Diwali Is Not Celebrated in 66 Village : 12 साल से इन 66 गावों में नहीं जलें दीपक, दिवाली पर पसरा रहता है सन्नाटा 

Diwali Is Not Celebrated in 66 Village : आज देश भर में दिवाली का पर्व मनाया जा रहा है। हर कोई खुशियों के रंगों में रंगा दिख रहा है। बाजारों में दीपक से लेकर मिठाईयां तक की खरीद की धूम मची हुई है। बच्चे आतिशबाजी कर रहें हैं। शाम को हिन्दू घरों में गणेश-लक्ष्मी की पूजा होगी। लेकिन उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में 12वीं बार 66 गांवों में दिवाली पर दीपक नहीं जलेंगे। इन गावों में दीपकों की रौशनी की जगह अंधेरा और सन्नाटा पसरा हुआ है। 

12 साल से दिवाली पर सुने पड़े हैं ये गांव 

2011 की जनगणना के अनुसार, इन गांवों को आधिकारिक तौर पर वीरान घोषित किया गया है, और अब ये खामोशी और खंडहरों में लुप्त हो चुके हैं। कभी इन गावों में उत्सव में धूम मची रहती थी लेकिन ये गांव अब सन्नाटे में डूबे हैं। भैसकोट जैसे गांव, जो मुनस्यारी रोड से कुछ किलोमीटर दूर हैं, वहां अंतिम बार दीपावली का दीप लगभग 12 साल पहले जला था। अब वहां की पगडंडियां सूनी हैं, घर जर्जर हो चुके हैं और मंदिर की घंटी वर्षों से नहीं बजी। इन गांवों की दीवारें और शहतीरें धीरे-धीरे सड़ांध और प्राकृतिक क्षरण का शिकार हो रही हैं।

2011 से खाली हो गए हैं 743 गांव 

उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों से पलायन कोई नई घटना नहीं है, लेकिन अब यह स्थायी प्रवृत्ति बन चुकी है। राज्य के ग्रामीण विकास और पलायन आयोग के आंकड़ों के अनुसार, 2011 के बाद से 734 गांव पूरी तरह से खाली हो चुके हैं, और 565 गांवों में आधे से अधिक लोग जा चुके हैं। पिथौरागढ़ जिले में ही 100 से अधिक गांव केवल नाम के लिए ही अस्तित्व में हैं।

इन वजहों से लोगों ने किया पलायन 

पलायन की मुख्य वजहों में शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव, रोजगार का संकट और बुनियादी सुविधाओं का न होना है। सामाजिक कार्यकर्ता प्रकाश पांडे के अनुसार, लोग गांव छोड़ने को मजबूर हैं, जब तक वहां सड़क, इंटरनेट, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाएं नहीं पहुंचेगी, पलायन रुकना मुश्किल है। प्राकृतिक आपदाओं का भी इस समस्या में योगदान है, जैसे तेंदुए के हमले और भूकंप जैसी घटनाएं।

खतरे में हैं ग्रामीण क्षेत्र 

सरकार की योजनाओं के बावजूद स्थिति में खास सुधार नहीं आया है। कई गांवों में मोबाइल नेटवर्क तक पहुंचने के लिए दूर-दराज़ के स्थानों पर पैदल चलना पड़ता है। कुछ गांव, जैसे भारत-चीन सीमा के पास के छह गांव, 1962 के युद्ध के बाद से ही खाली पड़े हैं। हालांकि, बागेश्वर जिले के खाती और वाछम जैसे कुछ गांव सामुदायिक पर्यटन के माध्यम से अपनी पहचान बनाए रखने में सफल रहे हैं, लेकिन अधिकांश गांव खामोशी और खंडहरों में डूबे हैं। यह स्थिति न केवल ग्रामीण जीवन के इतिहास और परंपराओं का अंत है, बल्कि आने वाले समय में इन इलाकों की संस्कृति और विरासत भी खतरे में पड़ सकती है।

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