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अमेरिका ने अपने सबसे बड़े सैन्य कमांड से हटाया ‘इंडो’, क्या भारत की अहमियत घट रही है?

अमेरिका (United States) ने अपने सबसे महत्वपूर्ण सैन्य कमांडों में से एक US Indo-Pacific Command (USINDOPACOM) का नाम बदलकर फिर से US Pacific Command (USPACOM) कर दिया है। यानी अब इस कमांड के नाम से “इंडो” शब्द हटा दिया गया है। इस फैसले ने रणनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है कि क्या अमेरिका की एशिया नीति में भारत (India) की भूमिका पहले जैसी नहीं रही?

दरअसल, साल 2018 में तत्कालीन अमेरिकी रक्षा मंत्री जिम मैटिस (Jim Mattis) ने इस कमांड का नाम बदलकर “इंडो-पैसिफिक कमांड” किया था। उस समय अमेरिका का मानना था कि हिंद महासागर (Indian Ocean) और प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) अब एक साझा रणनीतिक क्षेत्र बन चुके हैं और चीन (China) के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने में भारत की भूमिका बेहद अहम होगी।

तब अमेरिका ने स्पष्ट संदेश दिया था कि उसकी एशिया रणनीति में भारत एक प्रमुख साझेदार है। यही वह दौर था जब “इंडो-पैसिफिक” शब्द दुनिया की कूटनीति और सुरक्षा चर्चाओं का केंद्र बन गया था।

अब अमेरिकी रक्षा मंत्रालय (Pentagon) का कहना है कि नाम बदलने के पीछे कोई रणनीतिक बदलाव नहीं है। मंत्रालय के अनुसार “पैसिफिक कमांड” एक ऐतिहासिक नाम है, जो कई बड़े युद्धों और सैन्य अभियानों से जुड़ा रहा है। इसे वापस लाने का उद्देश्य केवल सैन्य विरासत को सम्मान देना है।

हालांकि रक्षा विशेषज्ञ इस तर्क से पूरी तरह सहमत नहीं हैं। उनका मानना है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में प्रतीकों और शब्दों का भी महत्व होता है। “इंडो” शब्द हटने से यह संदेश जा सकता है कि अमेरिका अब हिंद महासागर क्षेत्र और भारत को पहले जैसी प्राथमिकता नहीं दे रहा।

यह वही सैन्य कमांड है जो एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य गतिविधियों का संचालन करती है। अमेरिकी सेना पूरी दुनिया को अलग-अलग क्षेत्रों में बांटकर 11 प्रमुख कमांडों के जरिए संचालित करती है। इनमें यह सबसे बड़ी और सबसे प्रभावशाली कमांड मानी जाती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि डोनाल्ड ट्रम्प (Donald Trump) के पहले कार्यकाल में चीन को अमेरिका की सबसे बड़ी रणनीतिक चुनौती माना गया था। उस समय भारत को चीन के मुकाबले एक महत्वपूर्ण साझेदार के रूप में प्रस्तुत किया गया। “इंडो-पैसिफिक” शब्द भी उसी रणनीति का हिस्सा था।

अब जबकि कमांड के नाम से “इंडो” हटा दिया गया है, सवाल उठ रहे हैं कि क्या अमेरिका की प्राथमिकताएं बदल रही हैं? क्या वाशिंगटन अब अपनी रणनीति को नए तरीके से परिभाषित कर रहा है? या फिर यह केवल एक प्रतीकात्मक बदलाव है?

फिलहाल पेंटागन का दावा है कि केवल नाम बदला है, जिम्मेदारियां और रणनीति नहीं। लेकिन अंतरराष्ट्रीय संबंधों में कई बार नाम बदलने भर से भी बड़े राजनीतिक संदेश निकलते हैं। इसलिए यह फैसला आने वाले समय में भारत-अमेरिका संबंधों और इंडो-पैसिफिक रणनीति पर चर्चा का विषय बना रहेगा।

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