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UP Chunav 2027 : ओम प्रकाश राजभर ने BJP से मांगी 33 सीटें, NDA में टेंशन 

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UP Chunav 2027 : उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में अभी वक्त है, लेकिन एनडीए के भीतर सीटों को लेकर सियासी खींचतान के संकेत मिलने लगे है। योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी यानी सुभासपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर ने बीजेपी के सामने सीटों को लेकर बड़ी मांग रख दी है। ओम प्रकाश राजभर की पार्टी ने आगामी विधानसभा चुनाव के लिए 33 सीटों पर अपनी दावेदारी पेश की है। दिल्ली में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन से मुलाकात के बाद सुभासपा की इस मांग ने उत्तर प्रदेश की सियासत में नई चर्चा छेड़ दी है। पार्टी ने जिन सीटों पर दावा किया है, उनमें पूर्वांचल की कई अहम विधानसभा सीटों के साथ बीजेपी के कब्जे वाली सीटें भी शामिल हैं।

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या बीजेपी अपने सहयोगी दल को 33 सीटें देने के लिए तैयार होगी? क्या ओम प्रकाश राजभर की मांग एनडीए के भीतर सीट बंटवारे के समीकरण बदल सकती है?  सबसे बड़ा सवाल यह कि क्या बीजेपी अपने ही मंत्री अनिल राजभर की शिवपुर सीट सुभासपा के लिए छोड़ देगी? इन सवालों के जवाब समझने के लिए सुभासपा की सीटों की सूची, उसकी राजनीतिक रणनीति और बीजेपी के सामने खड़ी संभावित चुनौतियों को समझना जरूरी है।

सुभासपा ने बीजेपी से मांगी 33 सीटें

दरअसल, सुभासपा के राष्ट्रीय प्रमुख महासचिव अरविंद राजभर ने दिल्ली में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन से मुलाकात की। इस दौरान सुभासपा की ओर से 33 विधानसभा सीटों की सूची सौंपे जाने की बात सामने आई है। इस सूची में ऐसी सीटें शामिल हैं, जहां पार्टी अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है।

सूची में पूर्वांचल की सबसे अधिक सीटें

खास तौर पर पूर्वांचल की विधानसभा सीटों पर सुभासपा का जोर दिखाई देता है। इसके अलावा प्रदेश के दूसरे जिलों की सीटों पर भी पार्टी ने अपनी दावेदारी पेश की है। सुभासपा की इस मांग को केवल सीटों की संख्या तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। चुनावी गठबंधन में सीटों का बंटवारा किसी भी पार्टी की राजनीतिक हैसियत और भविष्य की रणनीति का संकेत भी माना जाता है। ओम प्रकाश राजभर की कोशिश है कि 2027 के चुनाव में उनकी पार्टी को ऐसा प्रतिनिधित्व मिले, जिससे वह एनडीए के भीतर अपनी राजनीतिक भूमिका को मजबूत कर सके।

अनिल राजभर की सीट पर भी माँगा कब्जा

हालांकि, 33 सीटों की मांग करने और बीजेपी की ओर से उन सीटों पर सहमति मिलने के बीच बड़ा अंतर है। बता दें कि अंतिम फैसला दोनों दलों के बीच बातचीत, चुनावी संभावनाओं और सीटवार राजनीतिक समीकरणों के आधार पर ही होगा। सुभासपा की दावेदारी में सबसे ज्यादा चर्चा वाराणसी की शिवपुर विधानसभा सीट को लेकर हो रही है। इसकी वजह यह है कि शिवपुर सीट से बीजेपी के मंत्री अनिल राजभर विधायक हैं। सुभासपा ने इस सीट पर भी दावा किया है और ओम प्रकाश राजभर की ओर से शिवपुर से चुनाव लड़ने का एलान किए जाने की बात सामने आई है।

क्या बीजेपी ओपी राजभर की मांग पूरी करेगी?

ऐसे में यह सीट बीजेपी और सुभासपा के बीच संभावित खींचतान का अहम केंद्र बन सकती है। शिवपुर सीट पर दावेदारी इसलिए भी खास है, क्योंकि यहां मामला केवल एक विधानसभा क्षेत्र का नहीं बल्कि सहयोगी दलों के बीच की राजनीतिक जरूरतों का भी है।एक तरफ बीजेपी के सामने अपने मौजूदा विधायक और मंत्री की सीट को बरकरार रखने का सवाल होगा। दूसरी तरफ सुभासपा अपने लिए ज्यादा सीटें हासिल करने की कोशिश में है।

अगर दोनों दल शिवपुर सीट पर अपनी-अपनी दावेदारी पर कायम रहते हैं तो बातचीत के दौरान यह सीट एक बड़ी चुनौती बन सकती है। हालांकि, अभी यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि बीजेपी इस सीट को सुभासपा के लिए छोड़ देगी या दोनों दलों के बीच टकराव तय है। फिलहाल सबसे अहम बात यही है कि सुभासपा की सूची में बीजेपी के कब्जे वाली सीटों को भी शामिल किया गया है।

पूर्वांचल की सीटों पर सुभासपा का फोकस आखिर क्यों हैं?

