Maihar Temple Story In Hindi: नवरात्र शक्ति के आराधना का पर्व होता है, इस समय देश भर के देवी मंदिरों और शक्तिपीठों में, श्रद्धालुओं की भारी भीड़ होती है, ऐसा ही एक मंदिर और शक्तिपीठ मध्यप्रदेश के मैहर में स्थित है, जो माँ शारदा को समर्पित है। जिसके बारे में माना जाता है, यहाँ दर्शन से भक्तों की हर मनोकामना पूर्ण होती है, इस मंदिर को बहुत रहस्यमयी भी माना जाता है। क्योंकि मान्यता है यहाँ अभी भी रात में कोई माँ के दर्शन और पूजन के लिए आता है, क्या है इस मंदिर का रहस्य और इसकी धार्मिक मान्यता आइए जानते हैं।
Maihar Mandir Ka Itihas Hindi Mein
मैहर शक्तिपीठ और मंदिर
मैहर एक सुप्रसिद्ध हिंदू तीर्थ और धार्मिकस्थल है, जो माँ शारदा को समर्पित है। यह मंदिर विंध्यपर्वत के कैमूर शृंखला की एक ऊंची पहाड़ी पर स्थित है, जिसे त्रिकूट पर्वत कहते हैं, इस पर्वत की ऊंचाई लगभग 600 फुट है। इस पर्वत की तलहटी से ही विंध्य की सुप्रसिद्ध नदी तमसा या टोंस भी बहती है, जिसे स्थानीय भाषा में टमस कहा जाता है। इस मंदिर तक पहुँचने के लिए 1052 सीढ़ियां चढ़के जाना जाता है, हालांकि प्रशासन द्वारा अब यहाँ रोपवे की व्यवस्था भी हो गई है।
क्या है धार्मिक मान्यता
पौराणिक कथाओं के अनुसार जब पति के अपमान से आहत दक्षकन्या सती ने पिता के घर आत्मदाह कर लिया था, तब भगवान शिव सती की मृत देह को अपने शरीर में लाद कर विलाप करते हुए, समस्त संसार में विचरण कर रहे थे, तब देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की, वह भगवान शिव को इस स्थिति से बाहर निकाले और उनका अनुराग समाप्त करें, क्योंकि जब तक सती की देह है, तब तक महादेव शिव का मोह उससे बना ही रहेगा।
देवताओं की प्रार्थना पर भगवान श्रीहरि ने अपने सुदर्शन से सती के देह को 51 टुकड़ों में बाँट दिया, चक्र से विदीर्ण अंग जहाँ-जहाँ गिरते थे, वहाँ-वहाँ एक शक्तिपीठ का निर्माण हो गया था, माना जाता है देवी का कंठ कट कर यहाँ गिरा था, और इस शक्तिपीठ का निर्माण हुआ, चूंकि कंठ स्वर और वाणी का मूलस्थान होता है, इसीलिए यह शक्तिपीठ स्वर, संगीत और वाणी की देवी शारदा को समर्पित है, जो आदिकाल से ही विद्वानों और ऋषि-मुनियों द्वारा वंदित रहीं हैं।
इसके अलावा यह भी माना जाता है यहाँ माता का कंठहार गिरा था, मैहर का शाब्दिक अर्थ सरल भाषा में होता है, माई का हार। लेकिन कई विद्वान मैहर का शाब्दिक अर्थ माई का आहर अर्थात आँगन बताते हैं। कहते हैं, आदिकाल से ही यहाँ शक्तिपीठ था, लेकिन सामान्य लोगों की नजरों से ओझल था, बाद में भगवान आदिशंकराचार्य ने इस शक्तिपीठ को खोजा और पूजन करके उसे जागृत किया। जो भी हो लेकिन माता शारदा का यह मंदिर बहुत प्रसिद्ध है और लोग दूर-दूर से माता के दर्शन के लिए यहाँ आते हैं।
आल्हा-ऊदल ने की थी शक्तिपीठ की खोज
माना जाता है इस शक्तिपीठ के आस-पास बहुत ही घनघोर जंगल और जंगली जानवर भी थे, जिसके कारण यह शक्तिपीठ फिर से लुप्त हो गया था, जिसके बाद यह माना जाता है पुनः इसकी खोज आल्हा-ऊदल और उनके भाइयों ने की थी, यहाँ आज भी आल्हा देव का मंदिर बना हुआ है और पास ही एक अखाड़ा और छोटी सी तलैया भी थी, जिसके बारे में यह माना जाता है, आल्हा अपने भाइयों के साथ यहाँ कुश्ती लड़ते थे, यहाँ आल्हा की पूजा एक लोकदेवता के रूप में होती है।
कौन थे आल्हा
