ज़ितार के अविष्कारक नीलाद्री कुमार का क्यों है ज़माना दीवाना

NEELADRI (1)

Niladri Kumar: नीलाद्रि कुमार का नाम ज़ुबाँ पे आते ही ‘ज़ितार’ यानी केवल पाँच तारों वाला इलेक्ट्रिक सितार याद आ जाता है वो वाद्ययंत्र जिसे नीलाद्रि ने सितार के एक संशोधित, विद्युतीकृत संस्करण, के तौर पर बनाया और 2008 में एल्बम (“ज़ितार”) के नाम से दुनिया के सामने पेश किया हालाँकि नीलाद्री के इस संशोधन से संगीत जगत में बड़ी उथल पुथल मची कुछ लोग ख़ुश थे तो कुछ नाख़ुश।

कार्तिक कुमार की पाँचवी पीढ़ी के वादक :-

रवि शंकर के शिष्य नीलाद्रि कुमार, सितार वादक कार्तिक कुमार के बेटे हैं साथ ही उनकी पांचवीं पीढ़ी के सितार वादक हैं उन्होंनें महज़ चार साल की उम्र में अपने पिता से सितार सीखना शुरू किया था और छह बरस की उम्र में पुडुचेरी के श्री अरबिंदो आश्रम में अपनी पहली परफॉर्मेंस दी थी और तब से लेकर आज तक सबको अपनी दिलकश धुनों से सबको दीवाना बना रहे हैं।

मास्टर पीस बनाए :-

नीलाद्रि 20 से अधिक अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय एल्बमों में अपनी रचनाएँ प्रस्तुत कर चुके हैं, अनेक पुरस्कार उनके नाम हैं। कुछ स्पेशल प्रज़ेंटेशन्स को याद करें तो उन्होंनें ज़ाकिर हुसैन के साथ मास्टर्स ऑफ़ पर्कशन टूर में भाग लिया, जोनास हेलबोर्ग और वी. सेल्वागनेश के एल्बम “काली का बेटा” और जॉन मैकलॉघलिन के एल्बम “फ्लोटिंग पॉइंट” में भी अपने वादन का जलवा दिखाया है।

ज़िटार नाम कैसे पड़ा :-

भोले से चेहरे में बड़ी -बड़ी ज़ुल्फ़ें बिखेरे मस्त अंदाज़ में अपनी धुनों से सबको अपना मुरीद बनाने वाले नीलाद्रि जुगलबंदी में भी माहिर हैं ज़ितार के बारे में नीलाद्रि ने बताया था कि जब उन्होंनें इसे बनाया तो उन्हें इससे छोटा, तेज़ और अनोखा कुछ नहीं लगा इसलिए इसके नाम में उन्होंनें Z लगाया है ताकि इसका तीखापन (sharpness) समझ में आए और इसे उल्टा कर दो तो ये सितार के S से भी जुड़ा रहा है।

फिल्म संगीत से जुड़ाव :-

नीलाद्रि ने हिंदी सिनेमा के भी बड़े जाने माने संगीत निर्देशकों के साथ काम किया है, जिनमें एआर रहमान, शंकर-एहसान-लॉय और प्रीतम शामिल हैं। नीलाद्रि ने 15 से ज़्यादा एल्बम बनाए हैं लेकिन अगर आप उनके ज़ितार की धुन को फिल्मों में सुनना चाहें तो हम आपको बता दें कि फिल्म ‘गैंगस्टर’ में , ‘ना जाने कोई’,  ‘माई नेम इज़ ख़ान ‘ के ‘तेरे नैना’ और ‘धूम 2’ के ‘क्रेज़ी किया रे’ ,’माज़ी’ के ‘मोरा जिया ‘, ‘देसी बॉयज़’ के ‘मेक सम नॉइज़’ गानों में आप उनकी ज़ितार की धुन सुन सकते हैं ,इसके अलावा भी कई फिल्मों में उन्होंनें पारंपरिक वाद्य यंत्र बजाए हैं उनकी सितार का आनंद भी आप कई फिल्मों में ले सकते हैं जैसे ‘पहेली’ के गानें – ‘धीरे जलना’,’दबंग 2 के ‘तोरे नैना बड़े दगाबाज़ रे’, ‘7 खून माफ ‘के ‘आवारा’ ‘कलंक’ के  ‘घर मोरे परदेसिया’ ,’बाहुबली: द बिगिनिंग के  ‘मनोहारी’ और ‘आशिक़ी 2’ के  ‘सुन रहा है ‘ में। बतौर संगीत निर्देशक उन्होंनें ‘लैला मजनू’ में काम किया है जिसमें अविनाश तिवारी और तृप्ति डिमरी ने मुख्य भूमिका निभाई है और इसके लिए फिल्मफेयर आरडी बर्मन पुरस्कार जीता जो फिल्म संगीत में उभरती हुई प्रतिभाओं के लिए दिया जाता है।

सम्मानों की बात :-

मार्च 2007 में, नीलाद्रि को संगीत नाटक अकादमी के उस्ताद बिस्मिल्लाह खान युवा पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जो युवा संगीतकारों को दिया जाता है। उन्होंने अपने एल्बम, “इफ” के लिए सर्वश्रेष्ठ शास्त्रीय/फ्यूजन वाद्ययंत्र के लिए एमटीवी इमेज पुरस्कार भी जीता है। मार्च 2013 में, नीलाद्रि ने भारतीय शास्त्रीय संगीत में उनके योगदान के लिए 51वें महाराणा कुंभा संगीत समारोह में एमएन माथुर पुरस्कार जीता।

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