रीवा के लक्ष्मणबाग से जुड़े देश भर में है 72 मंदिर, चारोधाम से जुड़ा है ऐसा रिश्ता

रीवा। रीवा और विंध्य की रिमही जनता आदिकाल से पूजा-अर्चना एवं चारोधाम के प्रति अपार आस्था रखती आ रही है। यहां के लोग ऐसे पावन तीर्थस्थालों का दीदर करके जीवन के उद्रदेश्य को पूर्ण मानते रहे है, लेकिन पहले संसाधनों की कंमी की वजह से यहा का हर आदमी इस पुण्य लाभ को प्राप्त नही कर पा रहा था। जिस पर रीवा राज्य परिवार ने गहन मंथन करने के बाद बिछिया नदी के तट पर एक ऐसे धार्मिक स्थल को विकसित करने की योजना बनाई। जिससे रीवा में ही यहां के लोगो को चारोधाम की यात्रा का पुण्य लाभ प्राप्त हो सकें।

1618 ईस्वी में बना था रीवा का लक्ष्मणबाग मंदिर

मंदिर से जुड़े लोगो से जो जानकारी मिलती है उसके तहत इस मंदिर की स्थापना 1618 ईस्वी में रीवा के तत्कालीन महाराज विश्वनाथ सिंह ने विंध्य क्षेत्र के लोगों को चारधाम की यात्रा कराने के उद्देश्य से करवाई थी। महाराज विश्वनाथ सिंह बहुत ही धार्मिक प्रवृत्ति की महाराज थें। वे स्वयं पूजा-अर्चना करने के साथ ही रिमही जनता को धार्मिक एवं सामाजिक क्षेत्र में जोड़ने के लिए इस स्थान को विकसित करवाया। उन्होंने देश के विभिन्न धार्मिक स्थलों से देवी-देवताओं की प्रतिमाएं लाकर यहाँ स्थापित करवाएं, यहा 13 मंदिरों का निर्माण किया गया है, निमार्ण काल से यह मंदिर रीवा राज्य के लिए एक महत्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र की तरह बना हुआ है।

भगवान लक्ष्मण से जुड़ा है इस संस्थान का नाम

इतिहासकार बताते है कि इस मंदिर के नामकरण के पीछे बड़ी ही रोचक कहानी है. बिछिया नदी के तट पर स्थापित कराए गए इस धार्मिक स्थल के नामकरण की जब बात आई, तो ये तय हुआ कि इस स्थान को रीवा राज्य के आराध्य देव भगवान लक्ष्मण के नाम से जोड़कर, इसे तीर्थ स्थल का रूप दिया जाए। ऐसी मान्यता है कि रीवा के किले की राजगद्दी में भगवान लक्ष्मण ही बैठते हैं. जिसके चलते इस धार्मिक स्थल का नाम भगवान लक्ष्मण के नाम से इसे जोड़ा गया। इस धार्मिक स्थल को बहुत ही रमणिक बनाया गया था और मंदिर की तीन तरफ से बिछिया नदी का बहाव रहा तो वही एक छोर पर बहुत ही सुंदर बाग बनाया गया था। रीवा राज्य के आराध्य देव भगवान लक्ष्मण और इस बाग को जोड़कर इस स्थान का नाम लक्ष्मणबाग रखा गया।

