Aatm Manthan: मूल्यांकन करना अच्छा है पर किसका ,और क्यों ? क्या मिलता है इससे तो आइये आज यही जानने की कोशिश करते हैं। परखना या मूल्यांकन करना अच्छा तो है पर जब खुद का किया जाए क्योंकि इससे हमें अपनी ग़लतियाँ जानने और सुधारने का मौका मिलता है ,मार्ग प्रशस्त होता है और हम अपनी तय शुदा मंज़िल तक आसानी से पहुँच जाते हैं।
मूल्यांकन बुरा कैसे हुआ :-
मूल्यांकन तब बुरा हो जाता है जब हम किसी और का मूल्यांकन करने लगते हैं ,इससे न केवल हमारा समय बर्बाद होता है बल्कि दुःख भी पहुँचता है, तरह-तरह के सवाल मन में उठते हैं – उसने ऐसा किया ,क्यों किया, ऐसा है वो, वैसा है वो, और भी जाने क्या -क्या। पर ज़रा सोचिए इन उलझनों में उलझना अच्छा है ? दूसरों के लिए अपने मन में अच्छी -बुरी धारणा बना कर हमें क्या मिलेगा सिवाय तकलीफ के ! जब हम अगर कोई अच्छा है तो न हम उसके जैसा बन पा रहे हैं और अगर वो बुरा है तो न हम उसको अच्छा बना पा रहे हों मतलब किसी पर हमारा कोई ज़ोर नहीं चलता सेवाय अपने जब हमारा किसी पे कोई इख़्तेयार नहीं तो किसी को परखने से या उसके कामों का मूल्यांकन करने से क्या फायदा।
मूल्यांकन किसका करें :-
इसलिए अच्छा है हम अपने कर्मों पर अपने व्यवहार पर नज़र रखें और अपना ही मूल्यांकन करें ताकि हमें सही ग़लत की पहचान हो और आगे आने वाले समय में हम अपने को कुछ भी ग़लत करने से रोक सकें खुद पर नियंत्रण रख सकें और ज़ाहिर है जब हम अपने हिसाब से अपने अंतर्मन के तर्क वितर्क के साथ अच्छा बुरा सोच समझकर आगे बढ़ेंगें तो सही फैसले करेंगे जिससे हमें ख़ुशी मलेगी ,हमारा मन प्रसन्न रहेगा।
किसी और को कब परखें :-
तो आख़िर में हम कह सकते हैं कि मूल्यांकन करना हो तो अपना करें बिना मतलब किसी और का मूल्यांकन तब तक न करें जब तक ये आपके लिए आवश्यक न हो या कोई बात उस परख पर निर्भर न हो। ग़ौर ज़रूर करियेगा इस बात पर फिर मिलेंगें आत्ममंथन की अगली कड़ी में ,धन्यवाद।

