World Adolescent Mental Wellness Day In TRS Rewa : डिजिटल युग में यंगस्टर्स की मेन्टल हेल्थ पर विशेष संवाद-रीवा। आज के डिजिटल दौर में किशोरों के सामने आने वाली मानसिक चुनौतियां किसी से छिपी नहीं हैं। इसी गंभीर विषय पर प्रकाश डालने और समाधान तलाशने के उद्देश्य से, शासकीय ठाकुर रणमत सिंह महाविद्यालय, रीवा के समाजशास्त्र विभाग ने विश्व किशोर मानसिक कल्याण दिवस के अवसर पर एक विशेष व्याख्यान एवं संवाद कार्यक्रम का आयोजन किया। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य छात्रों, शिक्षकों और समाज को डिजिटल युग में किशोरों के बिगड़ते मानसिक स्वास्थ्य और उसके समाधान के प्रति जागरूक करना था। टीआरएस कॉलेज, रीवा में विश्व किशोर मानसिक कल्याण दिवस पर आयोजित संवाद कार्यक्रम में डिजिटल युग में किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य पर चर्चा। पढ़ें रिपोर्ट और जानें बचाव के उपाय। कार्यक्रम का निर्देशन महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ. अर्पिता अवस्थी ने किया। कार्यक्रम की शुरुआत छात्रा संध्या वर्मा द्वारा मां सरस्वती की वंदना से हुई, जिसके बाद अतिथियों ने दीप प्रज्वलित कर एवं पुष्प अर्पित कर कार्यक्रम की औपचारिक शुरुआत की।
कार्यक्रम का उद्देश्य और परिचय
Program Objective and Introduction
कार्यक्रम के संयोजक एवं समाजशास्त्र विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. अखिलेश शुक्ल ने अपने उद्बोधन में विषय की गंभीरता को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि आज का डिजिटल युक हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन चुका है, लेकिन इसने किशोरों के सामने मानसिक स्वास्थ्य की नई चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं। “समय रहते इन चुनौतियों के समाधान खोजना और किशोरों को एक सुरक्षित एवं सकारात्मक वातावरण प्रदान करना हम सभी की सामाजिक एवं नैतिक जिम्मेदारी है,” उन्होंने जोर देकर कहा। इस अवसर पर अपने विचार रखते हुए कार्यक्रम के सह-संयोजक डॉ. महानन्द द्विवेदी ने कहा कि किशोर मानसिक स्वास्थ्य केवल एक व्यक्तिगत मसला नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि परिवार और शिक्षण संस्थानों का सहयोग ही किशोरों को मानसिक रूप से स्वस्थ बनाए रख सकता है।
मुख्य वक्ता के विचार-डिजिटल युग में किशोर मानसिक स्वास्थ्य की चुनौतियां
Keynote Speaker’s Insights-Challenges of Adolescent Mental Health in the Digital Age
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता डॉ.धीरेंद्र मिश्रा (एसोसिएट प्रोफेसर, मनोरोग विभाग, मेडिकल कॉलेज सतना) ने अपने विचारों से उपस्थित लोगों को गहराई से सोचने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने डिजिटल युग को एक दोधारी तलवार बताते हुए कहा कि जहाँ इसने जीवन को सरल बनाया है, वहीं इसने कई मानसिक समस्याओं को भी जन्म दिया है। डॉ. मिश्र ने उपस्थित छात्रों से एक महत्वपूर्ण सवाल पूछा, “क्या हम 24 घंटे बिना मोबाइल के रह सकते हैं?” उन्होंने डिजिटल डिटॉक्स की अवधारणा पर चर्चा करते हुए कहा कि यह आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। उन्होंने बताया कि स्मार्टफोन और इंटरनेट की अत्यधिक लत किशोरों में तनाव,अवसाद,चिंता और अकेलेपन जैसी गंभीर समस्याओं को जन्म दे सकती है।
किशोरावस्था-एक संवेदनशील पड़ाव
Adolescence-A Sensitive Phase
डॉ. मिश्र ने बताया कि 10 से 19 वर्ष की आयु पहचान निर्माण और भावनात्मक संवेदनशीलता का सबसे महत्वपूर्ण चरण होता है। इस उम्र में निर्णय लेने की क्षमता पूरी तरह विकसित नहीं होती, जिससे डिजिटल संसार का प्रभाव उन पर और अधिक गहरा पड़ता है।
- भारत में स्थिति-उन्होंने बताया कि भारत में लगभग 253 मिलियन किशोर हैं, जिनमें से 40 प्रतिशत से अधिक इंटरनेट का नियमित उपयोग करते हैं।
- डिजिटल खाई-स्मार्टफोन की बढ़ती पहुंच ने अवसर तो बढ़ाए हैं, लेकिन इसने शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच डिजिटल खाई (Digital Divide) को भी स्पष्ट कर दिया है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि तकनीक अपने आप में बुरी नहीं है, बुरा है उसका अनुचित और अत्यधिक उपयोग। उन्होंने संतुलित डिजिटल उपयोग, अभिभावकों और शिक्षकों के बीच सहयोग और व्यापक जागरूकता को ही इस समस्या का सबसे कारगर समाधान बताया।
शिक्षकों एवं छात्रों की सक्रिय भागीदारी
Active Participation of Teachers and Students
यह संवाद कार्यक्रम केवल व्याख्यानों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह छात्रों और शिक्षकों के बीच एक खुली बहस का मंच बन गया। कार्यक्रम में डॉ. शाहेदा सिद्दीकी, डॉ. फरजाना बानो, डॉ. प्रियंका पांडे, डॉ. निशा सिंह, डॉ. गुंजन सिंह, डॉ. प्रियंका तिवारी, डॉ. रावेन्द्र सिंह, डॉ. मिर्जा अख्तर बेग, डॉ. ब्रह्मेन्द्र मिश्र, डॉ. अश्वनी द्विवेदी, योगेश निगम और रत्नेश मिश्र सहित कई प्राध्यापकों ने सक्रिय भागीदारी की। छात्र-छात्राओं ने भी इस अवसर पर उत्साह दिखाते हुए अपने मन में उठ रहे प्रश्नों को सीधे मुख्य वक्ता के सामने रखा। डॉ. मिश्र ने सभी प्रश्नों का बहुत ही सरल और वैज्ञानिक तरीके से उत्तर देकर उनकी जिज्ञासाओं को शांत किया। कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ. फरजाना बानो ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन डॉ. प्रियंका पांडे ने दिया।
निष्कर्ष-Conclusion-टी.आर.एस. कॉलेज, रीवा में आयोजित यह विशेष संवाद कार्यक्रम एक महत्वपूर्ण पहल साबित हुआ। इसने स्पष्ट कर दिया कि डिजिटल युग में किशोरों के सामने मानसिक चुनौतियाँ बेहद गंभीर हैं और इनसे निपटने के लिए केवल व्यक्तिगत प्रयास ही नहीं, बल्कि परिवार, समाज और शिक्षा संस्थानों की सामूहिक जागरूकता और सक्रिय भूमिका अत्यंत आवश्यक है। ऐसे आयोजन न केवल जागरूकता फैलाते हैं, बल्कि समाज को एक सकारात्मक और संवेदनशील दिशा देने का काम भी करते हैं।

