जो देने आये थे वो देके गए और जो लेने आए थे वो लेके गए धर्मेंद्र !

अभिनेता धर्मेंद्र का भावुक बयान वायरल होने की तस्वीर

सबकुछ पाकर भी हासिल ए ज़िंदगी कुछ भी नहीं मैंने देखे हैं एक से एक सिकंदर खली हाँथ जाते हुए। ज़ोर ए मोहब्बत बना लिए हैं घर दिलों में अब दिलों से निकाले हम कहाँ निकलते हैं ,हम तीन में हैं न तेरा में हैं मगर खुदा की बन्दों की उस गिनती में हैं जो खुदा को मोहब्बत मोहब्बत को खुदा कहते हैं फिल्म जगत का वो ऐसा सितारा था जो चमकता था, चमकता है और सदा चमकता रहेगा क्योंकि वो बहोत सादा खूबसूरत इंसान था जिसे दिलों में उतरने का हुनर आता था वो दुनियाबी दौलत नहीं मोहब्बत की दौलत कमाने आया था और वही लेके भी गया है उनके चाहने वालों ने उनकी बीमारी की खबर सुनते ही दुआएँ माँगनी शुरू कर दी थीं फिर ऐसे में उनके जाने की झूठी खबरें भी सोशल मिडिया में आईं जिससे सबका दिल दहल गया सबके दिल में एक ही सवाल था कि वो जाँबाज़ जिसने आँखें और कर्तव्य जैसी फिल्मों में शेर के साथ दो दो हाँथ किये वो “ही -मैन” ऐसे कैसे ज़िंदगी की जंग हार सकता है लेकिन इस दुनिया में जो भी आता है उसे एक न एक दिन जाना ही पड़ता है और इसलिए हर दिल अज़ीज़ धर्मेंद्र साहब को भी ये जहाँ छोड़कर जाना पड़ा पर उन्होंने अपनी मंज़िल ए मक़सूद पर पहुंच कर आख़री साँस ली , फिल्मों के दीवानों ने ‘शोले ‘ फिल्म न देखी हो ऐसा तो हो ही नहीं सकता और जिन्होंने भी देखी है उन्हें उसके कुछ डायलॉग तो याद ही होंगे जिसमें एक मशहूर डायलॉग था “बसंती इन कुत्तों के सामने मत नाचना “,जो धर्मेंद्र पा जी अपनी बसंती यानी अभिनेत्री हेमा मालिनी जी के लिए बोलते हैं ,धर्मेंद्र जी के चाहने वाले आज तक न केवल उनकी इस दमदार आवाज़ की तासीर को महसूस करते हैं बल्कि रोमांटिक हीरो के साथ-साथ एक्शन हीरो की इमेज में भी उनका कोई सानी नहीं मानते और प्यार से उन्हें ही-मैन बुलाते हैं पर इतने स्ट्रांग दिखने वाले धर्मेंद्र जी अंदर से बहुत शर्मीले हैं ,इसके बावजूद उनके ,अल्फ़ाज़ों की अदायगी का लहजा उनकी एक्टिंग को और पुरकशिश बना देता है। मेरी इबादत में तासीर थी मासूमियत थी ,जो मुझे फिल्म मिल गयी , ये हसीनो जमील लोग कहाँ रहते हैं शहीद फिल्म देखकर लगा कामिनी कौशल दिलीप कुमार को देखकर। क्या आवाज़ इ ख़ल्क़ खिदमते ख़ल्क़ भी इबादते खुदा होती है

गाँव में बीता बचपन :-

बीते दिनों उनकी सेहत में आए उतार-चढाव की वजह से पूरे फिल्म जगत से लेकर सभी कला प्रेमियों ने उनके जल्द सेहतयाब होने के लिए खूब प्रार्थनाएँ की हैं। तो चलिए आज बात करते हैं उनके इस सफर की और पता करते हैं कि ये खूबसूरत बाँका जवान फिल्मों में आया कैसे ! और इसके लिए एक नज़र डालते हैं पंजाब के लुधियाना ज़िले में बसे उनके गाँव साहनेवाल पर जहाँ धर्म सिंह देओल 8 दिसंबर 1935 को एक जाट सिख परिवार में, किशन सिंह देओल और सतवंत कौर के घर पैदा हुए। हालाँकि उनका पुश्तैनी गाँव डांगो, लुधियाना के पास है पर बचपन बीता साहनेवाल गाँव में और लुधियाना के गांव ललतों कला में आपने पढ़ाई की ,जहाँ उनके पिता गाँव के ही स्कूल के प्रिंसिपल थे फिर 1952 में फगवाड़ा में मैट्रिक की पढ़ाई की।

