Aatm Manthan :सच के रास्ते पर चलना किसी तपस्या से कम नहीं है इसीलिए आज के ज़माने में इस मार्ग पर चलना और भी मुश्किल हो गया है क्योंकि तपस्या है तो कष्ट मिलना निश्चित है और जब हम आधुनिक दौर में हर काम को आसानी से करना चाहते हैं तो तकलीफों भरा रास्ता हर कोई नहीं पसंद कर सकता फिर कहते भी हैं कि सच कड़वा होता है इसे कहना और सुनना दोनों आसान नहीं होता इसी वजह से बावजूद इसके कि हमें बचपन से सिखाया जाता है झूठ बोलना पाप है हम सच बोलने और सुनने की हिम्मत नहीं कर पाते।
कभी-कभी तो यूँ लगता है झूठ के बिना काम ही नहीं चलता क्योंकि अच्छा काम जल्दी कोई करता नहीं या अपने कर्तव्य का सही ढंग से निर्वहन नहीं करता और अगर किसी को बता दो कि वो अच्छा काम नहीं कर रहा है तो वो हमसे नाराज़ हो जाता है फिर चाहे वो अपना हो या पराया हम उसके लिए दुश्मन ही बन जाते हैं तो फिर कैसे अपना सच स्वीकार करें और वहीं दुनिया के सामने लाने की हिम्मत करें , दूसरे के लिए भी सच बोलें।
इस काम को करने के लिए सबको अपने जैसा समझना उसके दुख सुख की अनुभूति करना बहोत ज़रूरी है क्योंकि ऐसा करके ही हम किसी के सामने खुद को जैसे हैं वैसे रख पाएँगें अपनी ग़लतियों को मानेंगें दूसरों की भी ग़लतियों को निसंकोच उसके सामने रख पाएँगें और अगर आगाह करने के बाद भी कोई ग़लत फैसला ले ले तो उसे अपना मानकर उसके नुकसान या दुख में उसके साथ खड़े रह पाएँगें पर हाँ ये करना भी बहोत मुश्किल है।
शायद इसी मुश्किल का अंदाज़ा लगाकर ही संत कबीरदास जी ने अपने दोहे में कहा है “साँच बराबरि तप नहीं, झूठ बराबर पाप। जाके हिरदै साँच है ताकै हृदय आप॥” अर्थात सत्य के मार्ग पर चलने से बड़ी कोई तपस्या नहीं है और झूठ बोलने से बड़ा कोई पाप नहीं है। जिनके मन में सच्चाई निवास करती है, उनके हृदय में स्वयं भगवान का वास होता है, क्योंकि सत्य ही ईश्वर है। सच के मार्ग पर चलने वाले लोगों को ये सत्य ही जीवन पथ पर आगे बढ़ने के लिए नई ऊर्जा और विश्वास देता है।
यहाँ सत्य के मार्ग की तुलना तपस्या से और सच की ईश्वर से की गई है क्योंकि जहाँ सत्य का मार्ग किसी तपस्या जैसा कठिन और दुखों से भरा होता है वहीं सच को अपनाने वाले का मन सदैव संतुष्ट और प्रसन्न रहता है मानों उसके ह्रदय में स्वयं भगवान रहते हों, उसे प्रभु प्राप्ति के सामान सुख की अनुभूति होती है ,किसी बनावटी चेहरे की ज़रूरत उसे नहीं रह जाती। सच बोलकर या स्वीकार कर लेने के बाद हमें भेद खुल जाने जैसे डर नहीं सताते वहीं झूठ या मिथ्या आचरण से बड़ा कोई पाप कर्म इसलिए नहीं है क्योंकि इससे किसी न किसी का नुकसान तो होना तो निश्चित है साथ ही अगर थोड़ा सा भला हो भी जाए तो ऐसा नहीं हो सकता कि झूठ से किसी को कोई दीर्घकालिक सुख मिल जाए। ग़ौर ज़रूर करियेगा इस बात पर फिर मिलेंगें आत्म मंथन की अगली कड़ी में धन्यवाद।
