आकर्षक विज्ञापनों ने भारत के बाजार की शक्ति को बिगाड़ा, वैश्विक बाजारवादी शक्तियां पर रीवा विश्वविद्ययल में चितंन

रीवा। अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय के एमबीए (प्रबंधन) विभाग में ‘वैश्विक बाजारवादी शक्तियां’ विषयक अध्ययन अध्याय का शुभारंभ कुलगुरु प्रो. राजेंद्र कुड़रिया की अध्यक्षता एवं पत्रकार कैलाश चन्द्र की गरिमामयी उपस्थिति में संपन्न हुआ। मुख्य वक्ता के रूप में भोपाल से आये कैलाश चन्द्र ने वैश्विक बाजारवादी शक्तियों, बहुराष्ट्रीय कंपनियों तथा बिग टेक कंपनियों की कार्यप्रणाली पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि वैश्विक कंपनियां विज्ञापनों, ब्रांडिंग और उपभोक्तावादी रणनीतियों के माध्यम से लोगों की सोच एवं जीवनशैली को प्रभावित कर बाजार पर अपना वर्चस्व स्थापित करती हैं।
उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि आकर्षक विज्ञापनों के जरिए भारतीय उपभोक्ताओं की आदतों में बदलाव लाया गया, जिससे विदेशी कंपनियां भारत से भारी मुनाफा अर्जित कर रही हैं, जबकि भारतीय कंपनियां समान उत्पाद बनाने के बावजूद प्रतिस्पर्धा में पिछड़ रही हैं। उन्होंने वैश्विक कॉरपोरेट समूहों, उनके फाउंडेशन, गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) तथा वैश्विक आर्थिक प्रभाव के विभिन्न पहलुओं पर भी विस्तार से चर्चा की।

प्राकृतिक खेती प्रभावित

डॉ. आशीष ने कृषि क्षेत्र में वैश्विक बाजारवादी शक्तियों की भूमिका पर पीपीटी प्रस्तुति देते हुए कहा कि विदेशी कंपनियों द्वारा रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के बढ़ते उपयोग ने प्राकृतिक खेती को प्रभावित किया है। इससे कृषि भूमि की उर्वरता, पर्यावरण और उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है तथा भारतीय कृषि को विदेशी कृषि उत्पादों पर निर्भर बनाने की प्रवृत्ति बढ़ी है। डॉ. अजीत प्रताप सिंह ने पशुपालन को लाभकारी बनाने, देसी गौवंश के संरक्षण तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने के उपायों पर अपने विचार रखे। उन्होंने गौ संरक्षण को आर्थिक रूप से व्यवहारिक एवं आत्मनिर्भर मॉडल बनाने की आवश्यकता पर बल दिया। कैप्टन राणा प्रताप सिंह ने सेना क्षेत्र में विदेशी कंपनियों की भूमिका पर अपने विचार व्यक्त किए। वहीं डॉ. सोमिल श्रीवास्तव ने युवाओं के बीच वैश्विक नैरेटिव, नेपाल एवं बांग्लादेश सहित अन्य कई देशों में हुए आंदोलनों के सामाजिक एवं वैचारिक प्रभावों का विश्लेषण प्रस्तुत किया।

कुलपति ने कहा भारत के लिए यह जरूरी

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कुलगुरु प्रो. राजेंद्र कुड़रिया ने सभी वक्ताओं के विचारों का समेकन करते हुए भारतीय भाषा, वेशभूषा, संस्कृति, परिवार और सामाजिक मूल्यों के संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि भारत की सांस्कृतिक पहचान और पारिवारिक मूल्यों का संरक्षण वर्तमान समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।

कार्यक्रम के प्रारंभ में वैश्विक बाजार संगठन के प्रांत संयोजक डॉ. आलोक सिंह ने विषय की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए अध्ययन समूह, शोध के विभिन्न उपकरणों तथा विषय की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम का सफल संचालन विवेक जायसवाल ने किया, जबकि आभार प्रदर्शन प्रबंधन विभाग के डॉ. अतुल पांडे ने किया। कार्यक्रम में शिवनारायण,विश्वजीत,रमेश साहू, डॉ हरिश्चन्द्र,हरिनारायण, डॉ कमलेश गौतम, डॉ अतुल तिवारी,डॉ अनिल पटेल, शशांक,डॉ चन्द्रमणि,विश्वविद्यालय के अनेकों प्राध्यापक, शोधार्थी, विद्यार्थी तथा बड़ी संख्या में बुद्धिजीवी उपस्थित रहे।

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