हिंदू नववर्ष। विक्रम संवत हिंदू नववर्ष (नव संवत्सर) है, जो चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से शुरू होता है। 57 ईसा पूर्व में उज्जैन के राजा विक्रमादित्य द्वारा शकों पर विजय के बाद इसकी शुरुआत की गई थी, जो अंग्रेजी कैलेंडर से लगभग 57 वर्ष आगे है। यह दिन सृष्टि रचना, आध्यात्मिक ऊर्जा, और प्रकृति के नए रूप धारण करने का प्रतीक है, जिसे नवरात्रि और गुड़ी पड़वा के रूप में मनाया जाता है। साल 2026 में, 19 मार्च को विक्रम संवत 2083 की शुरुआत हुई है। जिसे ’रौद्र संवत्सर’ कहा जा रहा है। विशेष बात यह है कि इस वर्ष अधिक मास के कारण 13 महीने होंगे, जो इसे एक अनोखा वर्ष बनाता है।
हिन्दू नव वर्ष
हिन्दुओं का नव वर्ष चैत्र नव रात्रि के प्रथम दिन अर्थात् वर्ष प्रतिपदा एवं गुड़ी पड़वा पर प्रत्येक वर्ष विक्रम संवत के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से आरम्भ होता है। हिंदू कैलेंडर के 12 माह- चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष पौष, माघ और फाल्गुन हैं।
विक्रम संवत नव वर्ष का इतिहास
उत्पत्तिः यह संवत 57 ईसा पूर्व में उज्जैन के पराक्रमी सम्राट विक्रमादित्य द्वारा विदेशी आक्रमणकारियों (शकों) पर विजय प्राप्त करने की याद में शुरू किया गया था।
नामकरणः उन्हीं के नाम पर इसे ’विक्रम संवत’ कहा गया, जो भारतीय संस्कृति में काल गणना का आधार है।
पुराना कैलेंडरः यह ग्रेगोरियन कैलेंडर (अंग्रेजी कैलेंडर) से कहीं अधिक प्राचीन और खगोलीय गणनाओं पर आधारित है।
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का ऐतिहासिक महत्व
इसी दिन के सूर्योदय से ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना प्रारंभ की।
सम्राट विक्रमादित्य ने इसी दिन राज्य स्थापित किया।
इन्हीं के नाम पर विक्रमी संवत् का पहला दिन प्रारंभ होता है। प्रभु श्री राम के राज्याभिषेक का दिन यही है।
शक्ति और भक्ति के नौ दिन अर्थात् नवरात्र का पहला दिन यही है।
सिखो के द्वितीय गुरू श्री अंगद देव जी का जन्म दिवस है।
स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने इसी दिन आर्य समाज की स्थापना की एवं कृणवंतो विश्वमआर्यम का संदेश दिया।
सिंध प्रान्त के प्रसिद्ध समाज रक्षक वरूणावतार झूलेलाल इसी दिन प्रगट हुए।
राजा विक्रमादित्य की भांति शालिवाहन ने हूणों और शकों को परास्त कर भारत में श्रेष्ठतम राज्य स्थापित करने के लिए यही दिन चुना। शक संवत की स्थापना की।
युधिष्ठिर का राज्यभिषेक भी इसी दिन हुआ।
संघ संस्थापक प.पू.डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार का जन्म दिन।
महर्षि गौतम जयंती।
भारतीय नववर्ष का प्राकृतिक महत्व
वसंत ऋतु का आरंभ वर्ष प्रतिपदा से ही होता है जो उल्लास, उमंग, खुशी तथा चारों तरफ पुष्पों की सुगंधि से भरी होती है।
फसल पकने का प्रारंभ यानि किसान की मेहनत का फल मिलने का भी यही समय होता है।
नक्षत्र शुभ स्थिति में होते हैं अर्थात् किसी भी कार्य को प्रारंभ करने के लिये यह शुभ मुहूर्त होता है।
नव वर्ष का महत्व
धार्मिक और पौराणिकः पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, ब्रह्माजी ने चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन ही सृष्टि का निर्माण शुरू किया था।
प्रकृति का नव वर्षः यह समय वसंत ऋतु के बाद आता है, जब प्रकृति में नया जीवन, पेड़-पौधों में नए पत्ते और फूल आते हैं।
नवरात्रि का प्रारंभः इसी दिन से चैत्र नवरात्रि का प्रारंभ होता है, जिसमें नौ दिनों तक शक्ति की पूजा की जाती है।
सांस्कृतिक विविधताः भारत के विभिन्न हिस्सों में इसे अलग-अलग नामों से मनाया जाता है, जैसे – गुड़ी पड़वा (महाराष्ट्र), चेटी चंड (सिंधी समाज), उगादी (दक्षिण भारत), और नौरोज (कश्मीर)।
ज्योतिषीय प्रभावः ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, इस दिन सूर्य की स्थिति के आधार पर पूरे वर्ष के राजा, मंत्री और मौसम का पूर्वानुमान तय होता है।

