Interesting Aspects Of Amrish Puri's Life: वो फिल्म इंडस्ट्री के ऐसे विलेन रहे जिनके बस कुछ डायलॉग्स बोल दिए जाएँ तो उनका नाम ज़ुबाँ पर आ जाता है जी हाँ जैसे 'मोगैंबो खुश हुआ', 'जा सिमरन जा, जी ले अपनी ज़िंदगी ', 'जो ज़िंदगी मुझसे टकराती है वो सिसक-सिसक कर दम तोड़ती है', और 'हमारे खिलाफ क़लम चलाना बंद कर दे, कहीं मेरी क़लम चल गई तो तेरी...' बेशक ये अमरीश पुरी जी ही हैं जिनकी दमदार एक्टिंग ,आवाज़ और अंदाज़ को हम भूल ही नहीं सकते।
डायलॉग्स की तासीर आज भी वैसी है जैसी कल थी :-
हालाँकि अमरीश पुरी के इन आइकॉनिक डायलॉग के साथ ये फिल्में भी खूब हिट हुईं और “मोगैंबो खुश हुआ!” बोलकर आपने (मिस्टर इंडिया) फिल्म के ‘मोगैंबो’ के किरदार को जीवंत कर दिया तो “जा सिमरन जा, जी ले अपनी जिंदगी!” (दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे) फिल्म के डायलॉग को तो इस तरह अदा किया कि बस इसे बोलते ही एक सख़्त बाप जो अब तक विलेन जैसा था वो हर बेटी के लिए हीरो बन गया। “जो ज़िंदगी मुझसे टकराती है, वो सिसक-सिसक कर दम तोड़ती है।” (घायल) फिल्म के इस डायलॉग की बात करें तो ये दर्शकों में आज भी वैसा ही डर पैदा करता है जैसा कल करता था ,दूसरी तरफ “हमारे खिलाफ क़लम चलाना बंद कर दे, कहीं मेरी क़लम चल गई तो तेरी…” (शहंशाह) फिल्म का ये डायलॉग उनके किरदार की दबंगई और अथॉरिटी को हमारे मन मस्तिष्क पर काबिज़ कर देता है तो वहीं “आदमी के पास दिमाग़ हो तो वो दर्द भी बेच सकता है।” (ऐतराज़ ) फिल्म का ये डायलॉग बिना फिल्म देखे भी उनके किरदार की उस हिम्मत उस होशियारी को बयाँ कर देता है जिसकी वजह से वो अपनी मुश्किलों को भी सुनहरे मौके में तब्दील करने का हुनर जानता है।
फिल्मों से निकलकर डायलॉग पहुँचे आम बोल-चाल की भाषा में :-
अमरीश पूरी के डायलॉग्स दर्शकों को इतने पसंद आए कि फिल्मों से निकलकर आम जन की बोली भाषा में रच बस गए अब किसी भी बन्दे को ज़रा ख़ुश कर दो तो वो कहता “मुग़ैम्बो ख़ुश हुआ” और किसी लड़की की बात मानना हो तो हर कोई कहता “जा सिमरन जा ,जी ले अपनी ज़िंदगी ” ये था अमरीश पुरी का जादू ,इस बात से आप अमरीश जी की लोकप्रियता और अभिनय की गहराई का अंदाज़ा लगा सकते हैं ,यूँ तो 12 जनवरी 2005 को वो इस दुनिया से चले गए थे पर उनके निभाए किरदार आज भी बॉलीवुड के सबसे बेहतरीन विलेन के रूप में उन्हें आज भी जीवंत किए हुए हैं।
विलेन की एक नई परिभाषा रची :-
शायद अमरीश पुरी जी ने भारतीय सिनेमा में विलेन की एक नई परिभाषा रची है अपने निभाए किरदारों के ज़रिये जिसमें एक विलेन पूरे दाँव पेच लगाते हुए पूरी पूरजोशी से खूँख़्वार जानवर की तरह अपने शिकार पर झपटता है और आखिर में जब वो हीरो के आगे ढेर होता है ,मात खाता है तो दर्शकों को ये महसूस होता है मानो उन्होंने ही कोई बड़ी खतरनाक जंग जीत ली हो और वो ख़ुशी में तालियाँ बजाने से खुद को रोक नहीं पाता है।
