Women Safety Act India: क्या है POSH-2013 अधिनियम,महिलाओं के लिए क्यों है जरूरी ?-आज भारत में महिलाएं हर क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभा रही हैं-कार्यालय, शिक्षण संस्थान, मीडिया, उद्योग, तकनीक, निजी कंपनी, सरकारी विभाग और असंगठित क्षेत्र तक। लेकिन कार्यस्थल पर सुरक्षा और सम्मान प्रदान करना एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। महिलाओं को मानसिक, शारीरिक और आर्थिक रूप से सुरक्षित रखने के उद्देश्य से भारत सरकार ने कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 (POSH Act) बनाया,जो हर महिला को सुरक्षित वातावरण में काम करने का मौलिक अधिकार देता है। यह कानून न सिर्फ यौन उत्पीड़न को अपराध घोषित करता है, बल्कि शिकायत करने से लेकर न्याय दिलाने तक की पूरी प्रक्रिया को स्पष्ट रूप से निर्धारित करता है। भारत का POSH अधिनियम 2013 कार्यस्थल पर महिलाओं को यौन उत्पीड़न से सुरक्षा प्रदान करता है। जानें-यौन उत्पीड़न की परिभाषा, शिकायत प्रक्रिया, ICC/LCC,नियोक्ताओं के कर्तव्य, दंड और महिलाओं के लिए जागरूकता क्यों महत्वपूर्ण है।
POSH Act 2013 क्या है ?
यह एक व्यापक और बाध्यकारी कानून है जो कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न को रोकने, नियंत्रित करने और उसका निवारण करने के लिए लागू किया गया है। यह कानून संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्रों पर लागू होता है।
कानून का मुख्य उद्देश्य –
- महिलाओं को सुरक्षित और सम्मानजनक कार्य वातावरण देना
- यौन उत्पीड़न की घटनाओं को रोकना
- शिकायत के समाधान के लिए न्यायसंगत तंत्र स्थापित करना
- नियोक्ताओं को जिम्मेदार बनाना
कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की परिभाषा (Section 2(n))
POSH अधिनियम के अनुसार, यौन उत्पीड़न में शामिल हैं-
- अनुचित शारीरिक संपर्क या स्पर्श
- गंदे इशारे, अशोभनीय संकेत
- यौन संबंध हेतु दबाव या प्रस्ताव
- अश्लील टिप्पणी, संदेश, मज़ाक
- अश्लील सामग्री दिखाना
- अस्वीकृति पर धमकी, प्रताड़ना या कार्यस्थल का प्रतिकूल माहौल बनाना महत्वपूर्ण यह उत्पीड़न शारीरिक, मौखिक, या गैर-मौखिक-किसी भी रूप में हो सकता है।
किन स्थानों को कार्यस्थल माना गया है ?
कानून में “कार्यस्थल” की परिभाषा बहुत व्यापक है, जिसमें शामिल हैं-
- कार्यालय, स्कूल, कॉलेज, अस्पताल
- फैक्ट्री, दुकान, बैंक
- निजी कंपनियां, NGO
- बस, ट्रेन, आधिकारिक यात्रा
- Work from Home स्थितियां
- घर (यदि कोई महिला घरेलू कामगार या केयरगिवर हो)
नियोक्ताओं के अनिवार्य कर्तव्य (Section 4, 19)
आंतरिक शिकायत समिति (ICC) का गठन-10 या अधिक कर्मचारियों वाले हर संस्थान में ICC का होना अनिवार्य है। इसमें 4 सदस्य होते हैं, जिसमें एक बाहरी सदस्य भी शामिल होता है।
कार्यस्थल पर POSH नीति लागू करना-नियोक्ता को स्पष्ट रूप से दफ्तर में POSH Policy प्रदर्शित करनी चाहिए।
जागरूकता और प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करना-सभी कर्मचारियों और अधिकारियों के लिए POSH training अनिवार्य है।
शिकायत प्रक्रिया का पारदर्शी संचालन-महिलाओं को सुरक्षित माहौल और गोपनीय शिकायत प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराना।
कानून उल्लंघन पर दंड-ICC ना बनाने पर ₹50,000 तक का जुर्माना लग सकता है।
शिकायत प्रक्रिया-ICC और LCC
ICC (Internal Complaints Committee)-10 या अधिक कर्मचारियों वाले संस्थानों में बनाई जाती है। शिकायत 3 महीने के भीतर की जा सकती है ,ICC 90 दिनों में जांच पूरी करती है,10 दिनों में रिपोर्ट नियोक्ता को सौंपनी होती है।
LCC (Local Complaints Committee)
उन स्थानों के लिए जहां-10 से कम कर्मचारी हों ,ICC का गठन संभव न हो,10 से कम कर्मचारी हों,ICC का गठन संभव न हो,महिला असंगठित क्षेत्र में कार्यरत हो-यह समिति जिला अधिकारी द्वारा गठित की जाती है।
दंड और कार्रवाई-दोषी व्यक्ति पर
- नौकरी से निलंबन या बर्खास्तगी
- सेवा नियमों के तहत कार्रवाई
- चेतावनी, वेतन कटौती या परामर्श
नियोक्ता पर - ICC न बनाने पर ₹50,000 जुर्माना
- बार-बार उल्लंघन पर लाइसेंस रद्द तक हो सकता है
महिलाओं के लिए यह जागरूकता क्यों जरूरी है ?
आज अधिकांश महिला कर्मचारी अपने काम में पूरी दक्षता के साथ आगे बढ़ रही हैं। लेकिन कार्यस्थल पर-
- वैचारिक मतभेद
- व्यवहारिक असहमति
- पद, शक्ति या वरिष्ठता का दुरुपयोग
- निजी अथवा पेशेवर संघर्ष-कभी-कभी ऐसे हालात पैदा कर देते हैं जहां महिला असुरक्षित या असहज महसूस कर सकती है। ऐसी परिस्थितियों में POSH अधिनियम महिलाओं को कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है। अगर महिलाएं इन अधिकारों के बारे में जागरूक हों,वे समय पर शिकायत कर सकती हैं ,गलत आचरण का विरोध कर सकती हैं ,अपनी मानसिक, शारीरिक और आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित कर सकती हैं , कानून द्वारा उपलब्ध लाभ उठा सकती हैं।
निष्कर्ष-POSH अधिनियम 2013 महिलाओं की सुरक्षा, सम्मान और समान अवसरों को सुनिश्चित करने का एक महत्वपूर्ण कानून है। यह न सिर्फ अपराधी को दंडित करता है, बल्कि नियोक्ताओं को भी एक सुरक्षित और संवेदनशील कार्य वातावरण बनाने के लिए बाध्य करता है। हर महिला, चाहे वह किसी भी पेशे में हो, इस कानून को समझकर अपने अधिकारों का उपयोग कर सकती है। जागरूकता ही सुरक्षा का सबसे पहला कदम है।
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