धारकुंडी महाराज ने 22 साल में धारण किया था वैराग्य, ऐसे पड़ा आश्रम का नाम, खुद सामाधि स्थल का किए थें चयन

सतना। सुविख्यात संत परमहंस स्वामी सच्चिदानंद महाराज मुंबई में ब्रम्हलीन हो गए। उनका पार्थिव देह सतना जिले के बिंरसिहपुर स्थित धारकुंडी आश्रम लाया गया और अंतिम दर्शन के लिए रखा गया है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव रविवार को दोपहर 3.40 बजे आश्रम पहुंच कर महाराज जी के अंतिम दर्शन कर रहे है।

22 साल में शुरू हुआ था वैराग्य का जीवन

परमहंस सच्चिदानंद महाराज के वैराग्य का जीवन 22 वर्ष की आयु में शुरू किया था। उनहोने अपना पूरा जीवन मानव कल्याण तथा आध्यात्मिक उन्नति के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने मानस बोध और गीता बोध जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना किए थें। आश्रम द्वारा उनके प्रवचनों और सारसंग्रह पर आधारित कई पुस्तकें प्रकाशित की गईं।

खुद सामाधि स्थल का किए थें चयन

जानकारी के तहत जीवित रहते हुए ही परमहंस सच्चिदानंद महाराज ने समाधि स्थल का चयन किया था। उनकी पार्थिव काया को धारकुंडी आश्रम के गर्भगृह में समाधि दी जाएगी। उनके गुरु भाई, चुनार के सक्तेशगढ़ आश्रम के संत स्वामी अडग़ड़ानंद महाराज कई जानेमाने संत धारकुंडी आश्रम पहुच रहे है और वे महाराज के सामाधि की तैयारी कर रहे है।

ऐसे पड़ा धारकुंडी आश्रम का नाम

धारकुंडी नाम दो शब्दों, धार और कुंडी से बना है। धार का अर्थ है जलधारा और कुंडी का अर्थ है जलराशि। यह पवित्र जलधारा प्राकृतिक रूप में घने जंगलों से बहती है और वन्य जीवों के जीवन का आधार बनती है। धारकुंडी की भूमि भले ही भौतिक रूप से छोटी हो, लेकिन हमेशा से आध्यात्मिक ऊर्जा का स्रोत रही है। धारकुंडी का शांत, एकांत और आनंदमय वातावरण हमेशा से आत्म-खोज करने वाले ऋषियों और साधुओं को आकर्षित करता रहा है। यह स्थल अनादिकाल से धार्मिक और आध्यात्मिक केंद्र रहा है।

धारकुंडी आश्रम से जुड़ी प्रमुख बातें:

  • वैराग्य और साधना: महाराज परमहंस सच्चिदानंद जी ने कम उम्र में वैराग्य के बाद चित्रकूट में 11 वर्षों तक कठोर साधना की, जिसके बाद धारकुंडी में आश्रम की नींव रखी।
  • नामकरण: विंध्याचल की पहाड़ियों के बीच से हमेशा बहने वाली पानी की “धार” और गुफा के पास बने “कुंड” के कारण इस सिद्ध स्थल का नाम धारकुंडी पड़ा।
  • ऐतिहासिक महत्व: स्थानीय मान्यता अनुसार, यह स्थान महाभारत कालीन ऋषियों की तपोस्थली है और यहाँ अघमर्षण कुंड स्थित है।
  • स्वयं किया समाधि चयन: 101 वर्ष की आयु में ब्रह्मलीन होने वाले महाराज ने अपने समाधि स्थल का चयन स्वयं ही किया था, जहाँ उन्हें बाद में समाधि दी गई।
  • अनुशासन: आश्रम में साधना के साथ-साथ निःशुल्क भोजन (भंडारा) की व्यवस्था है, जहाँ श्रद्धालु खुद अपना जूठा बर्तन धोते हैं। 

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