Sawan in Vindhya: सावन आते ही विंध्य और बघेलखंड की धरती अपना रंग बदल लेती है। प्रकृति में हरियाली उतर आती है और गांवों का जीवन भी एक अलग उत्सव में बदल जाता है। यहां सावन केवल शिव आराधना का महीना नहीं, बल्कि प्रकृति, खेती, लोकविश्वास और लोकजीवन के जीवंत होने का समय है। आज हम विंध्य से जुड़े सावन के उन लोकपरंपराओं की बात करते हैं, जो पहले प्रचलित थीं, लेकिन अब धीरे-धीरे यह कम होती जा रही हैं।
सावन में हरियरी की पुजाई
बघेलखंड की ग्रामीण अर्थव्यवस्था लंबे समय तक वर्षा की खेती पर निर्भर रही है। गर्मी के महीनों में सूखी पड़ी धरती जब सावन की बारिश से भीगती थी, तो केवल खेत ही नहीं बदलते थे, बल्कि पूरे गांव का जीवन बदल जाता था। सूखे तालाबों में पानी लौटता, नालों में धार आती, खेतों की मिट्टी में नमी भरती और चारों ओर हरियाली दिखाई देने लगती। इसलिए बघेलखंड की लोकचेतना में हरियाली केवल प्रकृति का दृश्य नहीं, बल्कि जीवन और समृद्धि का प्रतीक रही है। जिसके कारण यहाँ सावन के महीने में हरियरी की पुजाई की जाती है। जिसमें धरती, खेती, हरियाली और ग्रामजीवन के प्रति कृतज्ञता का भाव दिखाई देता है।
बघेली लोककहावतों में सावन का मौसम विज्ञान
लोकजीवन में मौसम को समझने का अपना विज्ञान था। बारिश कब आएगी, खेत कब जोतना है, मिट्टी में कितनी नमी है और आने वाली फसल के लिए जमीन कैसे तैयार करनी है, इन सबका ज्ञान पीढ़ियों से कहावतों के माध्यम से आगे बढ़ता ही रहा। इसीलिए बघेली लोककथाओं और लोककहावतों में सावन का संबंध खेती से गहराई से जुड़ा दिखाई देता है। एक उदाहरण देखिए-
सामन सुक्ला सत्तमी, जो गरजे अधिरात।
तू जइहा पिय मालवा, हम जाबय गुजरात।।
अर्थात- यदि सावन शुक्ल सप्तमी को अर्धरात्रि में बादल गरजें, तो हे प्रिय तुम मालवा चले जाना और मैं गुजरात चली जाऊँगी मने अकाल पड़ने वाला है।
सावन में कजरी, हिंदुली और विरह का संसार
सावन का सबसे सुंदर संसार शायद बघेली लोकगीतों में मिलता है। बादल घिरते हैं तो गीत शुरू होते हैं, खेत हरे होते हैं तो गीतों में हरियाली उतर आती है और जब सावन प्रियतम की याद दिलाता है, तो यही गीत विरह में बदल जाते हैं। बघेली लोकगीतों में कजरी और हिंदुली सावन और वर्षा ऋतु से विशेष रूप से जुड़ी हैं। हिंदुली में वर्षा के साथ नायक-नायिका के भावों का चित्रण मिलता है, जिसमें संयोग और वियोग दोनों शृंगार दिखाई देते हैं। इन गीतों में प्रेम के साथ उल्लास और चुहलबाजी भी देखने को मिलती है।
मायके की यादें और स्त्री जीवन के मौखिक दस्तावेज़
लेकिन सावन का सबसे मार्मिक पक्ष मायका है। पुराने ग्रामीण समाज में विवाह के बाद बेटी का जीवन ससुराल से जुड़ जाता था, जबकि मायका उसके लिए भावनात्मक यादों का झरोखा बन जाता था। सावन आते ही बचपन, सहेलियों, झूलों और नैहर की यादें गहरी हो जाती थीं। यही कारण है कि बघेली लोकगीतों में भाई, नैहर, सखी और बाबुल का बार-बार जिक्र मिलता है। कई गीतों में स्त्री अपने मायके और भाई के आने की प्रतीक्षा करती दिखाई देती है। इसलिए ये गीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि उस दौर के स्त्री जीवन और सामाजिक संबंधों के मौखिक दस्तावेज भी हैं।
पुतरा-पुतरी का विवाह उत्सव