गाँव से मुंबई तक का सफर आसान नहीं था :-

फगवाड़ा में उनकी बुआ का घर था और उनका बेटा वीरेंदर पंजाबी फ़िल्मों का सुपर स्टार और प्रोड्यूसर डायरेक्टर भी था जिनकी वजह से आपकी भी दिलचस्पी अभिनय में हुई थी लेकिन आतंक के दौर में लुधिआना में ही फ़िल्म ,’जट ते ज़मीन’ ,की शूटिंग के दौरान आतंकियों ने गोली मार कर उनकी हत्या कर दी थी इस घटना ने धर्मेंद्र जी को अकेला कर दिया। धर्मेंद्र बचपन से ही वो कला प्रेमी थे और उस वक्त उनके पास एक आस ये थी कि वो फिल्मफेयर पत्रिका के राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित ‘नए प्रतिभा पुरस्कार’ के विजेता बने थे और इसी बिना पर , फिल्म में काम करने के लिए पंजाब से मुंबई आ गए।

पहली पेमेंट थी 51 रुपये की :-

मुंबई पहूँचकर भी धर्मेंद्र जी काम की तलाश में खूब भटके तब कहीं जाके 1960 में अर्जुन हिंगोरानी की फिल्म ,”दिल भी तेरा हम भी तेरे” के साथ आपने फिल्मी दुनिया में क़दम रखा इस फिल्म में धर्म पाजी को 51 रुपये पेमेंट दी गई थी, वो भी एक नहीं बल्कि फिल्म के तीन निर्माताओं ने 17-17 रुपये जोड़कर धर्मेंद्र को ये रकम दी थी। इस फिल्म में उनकी हेरोइन थीं कुमकुम। आपको बता दें कि इस वक़्त तक धर्मेंद्र जी सनी देओल के पिता बन चुके थे ,19 साल की उम्र में प्रकाश कौर के साथ उनकी अरेंज मैरिज हुई थी।

परदे पर देखकर दिल थाम लेते थे लोग :-

इसके बाद 1961 में आपको फिल्म मिली, ‘बॉय फ्रेंड’ जिस में उनकी सहायक भूमिका थी पर उसे भी आपने अपने बेमिसाल अभिनय और ख़ूबसूरती के दम पर किसी को भूलने नहीं दिया , फिर कुछ ऐसी फिल्में उन्हें मिलती गईं जिससे 1967 तक उन्हें रोमांटिक हीरो का तमग़ा मिल गया ,और स्क्रीन पर आते ही वो अपनी दमदार पर्सनालिटी और खूबसूरत चेहरे में रूहानी सुकून देती ,भोली सी मुस्कुराहट से सबका दिल जीतने लगे फिर चाहे पर्दे पर हीरोइन कोई भी हो वो हर किसी के साथ परफेक्ट जोड़ी के रूप में नज़र आते और उन्हें रोमांस करते देखकर खासकर दर्शक महिलाएँ अपना दिल थाम लेती , यही नहीं ‘नायक’ शब्द को वो इसलिए भी सार्थक करते हैं कि हीरो वाली परफेक्ट पर्सनैलिटी रही उनकी ,वहीं ‘भाई’ के किरदार में भी वो खूब पसंद किए गए और सबके चहीते भाई बन गए ,बहनों के तो इतने अज़ीज़ रहे कि आज भी जब बहनें , ‘बहना ने भाई की कलाई पर …’ गीत सुनती हैं तो धर्मेंद्र जी का चेहरा आँखों के सामने आ जाता है।