सुभासपा ने 33 सीटों में सबसे ज्यादा पर्वांचल की सीटों पर ही अपना दावा पेश किया है। सुभासपा की सीटों के दावेदारी वाली सूची में पूर्वांचल की कई महत्वपूर्ण सीटें शामिल हैं। जिनमें- गाजीपुर की जहूराबाद और जखनिया, जौनपुर की जफराबाद और केराकत, वाराणसी की अजगरा और शिवपुर, मऊ सदर और घोसी जैसी सीटों पर सुभासपा ने दावेदारी की है। इसके अलावा आजमगढ़ की अतरौलिया, दीदारगंज और मेहनगर तथा बलिया की बेल्थरा रोड, रसड़ा और सिकंदरपुर विधानसभा सीटें भी सूची में शामिल हैं।

पूर्वांचल की इन सीटों पर दावेदारी से साफ है कि सुभासपा इस क्षेत्र में अपनी राजनीतिक मौजूदगी को और मजबूत करने की कोशिश कर रही है। यहां पर गौर करने वाली बात ये भी है कि किसी सीट पर दावा पेश करना और वहां जीतने की वास्तविक संभावना होना दो अलग-अलग बातें हैं। सीटों के बंटवारे के समय गठबंधन के दलों को स्थानीय संगठन, उम्मीदवार की लोकप्रियता, पिछले चुनाव के नतीजों और विपक्षी दलों की स्थिति जैसे पहलुओं पर विचार करना पड़ता है। यही वजह है कि सुभासपा की मांग पर बातचीत करते समय बीजेपी के सामने केवल सीटों की संख्या नहीं बल्कि हर विधानसभा क्षेत्र का अलग-अलग चुनावी गणित भी महत्वपूर्ण होगा।

सुभासपा की सूची में पूर्वांचल से बाहर की भी सीटें शामिल

सुभासपा ने केवल पूर्वांचल ही नहीं बल्कि अन्य जिलों की सीटों पर भी दावेदारी पेश की है, जिनमें अंबेडकरनगर की अकबरपुर, सुल्तानपुर की इसौली, बस्ती की महादेवा और रुधौली, कुशीनगर की रामकोला और खड्डा तथा देवरिया की रामपुर कारखाना सीट पर पार्टी ने दावेदारी की है। इसके अलावा बाराबंकी की रामनगर, हरदोई की संडीला, बलरामपुर की उतरौला, बहराइच की बलहा, सिद्धार्थनगर की डुमरियागंज और इटवा सीट भी इस सूची में शामिल हैं।

वहीं, मीरजापुर की मझवां, सीतापुर की महोली और मुरादाबाद ग्रामीण विधानसभा सीट पर भी सुभासपा ने अपना दावा पेश किया है। इस सूची से ये साफ पता चलता है कि पार्टी अपनी चुनावी संभावनाओं को कुछ सीमित क्षेत्रों तक रखने के बजाय प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में विस्तार देने की कोशिश कर रही है। खैर, केवल दावेदारी पेश करने भर से ही ये नहीं तय हो जाता कि सुभासपा इन सभी सीटों से चुनाव लड़ेगी। क्योकि बीजेपी के साथ बातचीत में यह देखना अहम होगा कि सुभासपा की मांग में से कितनी सीटों पर सहमति बनती है और किन सीटों को लेकर दोनों दलों के बीच समझौता होता है।

भाजपा के सामने हैं ये तीन चुनौती

सुभासपा की 33 सीटों की मांग वाली सूची मिलने के बाद अब बीजेपी के सामने कई चुनौतियां आएगी। पहली चुनौती ये हो सकती है कि सहयोगी दलों के बीच संतुलन को कैसे भी बनाए रखना होगा, एनडीए में सीटों का बंटवारा करते समय बीजेपी को अपने उम्मीदवारों और मौजूदा विधायकों की राजनीतिक स्थिति के साथ-साथ सहयोगी दलों की अपेक्षाओं पर भी विचार करना होगा। दूसरी चुनौती मौजूदा विधायकों की सीटें हैं। सुभासपा की सूची में बीजेपी के कब्जे वाली नौ सीटें भी शामिल हैं। अगर इन सीटों पर सुभासपा अपनी दावेदारी मजबूत करती है तो बीजेपी को यह तय करना होगा कि किन सीटों पर समझौते की गुंजाइश है और किन पर अपने उम्मीदवारों को बनाए रखना उसके लिए जरूरी है। भाजपा के सामने तीसरी चुनौती ये होगी कि गठबंधन के भीतर एकता का संदेश देना। अगर बीजेपी सुभासपा की मांगों पर सहमति बनाती है तो उसे अन्य सहयोगी दलों की अपेक्षाओं का भी ध्यान रखना पड़ सकता है। यानी कि अगर सुभासपा की मांगों को स्वीकार नहीं किया जाता है, तो बातचीत के दौरान राजनीतिक असहमति की स्थिति पैदा हो सकती है। हालांकि, यह कहना अभी उचित नहीं होगा कि सुभासपा की मांग से एनडीए में संकट तय हो गया है।

क्या बीजेपी सुभासपा को 33 सीटें देगी? 

फिलहाल, ये कहा जा सकता है कि ओम प्रकाश राजभर 2027 के चुनाव से पहले अपनी पार्टी के लिए अधिक राजनीतिक हिस्सेदारी हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं। अब देखना होगा कि बीजेपी और सुभासपा के बीच बातचीत किस दिशा में आगे बढ़ती है और 2027 के चुनाव से पहले सीटों का अंतिम समीकरण क्या बनता है। 

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