Thyroid Problem In Women : महिलाओं में थायराइड ज़्यादा क्यों होता है ? जानें प्रमुख कारण और समाधान- थायराइड आज भारत में सबसे तेजी से बढ़ने वाली स्वास्थ्य समस्याओं में से एक है और यह महिलाओं में पुरुषों की तुलना में लगभग आठ गुना ज़्यादा पाई जाती है। थायराइड ग्रंथि हमारे गले के नीचे स्थित होती है और यह शरीर की मेटाबॉलिज़्म, ऊर्जा उत्पादन और हार्मोन संतुलन को नियंत्रित करती है। महिलाओं में यह समस्या अधिक क्यों होती है, इसका मुख्य कारण है हार्मोनल बदलाव और प्रतिरक्षा तंत्र से जुड़ी असमानताएं। आइए जानते हैं इसके प्रमुख कारण विस्तार से। महिलाओं में थायराइड की समस्या पुरुषों से कई गुना ज़्यादा पाई जाती है। जानिए इसके पीछे के प्रमुख कारण हार्मोनल उतार-चढ़ाव, गर्भावस्था, मेनोपॉज, आनुवंशिकता और तनाव जैसी स्थितियां कैसे थायराइड को प्रभावित करती हैं।
हार्मोनल असंतुलन : महिलाओं की जैविक प्रक्रियाओं का प्रभाव-महिलाओं के शरीर में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन जैसे हार्मोन लगातार बदलते रहते हैं। इन हार्मोनल उतार-चढ़ाव का सीधा असर थायराइड ग्रंथि पर पड़ता है। निम्नलिखित स्थितियों में यह असंतुलन सबसे ज़्यादा दिखाई देता है
मासिक धर्म के दौरान-हर महीने होने वाले हार्मोनल बदलाव से थायराइड हार्मोन का उत्पादन प्रभावित हो सकता है, जिससे थकान, चिड़चिड़ापन और वजन बढ़ने जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
गर्भावस्था के समय-गर्भावस्था के दौरान महिला का शरीर कई तरह के शारीरिक और हार्मोनल परिवर्तन से गुजरता है। इस अवधि में थायराइड ग्रंथि को अधिक सक्रिय रहना पड़ता है ताकि भ्रूण को पर्याप्त हार्मोन मिल सकें। यदि ग्रंथि पर्याप्त हार्मोन नहीं बना पाए, तो हाइपोथायरायडिज्म की समस्या हो सकती है।
प्रसव के बाद (Postpartum Thyroiditis)-प्रसव के बाद कई महिलाओं में थायराइड ग्रंथि अस्थायी रूप से प्रभावित होती है, जिसे प्रसवोत्तर थायरायडाइटिस कहा जाता है। इससे शरीर में थकान, मूड स्विंग और वजन में बदलाव जैसे लक्षण दिख सकते हैं।
मेनोपॉज के समय-मेनोपॉज के दौरान एस्ट्रोजन का स्तर गिरता है, जिससे थायराइड कार्यक्षमता भी प्रभावित होती है। इस उम्र में थायराइड की जांच कराना बेहद आवश्यक होता है।
स्व-प्रतिरक्षी रोग (Autoimmune Diseases)
शरीर की गलती से हुई प्रतिक्रिया-महिलाओं में प्रतिरक्षा प्रणाली (immune system) अधिक सक्रिय होती है, लेकिन यही सक्रियता कभी-कभी शरीर के अपने ही अंगों पर हमला करने लगती है। थायराइड से जुड़ी दो प्रमुख स्व-प्रतिरक्षी बीमारियां हैं।
हाशिमोटो थायरायडाइटिस (Hashimoto’s Thyroiditis)-यह बीमारी तब होती है जब शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली थायराइड ग्रंथि को नुकसान पहुंचाने लगती है। इससे ग्रंथि धीरे-धीरे कमजोर होती है और हाइपोथायरायडिज्म (थायराइड हार्मोन की कमी) हो जाता है।
ग्रेव्स डिज़ीज़ (Graves’ Disease)-यह एक दूसरी स्थिति है जिसमें थायराइड अत्यधिक सक्रिय हो जाती है, जिसे हाइपरथायरायडिज्म कहते हैं। दोनों ही स्थितियां महिलाओं में पुरुषों की तुलना में कई गुना ज़्यादा आम हैं।
अन्य कारण जो बढ़ाते हैं थायराइड का जोखिम
आनुवंशिकता (Genetic Factors)-यदि परिवार में किसी को थायराइड की समस्या रही हो, तो महिलाओं में इसके होने की संभावना बढ़ जाती है।
तनाव (Stress)-लंबे समय तक बना रहने वाला तनाव शरीर के हार्मोनल संतुलन को बिगाड़ देता है। इससे थायराइड ग्रंथि पर दबाव बढ़ता है और हार्मोन उत्पादन प्रभावित होता है।
आयोडीन की कमी (Iodine Deficiency)-थायराइड हार्मोन बनाने के लिए आयोडीन एक आवश्यक तत्व है। आहार में आयोडीन की कमी से थायराइड ग्रंथि की कार्यक्षमता घट सकती है, जिससे ‘गॉइटर’ या अन्य विकार उत्पन्न हो सकते हैं।
सावधानियां और समाधान
संतुलित आहार लें जिसमें आयोडीन, सेलेनियम और जिंक प्रचुर मात्रा में हों।
अत्यधिक तनाव से बचें और योग/ध्यान को दिनचर्या में शामिल करें।
हर साल कम से कम एक बार थायराइड की जांच कराएं, विशेषकर गर्भवती या मेनोपॉज के करीब पहुंच चुकी महिलाओं को।
पर्याप्त नींद और नियमित व्यायाम से हार्मोनल संतुलन बनाए रखें।
विशेष-थायराइड कोई लाइलाज बीमारी नहीं है, लेकिन इसे नजरअंदाज करना गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म दे सकता है। महिलाओं में हार्मोनल बदलाव और प्रतिरक्षा प्रणाली की अधिक सक्रियता इस रोग के प्रमुख कारण हैं। समय पर जांच, संतुलित जीवनशैली और मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देकर थायराइड को नियंत्रित रखना पूरी तरह संभव है।

