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जब ज़िद पर अड़ जाए हम…

न्याज़िया
मंथन। कई बार हमारा मन ज़िद पर अड़ जाता है पर हर ज़िद को मान लेना अच्छा नहीं होता कई बार खुद को मना लेना भी अच्छा होता है, नहीं! क्योंकि ज़िद की बात करें तो वो सिर्फ अपने बारे में सोचती है , उसमें किसी का कोई नुकसान भी हो जाए तो वो उस वक़्त हमें नहीं दिखता, हमारा मन तो बस वो देखता है जो हमें चाहिए एक दम न समझ बच्चा हो जाता है।

थोड़ा धीरज धरें

जब ज़िद हद से बढ़ जाए और जुनून रोके न रुके तो ख़ुद थोड़ा रुक के सोचें क्या जो आप चाहते हैं वो मिल जाए तो उसके बाद किसी और चीज़ की या उसकी भी ज़रूरत नहीं रहेगी जो हमारी ये ज़िद पूरी करने के बाद अगली ज़िद नहीं पूरी कर पाएगा तो ज़रा धीरज से सोचें ऐसी ज़िद पूरी होने से भी क्या फायदा जिसका असर किसी और पे भी पड़े और वो भी बुरा ,इसलिए अंजाम पर भी नज़र डाल लें।

आपकी ज़िद अच्छी या बुरी

ज़िद करना बुरा नहीं है लेकिन ज़िद भी ऐसी हो कि उससे हमें कुछ अच्छा मिले तो वो अच्छी है , और अगर सिर्फ वो अर्थहीन ज़िद हो, जिसके मिल जाने के कुछ वक्त बाद ही हम फिर से बोर हो जाए तो दिल को बहला लेना ये कह देना कि कोई बात नहीं ष्ये नहीं मिला तो क्या हुआष् ,अच्छा है। क्योंकि किसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए कभी कभी ज़िद करनी पड़ती है तभी हम सफल होते हैं ।

ज़िद या आदत

कभी कभी हम मन को मार कर अपनी एक ज़िद छोड़ देते हैं लेकिन जल्द ही दूसरी ज़िद पकड़ लेते हैं तो कहीं ज़िद करना हमारी आदत ही तो नहीं ,जिससे हम निकल ही नहीं पाते बतौर शर्त उस पर खुद भी चलते हैं और अपनों को भी चलने पर मजबूर करते हैं। तो ज़रा अपनी ज़िद पर ग़ौर करें कि हमारी ज़िद हमें कहां ले जा रही है या हमारी ज़िद से कोई दुखी तो नहीं हो रहा है , हमारी ज़िद हमें बना रही है या बिगाड़ रही है क्योंकि ज़िद के पीछे का लक्ष्य अच्छा है तभी ज़िद अच्छी है।
फिर मिलेंगे आत्म मंथन की अगली कड़ी में…

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