सावन में कभी पुतरा-पुतरी, यानी गुड्डे-गुड़ियों के विवाह का खेल भी बघेलखंड और विंध्य में खूब प्रचलित था। लड़कियां पुराने कपड़ों से पुतरियां बनाकर उन्हें सजातीं और फिर उनका बाकायदा विवाह करातीं। सखी-सहेलियों को बुलाया जाता, बरा-मुँगौरा के साथ ही कई पकवान बनते और पूरा आयोजन छोटे से विवाह जैसा होता। इसके बाद नागपंचमी के दिन इन पुतरियों को जल में प्रवाहित करने की परंपरा भी थी।
सावन के महीने में पड़ते थे झूले
सावन के महीने में पहले अपने विंध्य और बघेलखंड के गांवों में खूब झूले पड़ते थे। झूले गांवों के आम और नीम के पेड़ों पर पड़ते, आम और नीम की डालों को मजबूत माना जाता था और यह सर्वसुलभ थे। उनके आसपास जुटती महिलाएं और युवतियां और झूला झूलते हुए कजरी और हिंदुली गीत गाती थीं, यह सावन की पहचान हुआ करते थे। झूला केवल मनोरंजन नहीं था, बल्कि महिलाओं के मिलने, गीतों को सीखने और अपनी भावनाओं को साझा करने का अवसर भी था। इसी माध्यम से वे मायके-ससुराल के अनुभव, अपने सुख-दुख और मन की बातें गीतों में व्यक्त करती थीं। इसलिए सावन को बघेलखंड की स्त्री लोकसंस्कृति का महीना भी कहा जा सकता है।
त्योहारों का महीना है सावन
सावन को त्योहारों का महीना भी कहा जाता है। नागपंचमी से शुरू होकर रक्षाबंधन और फिर सावन खत्म होने के अगले दिन बाद ही आने वाला खजुलइयाँ पर्व बघेलखंड की लोकसंस्कृति को एक अलग ही रंग देता है। खजुलइयाँ मूलतः विंध्य की लोकपरंपरा से जुड़ा हुआ त्योहार है। नागपंचमी के अगले दिन मिट्टी लाकर बांस की टोकरियों में जौ के दाने बोए जाते थे। सावन पूर्णिमा के बाद खजुलइयाँ के दिन इन्हीं जौ के पौधों को नदी या तालाब के किनारे ले जाकर जल से धोया जाता। एक पौधा जल को अर्पित किया जाता, दूसरा ईश्वर को चढ़ाया जाता और फिर लोग एक-दूसरे को खजुलइयाँ देकर शुभकामनाएं देते थे।
रीवा के ऐतिहासिक बाबा घाट मेला
इस दिन बघेलखंड घरों में दरभरी पूरी और गुराम जैसे व्यंजन भी बनाए जाते थे। गुराम आटे, गुड़ और सूखे आम यानी अमकोरिया से बनने वाला खट्टा-मीठा व्यंजन है, जिसके बारे में लोग कम जानते हैं। कभी इस पर्व पर पूरे विंध्य और बघेलखंड के गांवों में खासा उत्साह रहता था। रीवा शहर में बीहर नदी के बाबा घाट पर बड़ा मेला लगता था, जहां महिलाएं और युवतियां जौ की टोकरियां लेकर पहुंचती थीं। कहा जाता है कि रीवा के महाराज भी स्वयं इस आयोजन में शामिल होते थे। लेकिन आज वह मेला नहीं लगता, और पहले जैसी चहल-पहल भी कम हो गई है। लेकिन खजुलइयाँ की यह परंपरा आज भी बघेलखंड की लोकस्मृति में सावन की एक अनूठी पहचान के रूप में जीवित है।
सावन के महीने में होते थे दंगल
सावन के महीने में कबड्डी और कुश्ती के खेल भी पहले बहुत खेले जाते, अखाड़ों में खूब दंगल होते थे। इस महीने में खान-पान का ध्यान रखना भी जरूरी होता है, पाचनतंत्र कमजोर होता है इसीलिए इस महीने में हरीपत्तेदार सब्जियों के साथ मसालेदार भोजन की मनाही की गई और सयानों द्वारा हर्रय खाने की सलाह दी गई है।
बहुरंगी होता है सावन का महीना
सावन की सबसे बड़ी खूबसूरती शायद यही है कि इसमें दो बिल्कुल विपरीत भाव साथ-साथ चलते हैं। धरती के लिए सावन उल्लास है। किसान के लिए उम्मीद है। बच्चों के लिए खेल है। गांव के लिए उत्सव है। लेकिन परदेश गए पति की प्रतीक्षा करती स्त्री के लिए यही सावन विरह भी है। नववधुओं के लिए अपने मायके की यादें हैं।