मीना कुमारी के साथ जची जोड़ी :-
उन्होंने 60 के दशक में नूतन के साथ ‘सूरत और सीरत’ ,’बंदिनी’,’दिल ने फिर याद किया ‘,में काम किया। माला सिन्हा के साथ ‘अनपढ़’ , ‘पूजा के फूल’, ‘बहारें फिर भी आएगीं’ की ,और ‘आँखें ‘में नज़र आए ‘आकाशदीप’ में नंदा के साथ अभिनय किया फिर शादी , ‘आई मिलन की बेला ‘ और 1974 की ‘रेशम की डोरी’ में सायरा बानो के साथ नज़र आए पर उस वक़्त की आपकी बेहतरीन जोड़ी की बात करें तो मीना कुमारी के साथ आपको बेहद पसंद किया गया क्योंकि आप दोनों ही में ही, रूमानियत के साथ कशिश, सादगी और संजीदगी थी और आप दोनों ने कई फिल्मों में स्क्रीन साझा की थी , जिनमें थीं ‘मैं भी लड़की हूँ ‘ , ‘काजल’ , ‘पूर्णिमा’ , ‘फूल और पत्थर’,’मझली दीदी ‘,’चंदन का पालना ‘,’बहारों की मंज़िल’ और ‘फूल और पत्थर’, जो धर्मेंद्र की पहली एक्शन फिल्म थी।

‘फूल और पत्थर’ से मिली कामियाबी :-

यहां हम आपको ये भी बता दें कि धर्मेंद्र की डेब्यू फिल्म ‘दिल भी तेरा हम भी तेरे’ के रिलीज़ के क़रीब 6 साल बाद साल 1966 में फिल्म ‘फूल और पत्थर’ के ज़रिये उनको बॉलीवुड में वो पहचान मिली जिसके वो हक़दार थे ,जिसमें धर्मेंद्र पहली बार मीना कुमारी के साथ बतौर को-स्टार नज़र आए , जबकि उस वक़्त मीना कुमारी बॉलीवुड की सबसे महँगी और टॉप एक्ट्रेस थीं तो वहीं धर्मेंद्र बेहद नए कलाकार थे लेकिन जब इनकी जोड़ी बनी तो दर्शकों के दिल में बस गई और इन्हें स्क्रीन पर रोमैंटिक सीन में देखते ही सबकी साँसें थम जातीं। यहाँ हम आपको ये भी बताते चलें कि मीना कुमारी ने उस वक़्त ए-लिस्टर्स आर्ट्रिस्ट में धर्मेंद्र जी को लाने के लिए पूरा ज़ोर लगा दिया था ,फिर देखते ही देखते ‘फूल और पत्थर’ 1966 की सबसे ज़्यादा कमाई करने वाली फिल्म भी बन गई और धर्मेंद्र को पहली बार ‘सर्वश्रेष्ठ अभिनेता’ के फिल्मफेयर पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया फिर अगली फिल्म ‘अनुपमा’ में भी आपको खूब सराहना मिली और कई सम्मानों से भी नवाजा़ गया।

फिल्मफेयर में मिला सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का नामांकन :-

उसके बाद हमें उनके अभिनय से सजी बेहद हिट फिल्में मिलीं जैसे ,’आया सावन झूमके’, ‘मेरे हमदम मेरे दोस्त’, ‘इश्क पर ज़ोर नहीं’, ‘प्यार ही प्यार ‘और ‘जीवन मृत्यु’ जिनमें उन्होंने रोमैंटिक हीरो का रोल प्ले करते हुए हमारे दिलों में मक़ाम कर लिया फिर अपनी इमेज को थोड़ा बदलते हुए ,सस्पेंस थ्रिलर फिल्में कीं जैसे :- ‘शिकार’,’ब्लैकमेल ‘, ‘कब क्यूं और कहाँ ‘और ‘कीमत’ फिर साल 1971 की हिट फिल्म ‘मेरा गाँव मेरा देश’ में एक्शन हीरो बनके ,सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के फिल्मफेयर नामांकन तक पहुँच गए ,कहना चाहिए बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं धर्मेंद्र जी उन्होंने अभिनय के हर पहलू को छुआ और शिद्दत से निभाया।

