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अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर की नई कोशिशें तेज

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Donald Trump Iran Policy Middle East Tension

अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे टकराव को रोकने के लिए कूटनीतिक कोशिशें फिर तेज हो गई हैं. सोमवार को दोनों देशों के प्रतिनिधियों ने मध्यस्थ देशों के जरिए अलग-अलग चर्चा की. इस बार बातचीत का बेस ईरान का दिया गया 7 दिन के युद्धविराम का प्रस्ताव है, जो उसने पिछले हफ्ते UN में रखा था. इस जंग का असर पूरी दुनिया के तेल बाजार पर पड़ रहा है, ब्रेंट क्रूड का भाव 100 डॉलर के पार बना हुआ है.

ईरान ने क्या कहा?

ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने बताया कि तेहरान अब अमेरिका के जवाब का इंतजार कर रहा है. ईरान चाहता है कि अमेरिका सीजफायर और होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही को लेकर उसकी शर्तों पर स्थिति साफ करे. अराघची ने साफ किया कि जब तक उनकी मांगें नहीं मानी जातीं, तब तक होर्मुज स्ट्रेट को पूरी तरह नहीं खोला जाएगा.

ईरान की 7 दिन के सीजफायर की शर्तें

ईरान ने अपने प्रस्ताव में कई मांगें रखी हैं. इसमें ईरान और लेबनान में सैन्य कार्रवाई पर रोक, विदेशों में फ्रीज पड़े अरबों डॉलर को रिलीज करना, ईरानी तेल से प्रतिबंध हटाना और ईरानी पोर्ट्स पर लगी अमेरिकी नाकेबंदी खत्म करना शामिल है. इसके बदले में ईरान होर्मुज स्ट्रेट को खोलने के लिए तैयार है.

परमाणु मुद्दा भी एजेंडे में

सिर्फ युद्धविराम ही नहीं, बल्कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर भी फिर से बातचीत शुरू करने का प्रस्ताव है. अमेरिका को ईरान के पास मौजूद हाई-एनरिच्ड यूरेनियम को लेकर आपत्ति है, इसलिए परमाणु डील भी इस सीजफायर का बड़ा हिस्सा होगी.

ट्रंप का बदला रुख

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शनिवार को ईरान के इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया था, लेकिन रविवार को उन्होंने कहा कि इस हफ्ते बातचीत हो सकती है. सोमवार को ट्रंप ने कन्फर्म किया कि अमेरिकी अधिकारियों ने मध्यस्थों से संपर्क किया है.

ईरान का कहना है कि अभी तक मध्यस्थों ने अमेरिका की तरफ से प्रस्ताव रिजेक्ट होने की कोई आधिकारिक जानकारी नहीं दी है. इसका मतलब बातचीत का दरवाजा अभी भी खुला है.

पहले भी टूट चुके हैं समझौते

ये पहली बार नहीं है, इससे पहले अप्रैल और जून में भी दोनों देश मध्यस्थों के जरिए सीजफायर पर राजी हुए थे, लेकिन वो ज्यादा दिन चल नहीं पाया. इसलिए इस बार सबसे बड़ी चुनौती इसे लंबे समय तक बनाए रखना है.

होर्मुज स्ट्रेट इतना जरूरी क्यों?

दुनिया का लगभग 20% तेल और गैस इसी रास्ते से गुजरता है. अगर यहां लंबे समय तक जहाजों की आवाजाही रुकी तो पूरी दुनिया में एनर्जी क्राइसिस आ सकता है. इसीलिए इस बातचीत पर सिर्फ दो देशों की नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की नजर है.

कच्चे तेल के दाम पर असर

इस तनाव का असर मंगलवार को भी दिखा, जब ब्रेंट क्रूड 100.91 डॉलर और WTI क्रूड करीब 97 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया. अगर डील हो जाती है और होर्मुज स्ट्रेट खुल जाता है तो तेल के दाम नीचे आ सकते हैं, नहीं तो और बढ़ोतरी तय है.

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