Biography of Veena Sahastra Buddhe :अगर आप संगीत प्रेमी हैं तो ख्याल गायन भी आपको आकर्षित कर लेगा फिर चाहे आप छोटे बच्चे हो या जवान या फिर थोड़ा बहोत ही संगीत का ज्ञान रखते हों बस आप ज़रा सुन के देखिए वीणा सहस्रबुद्धे को। वो कानपुर से ताल्लुक़ रखने वाली शास्त्रीय संगीत की गायिका थीं लेकिन उनकी गायन शैली की जड़ें ग्वालियर घराने में थीं , और उन्होंने जयपुर और किराना घरानों से प्रेरणा ली थी, वीणा सहस्रबुद्धे ख्याल के अलावा भजन गाने के लिए भी जानी जाती थीं ।
ऑल इंडिया रेडियो प्रतियोगिता में बनीं विजेता:-
14 सितंबर 1948 को कानपुर में एक संगीतकार परिवार में जन्मीं वीणा सहस्रबुद्धे के पिता शंकर श्रीपाद बोडस, प्रसिद्ध गंधर्व महाविद्यालय की स्थापना करने वाले विष्णु दिगंबर पलुस्कर के शिष्य थे ,जिन्होंने प्रसिद्ध गंधर्व महाविद्यालय की स्थापना की थी । वो महाराष्ट्र के सांगली से ताल्लुक़ रखते थे, और ओंकारनाथ ठाकुर , विनायक राव पटवर्धन के समकालीन भी थे। वीणा ने अपने पिता और फिर अपने भाई काशीनाथ शंकर बोडस के अधीन ही अपनी प्रारंभिक संगीत शिक्षा प्राप्त की थी , गायन ही नहीं उन्होंने कथक नृत्य भी सीखा था, वो तीन भाई बहनों में सबसे छोटी थीं , वीना की माँ शांता जी भी एक गायिका और संगीत शिक्षिका थीं इसलिए वीणा बचपन से एक संगीतमय माहौल में पली-बढ़ीं। आपके संगीत गुरुओं में बलवंतराय भट्ट , वसंत ठाकर और गजाननराव जोशी शामिल थे । बाद में उन्होंने गानसरस्वती किशोरी अमोनकर से भी कुछ समय के लिए प्रशिक्षण लिया। 1972 में वो ऑल इंडिया रेडियो द्वारा आयोजित 25 वर्ष से कम आयु के कलाकारों के लिए राष्ट्रीय प्रतियोगिता में वोकल क्लासिकल श्रेणी में विजेता बनीं थीं।
संगीत ही नहीं संस्कृत की भी थीं ज्ञाता :-
1968 को कानपुर विश्वविद्यालय से गायन के अलावा आपने संस्कृत साहित्य और अंग्रेजी साहित्य में स्नातक की डिग्री ली फिर 1969 में एबी जीएमवी मंडल से गायन में मास्टर डिग्री ( संगीत अलंकार ) और 1979 को कानपुर विश्वविद्यालय से संस्कृत में भी मास्टर डिग्री प्राप्त की यहीं से उन्होंने 1988 में गायन ( संगीत प्रवीण ) में डॉक्टरेट की उपाधि भी प्राप्त की। कुछ वर्षों तक वो एसएन डीटी पुणे परिसर में संगीत विभाग की प्रमुख रहीं और पूरे भारत और दुनिया भर के कई देशों में अपने गायन का प्रदर्शन किया।
कानपुर में भी होने लगा संगीत का प्रसार:-
आपने एक संगीत समाज की स्थापना भी की ,वैसे तो पलुस्कर परंपरा ग्वालियर घराने की शैली और गायन के स्वभाव में थी परंतु कानपुर बिना किसी उल्लेखनीय सांस्कृतिक जीवन के ,शास्त्रीय संगीत को बढ़ावा देता बहोत ख़ास और नया शहर बन गया था जबकि उस समय तक, उत्तर प्रदेश में बनारस और इलाहाबाद जैसे शहरों में संगीत फलता फूलता था।
वीणा ,महान संगीतकारों के सानिध्य से संगीत में परिपक्व होती चली गईं और अपनी गायकी से हम सबका मन मोहती रहीं , उनके गायन की अनूठी शैली थी जिसमें उन्होंने 40 से अधिक बार प्रदर्शन करके शास्त्रीय संगीत के प्रति लोगों को आकर्षित करती रहीं रुझान बढ़ाती रहीं।
संगीतज्ञ नहीं पर संगीत रसिक थे जीवनसाथी:-
1968 में उनका विवाह हरि सहस्रबुद्धे से हुआ। जो संगीत के ज्ञाता तो नहीं पर बड़े संगीत प्रेमी यो रसिक ज़रूर थे जो भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान से स्नातक होने के बावजूद वीणा जी को बहोत ग़ौर से सुनते और नुक्स भी निकालते थे,इस तरह दोनों संगीत के सुरों में डूब जाते और आनंद लेते। अपने पति की संगीत में रूचि देखकर ही शायद वीना जी ने कई अलग -अलग क्षेत्रों से आये छात्रों को भी संगीत सिखाया। वीणा और हरि सहस्रबुद्धे 1984 में कानपुर छोड़कर पुणे चले गए। वीणा जी की कोई भी रिकॉर्डिंग सुनकर आप ये अंदाज़ा लगा सकते हैं कि उनका सुरों के साथ खेलना कितना दिलचस्प और उनके लिए कितना आसान था , उनके रागों का मिश्रण एक अलग ही रोमांच पैदा करता था और आज भी एक ही सुर के रागों जैसे पूरिया, सोहिनी और मारवा में बड़ी मधुरता से उनका प्रवेश कर जाना कितना आनंद देता है।
सारा जीवन किया संगीत को समर्पित :-
जीवन के आखरी पड़ाव पर आकर वीणा सहस्रबुद्धे ने अपना अंतिम संगीत कार्यक्रम 2 दिसंबर 2012 को दिया। आपने (1993) में उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार प्राप्त किया फिर (2013) में आपको संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला।
इस तरह अपना सारा जीवन इन सुर लहरियों को समर्पित करते हुए , 29 जून 2016 को वो चिर निद्रा में लीन हो गईं पर अपनी संगीत साधना से ,हमारे लिए संगीत का वो एक ऐसा अध्याय छोड़ कर गईं हैं जो इस राह पर चलने वाले हर संगीत प्रेमी का मार्गदर्शन करेगा ,आपको 2019 में अखिल भारतीय गंधर्व महाविद्यालय मंडल ने मरणोपरांत मानद उपाधि “संगीत महामहोपाध्याय” से सम्मानित किया गया ।