हेमा मालिनी ने किया दिल में घर :-

1980 के दशक में पर्दे पर उनकी और हेमा जी की जोड़ी बेहद कामयाब रही और हेमा जी का ख़ुंमार धर्मेंद्र जी के दिल पर भी छा गया जिसके चलते शादी शुदा होने के बावजूद भी उन्होंने हेमा जी से शादी कर ली कहते हैं, इसके लिए उन्हें कागज़ी तौर पर अपना धर्म भी बदलना पड़ा था पर ये धर्मेंद्र जी के लिए उनकी पत्नी प्रकाश कौर का प्यार ही था कि ऐसे वक़्त भी वो उनके साथ खड़ी रहीं और कई इंटरव्यू में ये बयान दिया कि धर्मेंद्र जी की खुशी में ही उनकी खुशी है फिर एक इंटरव्यू में भी धर्मेंद्र को ग़लत ठहराए जाने वाले सवाल पर वो धर्मेंद्र का बचाव करते हुए बोलीं हेमा हैं हीं ऐसी कि कोई भी पुरुष उन पर आकर्षित हो सकता है ये सिर्फ मीडिया के सामने दिया गया एक बयान नहीं था बल्कि वो आज भी अपनी बात पे क़ायम है उन्हें धर्मेंद्र जी से कोई शिकायत नहीं है और शायद उनका परिवार आज भी इसीलिए एक है। धर्मेंद्र भी प्रकाश जी की तारीफ करते हुए कहते हैं कि उन्हें परिवार को साथ लेके चलना आता है इसीलिए उनकी दोनों बीवियों में ,बच्चों – बेटे -सनी और बॉबी , बेटियों अजीता, विजेता अहाना और ईशा सब में बहोत लगाव और प्रेम है।
हेमा और धर्मेंद्र की जोड़ी ने ‘राजा जानी ‘, ‘सीता और गीता’ , ‘शराफत’, ‘नया ज़माना’, ‘पत्थर और पायल ‘, ‘तुम हसीन मैं जवान’, ‘जुगनू’,’ड्रीम गर्ल’, ‘दोस्त’, ‘चरस’, ‘मां’, ‘चाचा भतीजा’,’आज़ाद’,’सत्यकाम ‘,और ‘शोले’ जैसी बेशकीमती फिल्में हमें बतौर तोहफा दी हैं ।


नई जेनेरेशन के साथ भी किया काम :-

धर्मेंद्र जी की हिट फिल्मों का दौर जो चला वो आज तक नहीं थमा जी हां आज भी वो हमें कभी – कभार पर्दे पे नज़र आते रहते हैं,अभी हाल ही में ,’तेरी बातों में ऐसे उलझा जिया’ ,फिल्म में शाहिद कपूर के दादा का रोल प्ले किया था ,इससे पहले कि ‘यमला पगला दीवाना तो आपको याद ही होगी जिसमें वो अपने बेटों सनी देओल और बॉबी देओल के साथ दिखे थे।
धर्मेंद्र जी ने अपने पांच दशकों के करियर में 300 से अधिक फिल्मों में काम किया, जिनमें 1976 और 1984 के बीच कई एक्शन फिल्मों में अभिनय किया।
वो अभिनेता के साथ साथ निर्माता और राजनीतिज्ञ भी हैं और लोकसभा क्षेत्र बीकानेर के सासंद रहे हैं ।
1997 में, उन्हें हिंदी सिनेमा में उनके योगदान के लिए फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड मिला और
2012 में, भारत सरकार ने आपको भारत के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म भूषण से सम्मानित किया गया ।

दिलीप कुमार भी बनना चाहते थे धर्मेंद्र जैसा :-

धर्मेंद्र साहब को 1997 में फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार मिला जिसे, अभिनेता दिलीप कुमार और उनकी पत्नी अभिनेत्री सायरा बानो के हाँथो से स्वीकार करते हुए , धर्मेंद्र और दिलीप जी दोनों भावुक हो गए इस अवसर पर दिलीप साहब ने कहा था कि “मै जब अल्लाह से मिलूँगा तो बस एक शिकायत करूँगा ,पूछूँगा कि – आपने मुझे धर्मेंद्र की तरह इतना सुंदर क्यों नहीं बनाया?”। 

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