Vadh 2 में कुमुद मिश्रा का role क्यों करता है बेचैन? एक्टिंग से दर्शक हैरान

Vadh 2 में कुमुद मिश्रा का role क्यों करता है बेचैन? एक्टिंग से दर्शक हैरान

फिल्म Vadh 2 में कुमुद मिश्रा की एक्टिंग देखने वालों के लिए असामान्य सा अनुभव बनकर उभरता दिख रहा है। शांत और संतुलित भूमिका के लिए पहचाने जाने वाले एक्टर का यह रूप अचानक से चौंका देता है। उनका किरदार न सिर्फ लोगों में डर पैदा करता है, बल्कि सामाज की सच्चाइयों की एक असहज झलक भी सभी को दिखाता है।

Vadh 2 में किरदार का अप्रत्याशित बदलाव

कुमुद मिश्रा ने अपने करियर में अक्सर एक संयम से, समझदार और नैतिक चीजों से जूझते हुए पात्र ही निभाए हैं। लेकिन Vadh 2 में वे जेल सुप्रीटेंडेंट ‘प्रकाश’ की भूमिका में बिल्कुल ही अलग रूप में नजर आ रहे हैं। यह बदलाव दर्शकों की फिल्म को लेकर धारणा को तोड़ता दिख रहा है। उनकी शांत छवि जब कठोर और निर्दयी व्यक्तित्व वाले व्यक्ति में बदलती दिखाई देती है, तो वही असहजता की पहली वजह सभी में बनती है।

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‘प्रकाश’ एक सोच, जो डर से ज्यादा बेचैनी देती है

इस फिल्म में प्रकाश केवल एक नेगेटिव रोल नहीं है, बल्कि वह एक मानसिकता का प्रतिनिधित्व भी करता दिखता है। वह अनुशासन, जातिगत चीजों और पितृसत्तात्मक सोच को सही ठहराता हुआ फिल्म में दिखाई देता है। उसकी क्रूरता इमोशनल तरीके से बेचैनी से नहीं, बल्कि ठंडी तर्क से संचालित होती दिखती है। यही बात उसे सामान्य खलनायक से बिल्कुल अलग बनाती है और दर्शकों को थोड़ी असहज करती है।

अभिनय की वह शैली जो शोर नहीं करती, असर छोड़ती है

मिश्रा इस भूमिका में जोरदार बात चित या गुस्सैल बिहेवियर का सहारा नहीं लेते दिखते हैं। उनका कम बोलना, स्थिर नजर और नियंत्रित तरीके का भाव ही किरदार की भय को उभारते हुए दिखता हैं। स्क्रीन पर बिना किसी नाटक के भी उनका अस्तित्व लोगो में तनाव पैदा करता दिखता है। यह छोटा एक्टिंग दर्शकों को भीतर ही भीतर से विचलित करता भी दिखता है।

सामाजिक परतें, कहानी से आगे की सच्चाई

Vadh 2 में दिखाया गया प्रकाश केवल फिल्म का एक चरित्र ही नहीं लगता है। उसमें वे सारी सामाजिक भाव झलकती दिखती हैं, जिनसे समाज अक्सर असहज सा महसूस करता रहता है जैसे सत्ता का दुरुपयोग करना, जातिगत सोच और कठोर अनुशासन का भ्रम रखता हुआ।

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दर्शकों की अपेक्षाओं का टूटना ही प्रभाव की वजह

दरसल दर्शक कुमुद मिश्रा की फिल्म से एक खास तरह की संवेदनशीलता की उम्मीद रखते हैं। जब वही अभिनेता बिना किसी सहानुभूति के कठोरता दिखाता है, तो यह मानसिक झटका महसूस करा देता है। यह एक्टिंग दर्शकों को कहानी से ज्यादा अपने भीतर झांकने पर मजबूर कर देता है। Vadh 2 में कुमुद मिश्रा का प्रदर्शन इसलिए याद भी रह जाता है क्योंकि वह सिर्फ एक्टिंग नहीं, बल्कि मानसिक अनुभव बन जाता है। उनका किरदार शोर नहीं मचाता है, फिर भी लंबे समय तक मन में बना रहता है। यही संयम सा भाव, लेकिन गहरा असर इस भूमिका को और भी विशेष बनाता है।

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