Story of Shri Ram worshipping Goddess Shakti in Hindi: भगवती दुर्गा की पूजा केवल मनुष्य ही नहीं, बल्कि देवता भी किया करते थी, ऐसी ही एक कथा रामायण से प्राप्त होती है। जब भगवान श्री राम ने लंका पर चढ़ाई कर रखी थी। तब उन्होंने लंका विजय हेतु देवी दुर्गा का व्रत लिया था। व्रत के अनुसार श्रीराम द्वारा माता को 108 नीलकमल अर्पित करने थे। लेकिन माता ने एक श्री राम की परीक्षा हेतु एक नीलकमल का का फूल गायब कर दिया। माता के पूजन को पूर्ण करने के लिए श्रीराम अपना नेत्र माँ को अर्पित करने वाले होते हैं, तभी माँ श्रीराम के हाथ पकड़ लेती हैं और उन्हें, विजयश्री का आशीर्वाद देती हैं।
नारद जी श्रीराम को देवी दुर्गा के पूजन का परामर्श देते हैं
रामायण की कथानुसार जब भगवान राम अपने भाई लक्ष्मण और समस्त वानर सेना के साथ, लंका पर चढ़ाई किए रहते हैं। श्रीराम और रावण के सेनाओं के मध्य युद्ध चल रहा होता है। तब ब्रम्हा जी के आदेश पर देवर्षि नारद श्रीराम को शक्ति की अधिष्ठात्री देवी भगवती दुर्गा के पूजन करने का परामर्श देते हैं। नारद जी श्रीराम को बताते हैं- वृत्रासुर से युद्ध के समय देवराज इन्द्र ने, त्रिपुर वध के समय भगवान शिव ने और मधु-कैटभ के वध के समय भगवान श्री हरि विष्णु ने भी भगवती दुर्गा की स्तुति की थी।
श्रीराम की शक्ति पूजा
नारद जी के परामर्श के अनुसार भगवान राम नवरात्रि का उत्तम व्रत रखते हैं, और विधि-विधान से देवी की पूजा करते हैं। नियमानुसार अनुसार श्रीराम व्रत के अंतिम दिन, भगवती महामाया को दुर्लभ नीलकमल के 108 पुष्प अर्पित करने का संकल्प लेते हैं। अपने भाई के पूजन की तैयारी का जिम्मा लक्ष्मण जी पर रहता है, वह निशा पूजा के लिए दुर्लभ 108 नीलकमल के पुष्प लाते हैं।
देवी दुर्गा द्वारा श्रीराम की परीक्षा लेना
इधर माँ भवानी अपने आराधक की परीक्षा के लिए एक पुष्प छुपा लेती हैं। रात्रि के समय जब भगवान देवी दुर्गा की निशा पूजा के लिए आते हैं, तो उन्हें एक पुष्प गायब मिलता है। तब भगवान श्रीराम लक्ष्मण जी को, पुनः एक नीलकमल लेने भेजते हैं। इधर रावण को जब इस स्थिति के बारे में पता चलता है, तब वह पूजा खंडित करने के उद्देश से पूरे लंका द्वीप के नीलकमल गायब करवा देता है। लक्ष्मण जी को नीलकमल नहीं मिलते हैं, अब बड़ी विडंबना माँ का व्रत कैसे पूरा हो।
व्रत और संकल्प खंडित होने का डर
हनुमान जी लंका के बाहर के स्थानों से दुर्लभ नीलकमल लाने का आश्वासन देते हैं। पर श्रीराम उन्हें रोक देते हैं, क्योंकि निशारात्रि पूजन का शुभ मुहूर्त बीतने वाला होता है। स्थिति बहुत ही मुश्किल हो जाती है, देवी का व्रत खंडित होने का भय भी पूरी सेना पर व्याप्त होने लगता है।
जब श्रीराम देवी दुर्गा को अर्पित करने वाले थे अपना नेत्र
तभी सहसा भगवान श्रीराम के मस्तिष्क में एक विचार कौंधता है। उनको याद आता है बचपन में उनकी माँ उन्हें कमल नयन कहती थीं। क्योंकि उनकी आँखें कमल पुष्प के पंखुड़ियों सदृश्य थीं और उनका वर्ण भी श्याम है। तो 108 वां नीलकमल मिल गया, वह निर्णय लेते हैं अपना एक नेत्र देवी को अर्पित करेंगे। वह इसके बारे में अपने अनुज लक्ष्मण सहित सब को अवगत कराते हैं। सभी श्रीराम को रोकने का असफल प्रयास करते हैं।
भगवती दुर्गा स्वयं प्रकट होकर श्रीराम को विजय श्री का वरदान देती हैं
भगवान एक तीर हाथों पर लेकर, उससे अपनी आँख निकालने का उद्योग कार ही रहे होते हैं। तभी बड़ी तीव्र गर्जना होती है, तेज हवाएँ चलनी लगती हैं, भगवती आदिशक्ति जगदंबा स्वयं प्रकट होकर भगवान राम के हाथ पकड़ लेती हैं। देवी दुर्गा भगवान राम को आँख निकालने से रोकती हैं और बताती हैं, उन्हें एक नीलकमल का फूल पहले ही प्राप्त हो गया है। वह तो श्रीराम की परीक्षा ले रहीं थीं। श्री राम के व्रत और संकल्प से प्रसन्न देवी दुर्गा उन्हें जल्द ही रावण वध और लंका विजय का आशीर्वाद देती हैं और अंतर्ध्यान हो जाती हैं।