किसको सँवारें तन को मन को या मस्तिष्क को !

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Aatm Manthan :कभी-कभी उदासियाँ हमें यूँ घेर लेती हैं कि लगने लगता है कि अब ख़ुशी कैसे मिलेगी या पता ही नहीं होता कि सुखी जीवन कैसे मिलता है ! क्या धन दौलत से मिलता है ? क्या हमारे पास इतनी अक़्ल ही नहीं है कि हम अपने लिए सुख ढूँढ सकें ! कुछ इसी तरह के सवाल हम खुद से करने लगते हैं लेकिन अक्सर जवाब नहीं मिलता है तो चलिए आज इसी का जवाब ढूंढने की कोशिश करते हैं।

हमारी सबसे बड़ी पूँजी क्या है :-

हमारे पास सबसे बड़ी पूँजी हमारा शरीर होता है इस शरीर को माँ हमारे पैदा होते ही सँवारने लगती है और विधाता का धन्यवाद देते नहीं थकती इसलिए इसे स्वच्छता के साथ स्वस्थ बनाए रखना हमारा कर्तव्य होता है जिससे हमारा मन भी अच्छा रहे और हम अपने शरीर से काम लेकर अपनों की अपेक्षाओं पर भी खरे उतर सकें और कभी तो हम ये कर भी लेते हैं धन भी कमा कर सुख सुविद्याएँ भी जूता लेते हैं लेकिन अक्सर हमारा मन नहीं ख़ुश हो पाता हम उसे मनाने के जातां भी करते हैं और वो है तो हज़ार नखरे दिखाता है पर हम फिर भी उसको बहलाए जाते हैं पर जब नहीं बहलता तो हम दुखी हो जाते हैं।

कौन-कौन है जुड़ा :-

यहाँ ये जान लेना ज़रूरी है कि हम किसी को भी अकेले अच्छा करके सुख नहीं प्राप्त कर सकते क्योंकि हमारा तन ,मन और मस्तिष्क सब आपस में जुड़े हुए हैं यानी एक ठीक तो दूसरा भी ठीक महसूस करता है कोई किसी पे हावी नहीं होता दिल -दिमाग़ मिलकर भी सही फैसले करते हैं लेकिन सबसे पहले मन को खुश ज़रूरी है क्योंकि जब मन नहीं अच्छा होता तो हमारा किसी काम में दिल नहीं लगता।

मन को शुद्ध कैसे करें :-

मन को अच्छा रखना इसलिए मुश्किल है क्योंकि ये जैसा विचार रखेगा ये वैसा ही महसूस करेगा और इसे निर्मल भावनाओं से युक्त रखने के लिए हमें किसी के बारे में भी बुरे विचार रखने से बचना पड़ेगा हर हाल में सबके बारे में अच्छा सोचना पड़ेगा अपने ही नहीं दूसरों के भी ग़म में दुखी और ख़ुशी में सुख को महसूस करना पड़ेगा।

क्या है मन का स्नान :-

जिस प्रकार पानी से नहा धोकर हम स्वच्छ और स्वस्थ बनते हैं उसी प्रकार बुरे विचारों का त्याग ,मन का स्नान है जिसके बाद हम स्वच्छ और स्वस्थ महसूस करते हैं। यहाँ हम ये कह सकते हैं कि विचारों की शुद्धि मन को प्रसन्न करने का पहला मार्ग है तो दूसरा मार्ग संतोष है जिससे ईर्ष्या जैसे भाव मन में नहीं आते हम अपने कर्मों के अनुरूप ही फल की आशा करते हैं और उसे पाकर संतुष्ट हो जाते हैं।

मन को खुश क्यों रखना है :-

मन अच्छा है तो आप आपने शरीर को भी देखेंगे उसे भी स्वच्छ और स्वस्थ बनाने का प्रयत्न करेंगे फिर संत रविदास ने कहा भी है कि” मन चंगा तो कठौती में गंगा “कहने का मतलब ये है कि आपका मन अच्छा है तो आप बिना गंगा के स्नान के भी सुख प्राप्त कर सकते हैं ,कठौती का शाब्दिक अर्थ लकड़ी से बने बर्तन के उस पानी से है जो मैला हो इतना मैला कि उसमें चमड़ा बार -बार डुबोया गया हो ,आगे की बात का अर्थ है इसके बावजूद ये आपको गंगा सा पवित्र और पुण्य एहसास दे सकता अगर आपका मन अच्छा है। ग़ौर ज़रूर करियेगा इस बात पर फिर मिलेंगें आत्ममंथन की अगली कड़ी में धन्यवाद।

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