51 Years Of Emergency : आपातकाल के फैसले में इंदिरा गांधी के बेट संजय का भी रोल था… तानाशाही से कांपती थी दिल्ली!

51 Years Of Emergency : 51 साल पहले आज ही के दिन भारत में एक काला दौर शुरू हुआ था, जिसे हम आज भी याद करते हैं। 25 जून 1975 को पूरे देश में आपातकाल लगा दिया गया, जिसने लोकतंत्र को पूरी तरह से तहस-नहस कर दिया। उस रात से शुरू हुआ वह सन्नाटा, जिसने देश के कहने-सुनने के अधिकार सभी छीन लिए। अखबारों पर सेंसर लग गया, विपक्षी नेता जेल में डाल दिए गए और आम जनता का जीवन डर और तानाशाही की चपेट में आ गया। आइए जानते हैं, उस काले दौर की पूरी कहानी।

देश में आपातकाल कब-कब लगा?

26 अक्टूबर 1962: भारत-चीन युद्ध के कारण यह आपातकाल लगा, जो जनवरी 1968 तक चला।
3 दिसंबर 1971: भारत-पाकिस्तान युद्ध के कारण यह आपातकाल लगा, जो अभी भी जारी रहा।
25 जून 1975: तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सलाह पर संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल की घोषणा कर दी। यह सबसे विवादित और काला दिन था।

1971 में देश में इमरजेंसी क्यों लगी थी?

आपातकाल की ये कहानी 1971 से शुरू होती है। 1971 के चुनाव में इंदिरा गांधी रायबरेली से चुनाव लड़ रही थीं। उनके खिलाफ राजनारायण नाम के उम्मीदवार था। उस वक्त रायबरेली में राजनारायण की जीत की हवा चल रही थी, लेकिन चुनाव परिणाम में इंदिरा गांधी जीत गईं। इसके बाद राजनारायण ने चुनाव में धांधली का आरोप लगाते हुए हाईकोर्ट में याचिका डाली। जज जगमोहन लाल सिन्हा ने 12 जून 1975 को फैसला सुनाया कि इंदिरा गांधी की जीत अस्वीकार्य है और उन्हें चुनाव लड़ने का अधिकार नहीं है। इस फैसले से सरकार में खलबली मच गई।

आधी रात को इंदिरा गांधी ने की थी इमरजेंसी की घोषणा

25 जून 1975 की आधी रात को राष्ट्रपति ने इंदिरा गांधी की सलाह पर आपातकाल की घोषणा कर दी गई थी।
सुबह होते-होते देश का पूरा राजनैतिक नक्शा बदल ही गया। विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी शुरू हो गई। अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मोरारजी देसाई, चौधरी देवीलाल जैसे बड़े नेताओं को बिना मुकदमे जेल में डाल दिया गया। अखबारों की खबरें सेंसर कर दी गईं। पत्रकारों पर भी लगाम लगाई गई। जो आवाजें सरकार के खिलाफ उठती थीं, उन्हें दबाने का प्रयास किया गया।

आपातकाल के पीछे संजय गांधी का था रोल

आपातकाल में इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी का भी बड़ा बोलबाला था। उन्हें सरकार का कोई पद नहीं था, पर वे फैसले लेते थे। नसबंदी अभियान, जमीन तोड़फोड़ और दूसरे कई फैसले संजय गांधी के ही हाथ में थे। आलोचक कहते थे कि उनके बिना इंदिरा गांधी का राज चल नहीं सकता। कहते हैं कि इस काले दौर की शुरुआत में ही एक बड़ा कदम पूर्व कांग्रेस नेता और बंगाल के मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर राय ने सुझाया था। उन्होंने ‘आंतरिक आपातकाल’ का प्रस्ताव रखा, जिसे इंदिरा गांधी ने तुरंत मान लिया।

लोकनायक जयप्रकाश नारायण सबसे बड़े विरोधियों में से थे। उन्होंने 25 जून को इसे ‘राष्ट्रीय अपमान का दिन’ कहा। आपातकाल हटने के बाद उन्होंने युवाओं से लोकतंत्र की रक्षा की चेतावनी दी। इस दौर में कई कवि और लेखक अपने विरोध को शब्दों में पिरोते थे। भवानी प्रसाद मिश्र ने ‘त्रिकाल संध्या’ नामक कविता लिखी, जिसमें उन्होंने सरकार के अत्याचारों का विरोध किया। डॉ. धर्मवीर भारती ने भी अपनी कविता ‘मुनादी’ में इस काले दौर का दर्द बयां किया।

आपातकाल की दिल्ली में डर के मारे बाहर नहीं निकलते थे लोग?

आपातकाल में दिल्ली में लोग डर के मारे बाहर निकलने से भी डरते थे। झुग्गी-झोपड़ियों को तोड़ा गया, हजारों परिवार बेघर हो गए। विरोध करने वालों को गिरफ्तार किया गया। दिल्ली में अकेले 1050 से अधिक लोगों को जेल में डाला गया। पूरे भारत में करीब 1 लाख 10 हजार से ज्यादा लोगों को बिना मुकदमे जेल में डाल दिया गया।

आज भी आपातकाल के वो काले दिन देश की आत्मा के लिए किसी गहरी चोट से कम नहीं हैं। देश में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल पर विवाद समय-समय पर भाजपा द्वारा उठाया जाता रहा है।

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