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बकरीद पर क्यों दी जाती है दुम्बा की कुर्बानी, अटूट प्रेम, त्याग और समर्पण की दिलाता है याद

क़ुरबानी की ईद। ईदुल उल अजहा इस्लाम धर्म में विश्वास करने वाले लोगों का एक प्रमुख त्यौहार है। रमजान के पवित्र महीने की समाप्ति के लगभग ७० दिनों बाद इसे मनाया जाता है। इस्लामिक मान्यता के अनुसार हज़रत इब्राहिम अपने पुत्र हज़रत इस्माइल को इसी दिन खुदा के हुक्म पर खुदा कि राह में कुर्बान करने जा रहे थे, तो अल्लाह ने उसके पुत्र को जीवनदान दे दिया जिसकी याद में यह पर्व मनाया जाता है।

अटूट प्रेम, त्याग और समर्पण की दिलाता है याद

ईदुल उल अजहा यानि की बकरीद पर कुर्बानी पैगंबर इब्राहिम अलैहिस्सलाम के अल्लाह के प्रति अटूट प्रेम, त्याग और समर्पण की याद में दी जाती है। यह त्योहार हज़रत इब्राहिम द्वारा अपने बेटे इस्माइल को खुदा के हुक्म पर कुर्बान करने की परीक्षा को याद दिलाता है। यह अपनी सबसे प्यारी चीज़ अल्लाह की राह में न्योछावर करने का प्रतीक है।

कुर्बानी के पीछे के मुख्य कारण

ऐतिहासिक संदर्भ- अल्लाह के आदेश पर हज़रत इब्राहिम अपने बेटे इस्माइल की कुर्बानी देने के लिए तैयार हो गए थे। जब इब्राहिम ने अपने बेटे की कुर्बानी देने की कोशिश की, तो अल्लाह ने उनके बेटे की जगह एक मेमने को रख दिया, क्योंकि अल्लाह को इब्राहिम की वफादारी पसंद आई थी।
अल्लाह की रजा- यह रस्म अल्लाह के आदेश के पालन और समर्पण को दर्शाती है, न कि केवल जानवर की बलि को।
अहंकार का त्याग- यह अपने अहंकार, लालच और सांसारिक मोह को छोड़ने का संदेश देती है।
सेवा और भाईचारा- कुर्बानी का गोश्त गरीबों, रिश्तेदारों और परिवार में बांटा जाता है, जो साझा करने और जरूरतमंदों की मदद करने की भावना को बढ़ावा देता है।

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