रील और रियल में थे बिलकुल जुदा :-
पर आपको पता है विलेन का ये पैमाना तय करने वाले और अक्सर फिल्मों में आग बबूला रहने वाले अमरीश पुरी अपनी असल ज़िंदगी में काफी खुशमिज़ाज इंसान थे और उनसे मिलने वाला हर इंसान ख़ुश होकर जाता था ,उन्होंने फिल्मों में ये मक़ाम हासिल करने के लिए काफी मेहनत की थी और अपने दौर के सबसे महँगे और सबसे खूँख़्वार खलनायक रहे, अमरीश पुरी कभी क्लर्क हुआ करते थे।
नौकरी करने के बावजूद एक्टिंग से जुड़े थे :-
22 जून 1932 को पंजाब के नवागांव में पैदा हुए अमरीश पुरी साहब ने बीमा कंपनी में 21 साल तक क्लर्क की जॉब की पर अभिनय में बड़ी दिलचस्पी थी इसलिए थिएटर से भी जुड़े रहे और जब भी मौका मिलता नाटकों में भाग लेते थे इसी तरह साल 1967 में उन्होंने मराठी सिनेमा में क़दम रखा उनकी पहली मराठी फिल्म थी ‘शंततु! कोर्ट चालू आहे’ , बॉलीवुड में उनकी एंट्री हुई साल 1970 में आई देव आनंद की फिल्म ‘प्रेम पुजारी’ से , तब वो 38 साल के रहे होंगे , इस फिल्म से बॉलीवुड से अपने एक्टिंग करियर की शुरुआत करके अमरीश जी ने केवल विलेन ही नहीं बल्कि कई मुख़्तलिफ़ किरदारों में जान डालते हुए बतौर खलनायक अपनी अलग पहचान बनाई और हिंदी सिनेमा में 3 दशक से ज़्यादा राज किया।
उनके रौब के आगे हीरो भी फीके पड़ जाते थे :-
हिंदी सिनेमा में अमरीश पुरी के जलवे उनके मर्तबे की बात करें तो वो सुपर स्टार्स को भी टक्कर देते थे ,बड़े पर्दे पर उनकी मौजूदगी हो तो किसी भी नायक को उनके सामने डटकर खड़े रहने के लिए काफी माद्दे की ज़रूरत पड़ती थी ऐसा उनके बारे में खुद हीरो ही कहते थे। यहाँ हम उनके निभाए सपेरे के किरदार को कैसे भूल सकते हैं जो आज भी नगीना फिल्म के ज़रिए एक मिसाल पेश करता है। अमरीश जी ने अपने अंदाज़ को बदलते हुए कुछ पॉज़िटिव रोल भी निभाए और तब भी दर्शकों ने सुधरा हुआ मानकर खूब प्यार दिया मतलब उनका निभाया हर किरदार सबको भाया और और अमरीश जी हरदिल अज़ीज़ एक्टर बने रहे।
सबसे पहले पहचान दिलाई फिल्म ‘रेशमा और शेरा’ ने :-
अमरीश पुरी को सबसे पहले बड़ी पहचान मिली ,1971 में आई फिल्म ‘रेशमा और शेरा’ से ,इसके बाद तो उनके अभिनय से सजी बेहतरीन फिल्मों की झड़ी ही लग गई जो आज भी अमरीश पूरी जी को याद करते ही हमारे ज़हेन में दस्तक देती हैं जी हाँ जैसे – मिस्टर इंडिया, मुझसे शादी करोगी, दिलवाले दुल्हनियाँ ले जाएँगें ,ईमान धरम ,अंधा कानून, हम पांच, शहंशाह, मेरी जंग, विरासत, बादशाह, गदर, राम लखन, करण अर्जुन, घातक, विश्वात्मा, नगीना और परदेस जैसी फिल्में जो उनके बेमिसाल अभिनय की अमिट छाप छोड़ती हैं। आपको ये भी बताते चलें कि अमरीश पुरी जी ने अपने साढ़े तीन दशक से लम्बे करियर में 400 से भी ज़्यादा फिल्मों में काम किया है।
