रीवा। रीवा का दशहरा अपनी अनूठी शाही परंपराओं और गद्दी पूजन के लिए पूरे देश में प्रसिद्ध है। मैसूर के बाद रीवा ही एकमात्र ऐसा स्थान माना जाता है, जहाँ दशहरे पर शाही अंदाज में गद्दी पूजन किया जाता है। रीवा का दशहरा समारोह 400 साल से भी अधिक पुरानी ऐतिहासिक राजसी परंपरा का हिस्सा माना जाता है, जिसकी तुलना दक्षिण भारत के मैसूर के दशहरे से की जाती है। रियासत काल में इस उत्सव का अपना अलग वैभव था, लेकिन आजादी के बाद भी इसकी परंपराओं को अब तक जीवंत रखा गया है। समय के साथ आयोजन स्थल बदलते गए और संसाधन भी नए जुड़ते गए, लेकिन उत्सव का मूल स्वरूप आज भी पहले जैसा ही है।
महाराजा विक्रमादित्य सिंह जूदेव ने रखी थी नींव
जो तथ्य मिलते हैं, उनके अनुसार रीवा में पहली बार इसकी शुरुआत वर्ष 1617 में बांधवगढ़ किले से रीवा किले में राजधानी स्थानांतरित होने के बाद शुरू हुई थी। तत्कालीन महाराजा विक्रमादित्य सिंह जूदेव ने इस परंपरा की नींव रखी थी। यह दशहरा उत्सव तब रीवा किले के सामने वाले मैदान में मनाया गया था। हालाँकि, समय-समय पर दशहरा उत्सव के आयोजन स्थल बदलते रहे हैं। शुरुआती कुछ वर्षों तक यह आयोजन किला परिसर में होता रहा। इसके बाद बिछिया मोहल्ले के मैदान में दशहरा उत्सव मनाया जाने लगा। यहाँ रियासत के हर हिस्से से लोग आते थे और महाराजा के सामने हाजिरी लगाते थे। इसी वजह से इस मैदान का नाम हजरिहा रखा गया। उन दिनों मशालें और मस्ताब जलाकर रोशनी की जाती थी तथा आतिशबाजी के साथ उत्सव मनाया जाता था। समय के साथ दशहरा उत्सव को नया रूप मिलता रहा और उसका विस्तार भी होता गया।
बदलते रहे दशहरा के मैदान
महाराजा गुलाब सिंह और फिर मार्तंड सिंह के कार्यकाल में इस उत्सव को और विस्तार मिला। दूसरी रियासतों से भी अतिथि इसे देखने आने लगे। बाद में दशहरा उत्सव का आयोजन बोदाबाग के मैदान में होने लगा, जहाँ आज विश्वविद्यालय का स्टेडियम बना हुआ है। इसके बाद आयोजन स्थल बदलकर टीआरएस कॉलेज के (9)एनसीसी मैदान में आ गया, जहाँ अब तक यह परंपरा जारी है।
राजगद्दी पर विराजमान होते है राजाधिराज
रीवा में दशहरे पर गद्दी पूजन की परंपरा सैकड़ों साल पुरानी है, जो यहाँ की अनूठी राजसी परंपरा और धार्मिक आस्था का प्रतीक है। इस परंपरा के अनुसार, दशहरे के दिन सबसे पहले राजगद्दी का विधिवत पूजन किया जाता है। यहाँ के महाराजा स्वयं गद्दी पर नहीं बैठते, बल्कि सेवक के रूप में गद्दी के नीचे या सामने बैठकर भगवान श्रीराम की पूजा-अर्चना करते हैं। भगवान श्रीराम को (11)रीवा का राजाधिराज माना जाता है और राजगद्दी उन्हीं को समर्पित है। दरसल रीवा राज्य के आराध्य लक्ष्मण जी माने जाते हैं। मान्यता है कि उन्होंने भी राजगद्दी भगवान श्रीराम को समर्पित की थी। इसी मान्यता और परंपरा का पालन रीवा के राजपरिवार में पीढ़ियों से होता आ रहा है। दशहरे के अवसर पर पूजा-अर्चना के साथ (12)नीलकंठ पक्षियों को छोड़ने की परंपरा भी निभाई जाती है। यही विशिष्ट परंपराएँ रीवा के दशहरे को एक अलग पहचान देती हैं, जहाँ राजा स्वयं को गद्दी का स्वामी नहीं, बल्कि (13)भगवान श्रीराम का सेवक मानकर उनकी आराधना करता है।