आल्हा 11 वीं 12 वीं शताब्दी के बनाफ़र राजपूत वंश के एक योद्धा थे। आल्हा चार भाई थे आल्हा, ऊदल, मलखान और सुलखे, चारों ही भाई दुर्घष लड़ाके थे और माँ शारदा के परम भक्त थे, कुल से ये बनाफ़र राजपूत थे और महोबे के चंदेल राजा परिमार्दी देव के दरबार में रहते थे। इनके पिता की हत्या मांडू के राजा करिंगा राय ने कर दी थी, जिसके बाद राजा परिमार्दी देव और उनकी पत्नी ने रानी मल्हना ने इनका पालन-पोषण किया था, बड़े होंने राजा ने आल्हा-ऊदल को दशपुरवा और मलखान-सुलखे को सिरसागढ़ की जागीर दी थी, यह चंदेल राजा के लिए ही युद्ध करते थे। कथाओं के अनुसार इनका एक सुप्रसिद्ध युद्ध दिल्ली के चौहान राजा पृथ्वीराज चौहान से हुआ था, चंदेलों के दरबारी कवि जगनिक द्वारा रचित परमलरासो के आल्हा-खंड में इन योद्धा भाईयों की कहानियाँ आती है।
आज भी सर्वप्रथम पूजा करते हैं आल्हा
माना जाता है आल्हा ने माँ शारदा की 12 वर्षों तक तपस्या की थी, जिसके बाद उन्हें माँ शारदा से अमरता का वरदान प्राप्त होता है, और आल्हा आज भी अमर हैं, और अभी भी प्रतिदिन रात में मंदिर के फाटक बंद हो जाने के बाद माँ के दर्शन के लिए आते हैं। माना जाता है माँ की पहली पूजा भोर में अमर आल्हा ही करते हैं, आज भी सुबह जब पुजारियों द्वारा फाटक खोला जाता है तो माँ के ऊपर ताजे फूल चढ़े हुए रहते हैं, इसके अलावा मंदिर में घंटियों की आवाजें भी सुनाई देती हैं, इसीलिए यहाँ मंदिर में रात को लोगों को रुकने की मनाही होती है।
किसने करवाया माँ शारदा के मंदिर का निर्माण
दंतकथाओं से इतर अगर बात करें तो मंदिर का निर्माण मैहर के राजा दुर्जन सिंह ने 1820 में करवाया था, उन्होंने मंदिर तक पहुँचने के लिए सीढ़ियाँ और दर्शनार्थियों को लिए धर्मशाला और बावड़ियों का भी निर्माण करवाया था। बाद में उनके परपोते रघुबीर सिंह और रघुबीर सिंह के परपोते बृजेन्द्र सिंह ने मंदिर और नगर का और भी भव्यता के साथ निर्माण करवाया।
मैहर शक्तिपीठ और मंदिर
मैहर एक सुप्रसिद्ध हिंदू तीर्थ और धार्मिकस्थल है, जो माँ शारदा को समर्पित है। यह मंदिर विंध्यपर्वत के कैमूर शृंखला की एक ऊंची पहाड़ी पर स्थित है, जिसे त्रिकूट पर्वत कहते हैं, इस पर्वत की ऊंचाई लगभग 600 फुट है। इस पर्वत की तलहटी से ही विंध्य की सुप्रसिद्ध नदी तमसा या टोंस भी बहती है, जिसे स्थानीय भाषा में टमस कहा जाता है। इस मंदिर तक पहुँचने के लिए 1052 सीढ़ियां चढ़के जाना जाता है, हालांकि प्रशासन द्वारा अब यहाँ रोपवे की व्यवस्था भी हो गई है।
बाबा अलाउद्दीन खान भी थे माँ के भक्त
संगीत के क्षेत्र में मैहर घराने की स्थापना करने वाले बाबा अलाउद्दीन खान भी माँ के भक्त थे, बाबा मूलतः बंगाल के थे, लेकिन मैहर के तटकलीं महाराज बृजेन्द्र सिंह ने उन्हें मैहर बुलाया था, यहीं पर रहकर उन्होंने संगीत साधना की थी और कई वाद्ययंत्रों का भी निर्माण किया था, जिसमें एक प्रमुख था नल-तरंग, जिसका निर्माण बाबा ने मैहर मंदिर की सीढ़ियाँ उतरते वक्त गिरे बर्तन की धुन से किया था, क्योंकि बाबा हमेशा माँ के मंदिर में सरोद वादन किया करते थे।
मैहर पहले सतना जिले में आता था, लेकिन 2023 में मध्यप्रदेश सरकार ने इसे अलग जिला बना दिया, इसके अलावा मैहर हावड़ा-मुंबई रेलवे लाइन के मध्य पड़ने वाला एक सुप्रसिद्ध रेलवे स्टेशन है, जहाँ ज्यादातर गाड़ियों का स्टापेज होता है।