What Happened When The Supreme Court Said That It Is Necessary To Control The Number Of Stray Dogs?
Stray Dogs :कुत्ते बेहद वफादार माने जाते हैं और सदियों से वो ये वफ़ा निभा भी रहे हैं पर कभी – कभी वो इतने खूँ-ख़्वार हो जाते हैं कि प्यार की भाषा ही नहीं समझते उस पर अगर वो आवारा है या स्ट्रीट डॉग हैं तो अकसर उनके काटने की वजह से हमें रेबीज़ हो जाता है और हमारी जान पे बन आती है, आवारा कुत्ते अकसर सड़क दुर्घटनाओं का कारण भी बन जाते हैं ,इन सब बातों को मद्देनज़र रखते हुए ,कुछ समय पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने एक आदेश दिया कि सभी आवारा कुत्तों को शहरों से हटाया जाए और दूर शेल्टर होम भेजा जाए लेकिन सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश पर देशभर में बहस छिड़ गई लोगों में आक्रोश फैल गया कई लोगों ने इसके खिलाफ अपील की, तो वहीं कई लोगों ने इस फैसले को सही ठहराया पर इसके बाद हाल ही में कोर्ट ने एक आदेश जारी कर स्पष्ट किया कि उन्होंने कुत्तों को पूरी तरह सड़कों से हटाने का कोई आदेश नहीं दिया है। क्या है पूरा मामला आइये जानते हैं।
इस मामले में कुछ ख़ास तथ्य :-
यहाँ आपको बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों के मामले का स्वतः संज्ञान लिया था. सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों के काटने की घटनाओं और रेबीज़ के बढ़ते मामलों का संज्ञान लेकर सुनवाई की और इस मामले में बड़ी संख्या में आवेदन कोर्ट को मिले जिन्हें देखते हुए कोर्ट ने कहा कि इतने आवेदन तो इंसानों के केस में भी नहीं आते।
कोर्ट की दलीलों में क्यों हुआ अमेरिका और जापान का ज़िक्र :-
दलीलों में वकील ने कहा कि आवारा कुत्तों के कारण लोग परेशान हैं और मानवाधिकारों की रक्षा आवश्यक है ये भी तर्क दिया गया कि जापान और अमेरिका में ड्रामबॉक्स किल शेल्टर होते हैं और वहाँ के लोग कुत्तों को सड़कों पर नहीं छोड़ते बल्कि कुत्तों को शेल्टर होम्स में भेज दिया जाता है अफ़सोस की बात तो ये सामने आई कि अगर छोड़े गए कुत्तों को गोद नहीं लिया जाता, तो उन्हें यूथेनेशिया यानी दया-मृत्यु तक दे दी जाती है और इसी वजह से जापान में आवारा कुत्तों की समस्या नहीं है वहाँ 1950 से अब तक रेबीज़ से किसी की मौत भी नहीं हुई है।
फैसले का विरोध होने पर पीठ ने अपने आदेश पर सफाई भी दी :-
पीठ ने सवाल उठाया कि स्कूलों, अस्पतालों और अदालत परिसरों के भीतर आवारा कुत्तों की क्या ज़रूरत है और अगर सुरक्षा के तहत कुत्तों को वहाँ से हटाया जाएगा तो इससे किसी को क्या परेशानी हो सकती है और वैसे भी ये आदेश सड़कों के लिए नहीं, बल्कि केवल संस्थागत क्षेत्रों के लिए है।
सुनवाई में मज़ाक़ भी बना और बड़ी बातें भी आईं सामने :-
आवारा कुत्तों की पैरवी कर रहे कपिल सिब्बल ने कहा जो कुत्ता काटता हो उसकी नसबंदी करवाएं और उसे ही बंद करें ये कहकर और भी मज़ाक़ बनवा लिया कि मुझे कभी किसी कुत्ते ने नहीं काटा। इस पर कोर्ट ने कहा कि ये एक दुर्घटना है जो कभी भी घट सकती है कुत्तों को देखकर ये अंदाज़ा नहीं लगया जा सकता कि वो अच्छे मूड में हैं या खराब ,वो कब काटेंगे कब नहीं इसलिए सावधान होना ही पड़ेगा। कोर्ट ने सरकार से 2018 में बनाए गए एनिमल बर्थ कंट्रोल (ABC) नियमों के पालन में देरी पर भी सवाल किए।
ग़ौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में कुत्तों के काटने और रेबीज़ के खतरे को नियंत्रित करने के लिए आवारा कुत्तों को तुरंत पकड़कर उनकी नसबंदी करने और उन्हें आश्रय स्थलों में स्थानांतरित करने के कड़े निर्देश जारी किए हैं।
अभियान में बाधा डालने वालों पर होगी क़ानूनी कार्रवाई :-
न्यायालय ने साफ़ तौर पर चेतावनी दी है कि इस अभियान में बाधा डालने वाले किसी भी व्यक्ति या समूह पर क़ानूनी कार्रवाई की जाएगी साथ ही आवश्यकता पड़ने पर अधिकारियों को बल प्रयोग करने की भी अनुमति दी गई है।
योजना के क्रियान्वयन के लिए क्या तय हुआ :-
इस पीठ ने एनसीटी दिल्ली, एमसीडी और एनडीएमसी को 8 सप्ताह के भीतर कुत्तों के लिए आश्रय स्थल बनाने और पकड़े गए कुत्तों का दैनिक रिकॉर्ड रखने के निर्देश दिए साथ ही एक सप्ताह के अंदर एक हेल्पलाइन बनाने को भी कहा , जिसमें कुत्तों के काटने की सभी शिकायतें दर्ज होंगी और उनपर 4 घंटे के अंदर कार्रवाई करना अनिवार्य होगा ,इसके अंतर्गत कुछ विवरण भी देने होंगे जैसे -अधिकारियों को टीके की उपलब्धता, स्टॉक की स्थिति और उन्हें प्राप्त करने वाले की पूरी जानकारी ताकि ये व्यवस्था सुचारु रूप से चल सके।
सबसे अहम बात ये है कि कोर्ट ने किसी भी व्यक्ति या संगठन की हस्तक्षेप याचिका को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और कहा कि जब जीवन की बात हो तो भावनाएं नहीं बल्कि जन सुरक्षा सर्वोपरि होनी चाहिए। न्यायालय ने अपनी सफाई में ये भी कहा कि हम भी एनिमल लवर हैं लेकिन इंसानों की सुरक्षा हमारे लिए ज़्यादा अहमियत रखती है।
ये भी कहा गया कि कुत्तों की जनगणना के बाद ही कोई उपाय हो पाएगा :-
एनिमल राइट एक्टिविस्ट ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि इस मामले में देश में सबसे बड़ी समस्या ये है कि हमें कुत्तों की आबादी कितनी है यही नहीं पता है और जब तक हमें उनकी संख्या नहीं पता चलेगी तब तक हम ये कैसे तय कर पाएँगे कि हमें कितने नसबंदी केंद्र बनाने पड़ेंगे कितने डॉक्टरों की और कितने शेल्टर होम्स की ज़रूरत पड़ेगी। एक तथ्य और सामने रखा गया कि एनिमल लवर या एनिमल राइट एक्टिविस्ट जानवरों के प्रति दया का भाव रखते हैं इसलिए कुत्ते उन्हें नहीं काटते तो देश का हर नागरिक ऐसी ही दया क्यों नहीं दिखा सकता ताकि ये समस्या हल हो जाए। थोड़ी संवेदनशीलता रखते हुए पशु सेवा की तरह कुत्तों की नसबंदी पर भी लोगों को जागरूक करने पर बल दिया गया।