हाथी, घोड़े, ऊँट और बग्घियाँ चल समारोह में होते थें शामिल
इतिहासकार बताते हैं कि पहले दशहरे के जुलूस और समारोह में हाथी, घोड़े, ऊँट और बग्घियाँ शामिल होती थीं। उनकी सजावट की छटा देखते ही बनती थी। लाव-लश्कर में शामिल हाथियों और घोड़ों को सोने-चांदी के आभूषणों से सजाया जाता था। सबसे आगे राजाधिराज और फिर उसके पीछे महाराजा की सवारी चलती थी, और उनके साथ चलने वाले सजे-धजे हाथी-घोड़े तथा जलती हुई मशालों और मस्ताब के बीच निकलने वाला यह जुलूस भव्य दृश्य प्रस्तुत करता था। इसके बाद हाथियों, घोड़ों और शाही बग्घियों के साथ विशाल सैन्य परेड और जुलूस निकाला जाता था। यह जुलूस किले के मछरिहा दरवाजे से शुरू होकर कोतवाली टावर होते हुए घंटाघर पहुँचता था। वहाँ से आगे बढ़ते हुए प्रकाश चौक, धोबिया टंकी और गुढ़ चौराहे से होकर बिछिया स्थित जगन्नाथ मंदिर के सामने बने विशाल मैदान तक जाता था, जहाँ रीवा का दशहरा उत्सव आयोजित होता था।
ऐसे तैयार किया जाता था रावण पुतला
अंत में भव्य रावण दहन होता था। रावण की विशाल प्रतिमा मिट्टी से बनी होती थी, उसके दसों मुख और पेट घड़ों से तैयार किए जाते थे। पेट के घड़े में लाल रंग का पानी भरा जाता था, ताकि राम बने व्यक्ति के तीर मारते ही रक्त बहने जैसा दृश्य दिखाई दे। रावण के मुख्य मुख के ऊपर मिट्टी से बने गधे का सिर लगाया जाता था। शानदार आतिशबाजी और कलाबाजियों से सजा यह उत्सव देखने दूर-दूर से लोग रीवा आते थे। उस समय शहर की धर्मशालाओं में ग्रामीणों का पड़ाव होता था और रिमही जनता इस ऐतिहासिक उत्सव की साक्षी बनती थी।
बदलता रहा दशहरें का स्वरूप
रीवा के दशहरा उत्सव का शाही अंदाज भले ही सदियों पुराना है, समय के साथ भले इसका स्वरूप बदला है, लेकिन इसका शाही अंदाज आज भी कायम है। बिजली का विस्तार होने के बाद मशालों और मस्ताब की जगह विद्युत रोशनी ने ले ली। अब पूरा उत्सव बिजली की रोशनी से जगमगाता है। इसी तरह, हाथियों और घोड़ों की जगह अब विभिन्न प्रकार के वाहन जुलूस में शामिल होने लगे हैं। इस तरह, बदलते समय और संसाधनों के बावजूद रीवा का दशहरा अपनी ऐतिहासिक पहचान, शाही वैभव और गद्दी पूजन की विशिष्ट परंपरा को आज भी संजोए हुए है। दशहरा उत्सव समिति और प्रशासन के स्तर पर इस आयोजन की तैयारियाँ की जाती हैं, ताकि रीवा की यह गौरवशाली परंपरा आगे भी जीवंत बनी रहे।

