैठ जाओ। ख़ैर जीतेन्द्र ने स्ट्रगल करना नहीं छोड़ा इस बीच उनकी दोस्ती प्रेम चोपड़ा से हो गई जो आज भी कायम है।
मुमताज के साथ क्यों नहीं करना चाहते थे काम :-
लंबी जद्दोजहद के बाद जीतेंद्र को वी.शांताराम की अगली फिल्म ‘बूंद जो बन गई मोती’ में काम मिला जिसमें वी.शांताराम ने अभिनेत्री मुमताज को कास्ट किया था जो कुछ बी-ग्रेड फिल्मों से आई थीं और वी.शांताराम की फिल्मों जैसे -स्त्री (1961) और सेहरा (1963) में छोटी भूमिकाएँ निभा चुकी थीं लेकिन जैसे ही ये बात जीतेंद्र को पता चली उन्होंने मुमताज के साथ काम करने से मना कर दिया पर शांताराम ने कहा वो मुमताज़ को ही लेना चाहते हैं वो चाहे तो जा सकते हैं तब जीतेंद्र को फिल्म करनी ही पड़ी।
महमूद ने कैसे की थी मदद :-
अभिनय में अचानक रोना -हँसना जीतेन्द्र के लिए बड़ा मुश्किल था ,एक बार की बात है जीतेन्द्र फिल्म की शूटिंग कर रहे थे जिसके एक शॉट में उन्हें ज़ोर ज़ोर से हँसना था लेकिन लाख कोशिश के बावजूद उन्हें सीन के मुताबिक हँसी नहीं आ रही थी ये देखकर कॉमेडियन महमूद ने जीतेन्द्र से कहा जैसे ही शॉट शुरू हो, वो उनकी तरफ देख लेंगें और वो एक दरवाज़े की आड़ में खड़े हो गए फिर जैसे ही शॉट शुरू हुआ, जीतेंद्र ने उन्हें देखा और ज़ोर -ज़ोर से हँसने लगे ये देखकर उनकी हँसी ही नहीं रुकी कि महमूद उन्हें हँसाने के लिए वहां अपनी पैन्ट उतारकर खड़े थे।
क्यों खरीद लिए थे सारे टिकट
साल 1967 में जीतेंद्र की तीन फिल्में बनीं -‘मोती’, ‘गुनाहों का देवता’ और ‘फ़र्ज़’ जिनमें से फ़र्ज़ के लिए वो ज़्यादा दर रहे थे क्योंकि इसके लिए कई एक्टर्स के मना करने के बाद जीतेंद्र ने हाँ की थी और इस के डायरेक्टर रविकांत नगाइच थे जो साउथ फिल्मों के सिनेमैटोग्राफरी करने के बाद बतौर डायरेक्टर बॉलीवुड में क़दम रख रहे थे। ख़ैर फिल्म जब रिलीज़ हुई तो जीतेन्द्र का डर सही साबित हुआ , उन्हें सिनेमाघर खाली पड़े मिले जीतेंद्र ये सोचकर और डर गए कि अभी अभी शुरू हुआ करियर कहीं खराब न हो जाए , इसीलिए उन्होंने 60 पैसे की टिकट को 5 हजार रुपए लगाते हुए ,फिल्म की सारी टिकटें खरीद लीं और जब लोगों को टिकट नहीं मिली तो सबने सोचा कि फिल्म इतनी अच्छी है कि टिकट नहीं मिल रही है तो सच में लोगों में फिल्म देखने का क्रेज बढा और वाकई फिल्म हाउसफुल होने लगी।यही वो फिल्म थी जिससे जीतेंद्र को रातोंरात पहचान मिल गई ,फिल्म के सुपरहिट गानों में मस्त बहारों का मैं आशिक…और जीतेंद्र के नये स्टाइल ने धूम मचाते हुए कपड़ों और जूतों का नया ट्रेंड ला दिया।
फिर जीतेन्द्र ने पीछे मुड़कर नहीं देखा :-
इसके बाद चॉल से निकलकर फिल्म इंडस्ट्री में राज करने वाले सुपर स्टार जीतेन्द्र ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और 6 दशकों के फिल्मी सफर में करीब 200 फिल्मों में काम किया है जिसमें ख़ास रहीं -कारवाँ ,बिदाई, धरम वीर, स्वर्ग नर्क, जानी दुश्मन ,फ़र्ज़ , हिम्मतवाला, तोहफा, स्वर्ग से सुंदर, खुदगर्ज और थानेदार ।
एक दौर ऐसा भी आया :-
1972-74 के बीच जीतेंद्र को काम मिलना कम हो गया था,तो उन्होनें अपनी सालों की कमाई लगाकर 1982 में फिल्म ‘दीदार-ए-यार’ बनाई जिसमें उन्हें 2.5 करोड़ का नुकसान हुआ लेकिन तब भी ज़िंदादिल जीतेन्द्र ने हार नहीं मानी और इस नुकसान से उभरने के लिए बैक-टू-बैक 60 फिल्में कीं, जिनमें से ज़्यादातर रीमेक थीं।
आज जीतेन्द्र का रुतबा :-
2002 से लेकर 2012 तक जीतेंद्र को 5 बार लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है। एक ख़ास बात आपको और बता दें कि जीतेंद्र का 22 फिल्मों में नाम विजय रखा गया है और 26 फिल्मों में रवि ,ये तो आपको याद ही होगा कि रवि उनका असली नाम भी है। 2014 में जीतेंद्र को दादा साहेब फाल्के लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है।
