सोहर (Sohar)। बच्चे के जन्म के तुरंत बाद से ही घर में सोहर की गूंज सुनाई देने लगती है। खासतौर से जन्म के छठे दिन, जिसे छठी संस्कार कहा जाता है, इस अवसर पर महिलाएं समूह में इकट्ठा होती हैं। ढोलक की थाप और मंजीरे की खनक के साथ जब महिलाएं ऊंचे स्वर में सोहर गाती हैं, तो पूरा वातावरण मांगलिक और हर्षोल्लास से भर जाता है। इन गीतों की पंक्तियों में नवजात के लिए अपार स्नेह, खुशी और उज्ज्वल भविष्य की मंगलकामनाएं छिपी होती हैं।
उत्तर भारत, बिहार और मध्य प्रदेश का पारंपरिक लोकगीत
सोहर (Sohar) उत्तर भारत, बिहार और मध्य प्रदेश में बच्चे के जन्म पर गाया जाने वाला पारंपरिक लोकगीत है, जो हर्ष, उल्लास और मंगलकामना को दर्शाता है। इन गीतों में कृष्ण या राम के जन्म की कथाओं के माध्यम से नवजात को आशीर्वाद दिया जाता है, जिसमें बच्चे के उज्ज्वल भविष्य की कामना की जाती है।
त्याग, भावना और हास्य का संगम
सोहर गायन में जहां एक ओर शिशु के लिए दुआएं होती हैं, वहीं दूसरी ओर एक मां के प्रसव कालीन संघर्ष और उसके त्याग की मर्मस्पर्शी व्याख्या भी मिलती है। गीत के बोल उस पीड़ा को व्यक्त करते हैं जिसे सहकर एक मां सृष्टि का सृजन करती है। इसके साथ ही, सोहर में पारिवारिक रिश्तों के बीच हल्के-फुल्के मजाक और तीखे व्यंग्य का पुट भी होता है। ननद-भाभी या अन्य रिश्तेदारों पर किए जाने वाले ये मधुर कटाक्ष उत्सव के वातावरण को जीवंत और हास्य-विनोद से भरपूर बना देते हैं।
सोहर की कहानी और महत्व
पौराणिक संबंध: सोहर में अक्सर भगवान राम या कृष्ण के जन्म के प्रसंग आते हैं। इसमें कौशल्या या यशोदा के घर उत्सव और बधाई का वर्णन होता है, जिससे घर में सुख-समृद्धि का संचार होता है।
पारंपरिक और भावात्मक: ये गीत पीढ़ी-दर-पीढ़ी महिलाओं द्वारा गाए जाते हैं, जो बच्चे के जन्म की खुशी में परिवार और समुदाय को एक साथ लाते हैं।
शुभकामनाएं: सोहर के माध्यम से बच्चा बड़ा होकर यशस्वी, पराक्रमी और सफल होने का आशीर्वाद पाता है।
लोकप्रिय पंक्तियाँ: इसमें “जुग-जुग जियसु ललनवा” जैसे लोकप्रिय गीत गाए जाते हैं, जो लंबी उम्र और खुशी की कामना करते हैं।