बद्रीनाथ, जगन्नाथ, रामेश्वरम और द्वारका धाम की मिट्रटी का उपयोग

मंदिर के लोगो से जो जानकारी मिलती है उसके तहत रीवा को अपनी राजधानी बनाने के बाद बघेल राजवंश द्वारा इस मंदिर की स्थापना कराई गई थी. बद्रीनाथ, जगन्नाथ, रामेश्वरम और द्वारका धाम की मिट्रटी का उपयोग लक्ष्मणबाग मंदिर के निर्माण में किया गया था। ऐसी मान्यता है कि रीवा के तत्कालीन महाराज विश्वनाथ सिंह ने देश के विभिन्न धार्मिक स्थलों से देवी-देवताओं की प्रतिमाएं लाकर यहाँ स्थापित करवाएं। इसके पीछे उनकी सोच थी कि अगर उनकी कोई रिमही जनता बद्रीनाथ, जगन्नाथ, रामेश्वरम और द्वारका धाम किसी कारण से नही पहुच पाती है तो वे रीवा के लक्ष्मणबाग की यात्रा करके चारोधाम की यात्रा का पुण्य लाभ ले सकेगी, लक्ष्मणबाग में सभी धामों की प्रतिमाओं को स्थापित किया गया था और आज भी इस भव्य मंदिर में आस्था भक्ति रखने वाले लोगो के लिए प्रतिमाएं स्थापित है। लक्ष्मण बाग में स्थापित 13 मंदिरों में स्थापित चारधाम के देवी-देवताओं के दर्शन होते हैं. इस मंदिर में आकर लोग चारों धाम की यात्रा का पुण्य प्राप्त करते हैं।

लक्ष्मणबाग को बनाया गया था धनवान

लक्ष्मणबाग का मंदिर अपने स्थापना काल से ही धन को लेकर सपन्न रहा। इस मंदिर की आय कभी कम न होने पाए इसके लिए रीवा के बघेल राजाओं ने लक्ष्मणबाग संस्थान के नाम पर जमीन दान में दिया था. लक्ष्मणबाग संस्थान द्वारा देश के अलग-अलग हिस्सों में मंदिरों की स्थापना कराई गई थी। बघेलखंड के अलावा दूसरें राज्यों में भी लक्ष्मणबाग के मंदिर बने हुए है। जिसमें से प्रमुख मंदिरों में राधामोहन बांदा, रानीमंदिर और रामभजन दारागंज प्रयागराज, सवामन सालिग्राम वृंदावन, श्री रामानुज कोटि बद्रीनाथ गढ़वाल, रीवा क्षेत्र श्री जगन्नाथपुरी पुरी, बड़ी बघेली जोधपुरी, छोटी बघेली जोधपुर, ब्रम्हशिला फतेपुर, राजघाट कनखल हरिद्वार, छत्रपालगढ़, हनुमान जी इंदाराकुंआ दिल्ली, रघुनाथ जी रामदास इलाहाबाद के साथ ही गया, तिरुपतिबालाजी सहित अन्य स्थानों पर हैं।

हांलाकि राजतंत्र सामाप्त होने के बाद से यह संस्थान दुर्दशा का शिकार होता गया। इस संस्थान से जुड़े देश भर में 72 मंदिर है। अधिकांश में संपत्ति को लेकर विवाद चल रहे है। लगातार आय के स्त्रोत घटते जा रहे हैं, संपत्तियों में अवैधानिक रूप से कब्जा होता जा रहा है। जिस लक्ष्मणबाग में सावन मास लगते ही दूरस्थ गांव के लोग सावन झूला एवं अन्य उत्सव को देखने के लिए हजारों की संख्या में अपने परिवार के साथ पहुचने लगते थें तो वही लक्ष्मणबाग की यात्रा पर 12 महीनें लोगो की आवाजाही बनी रहती थी। वह रमणिक स्थान अब सुनशान स्थान का रूप लेता जा रहा है। आज बदलते दौर के साथ ही साधन, सुविधा और सम्पन्नता के चलते लक्ष्मणबाग में लोगो की आवाजाही अब नाममात्र की रह गई है। बुजूगों की यादों तक यह संस्थान सिमटता जा रहा है, क्योकि लक्ष्मणबाग की व्यवस्था आदिकाल से जो रही, वह उतने तक ही सीमित रह गई। इस संस्थान को कोई नया रूप न मिल पाने के कारण धार्मिक पर्यटकों की संख्या में लगातार कंमी आ रही है।

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