Har-Gauri Statue Rewa: उमा-माहेश्वर अर्थात शिव और पार्वती का दिव्य और युगल रूप, हिंदू मूर्तिकला के सबसे कोमल, सौम्य और भावपूर्ण अभिव्यक्तियों में से एक माना जाता है। इसमें शिव और पार्वती को प्रेम, सामंजस्य और दाम्पत्य सौंदर्य से ओत-प्रोत युवा रूप में दर्शाया जाता है। इस मनोहर युगल दाम्पत्य रूप को दर्शाती एक अद्भुत प्रतिमा रीवा शहर में भी स्थित है। जिसे देखते ही मन कुछ क्षणों के लिए ही सही, उसके सौन्दर्य और लालित्य को देखकर ठहर जाता है। यह प्रतिमा कलचुरीकालीन है और मूलतः गुरगी में स्थापित थी और वहीं से इसे रीवा लाया गया था।
सबसे पहले कनिंघम ने देखा था
इसी परंपरा को व्यक्त करती एक बहुत ही खूबसूरत और भावप्रणव प्रतिमा रीवा शहर के घंटाघर-मूर्ति चौराहा के समीप, नगर-निगम के सामने पदमधर पार्क के मध्य में भी स्थापित है। मूलतः यह प्रतिमा गुरगी से प्राप्त हुई थी और वहीं से इसको रीवा लाया गया था। पहली बार इस हर-गौरी की खूबसूरत और विशाल प्रतिमा को जनरल कनिंघम ने गुरगी यात्रा के दौरान देखा था और अपनी किताब “रिपोर्ट्स ऑफ अ टूर इन बुंदेलखंड एंड रीवा” में इसका जिक्र भी किया है, तब यह प्रतिमा गुरगी टीले के उत्तर-पश्चिमी भाग में, एक गहरे गड्ढे में औंधी लेटी हुई पड़ी थी। कनिंघम के अनुसार यह मूर्ति बहुत विशाल थी जिसके चरणों के पास शिव के वाहन नंदी बैल का अंकन था।
शैव ग्रंथों में उमा-माहेश्वर का वर्णन
शैव परंपरा में उमा-महेश्वर को पंचविंशतिमूर्ति, अर्थात शिव के पच्चीस प्रतिष्ठित रूपों में से एक माना जाता है। आगम ग्रंथों विशेषतः दक्षिण भारत के शैव सिद्धांत साहित्य और प्राचीन शिल्पशास्त्रों में इस रूप का विस्तार से वर्णन मिलता है, जहाँ इसे शिव और शक्ति के आदर्श संतुलन का प्रतीक माना गया है। हालांकि उमा-महेश्वर को समर्पित मंदिर बहुत कम हैं, लेकिन इसके बाद भी प्राचीन समय में देश के प्रत्येक राजवंशों द्वारा निर्मित मंदिरों में उमा महेश्वर की विभिन्न मुद्राओं का अंकन मिलता है। मूर्तिकला के इतिहास में किसी देवता के साथ उसकी पत्नी का चित्रण, सबसे पहले उमा-महेश्वर के रूप में ही कुषाणकाल में प्रारंभ हुआ था।
महाराज गुलाब सिंह गुरगी से रीवा लाए
इस विशाल प्रतिमा को गुरगी से रीवा महाराज गुलाब सिंह जूदेव लाए थे क्योंकि उनकी मंशा, इन उत्कृष्ट कलाकृतियों से रीवा को सजाना था, उन्होंने कोठी कंपाउंड घंटाघर के सामने अपने पिता महाराज व्यंकट रमण सिंह की मूर्ति लगवाई थी, अपनी माँ उज्जैनिन महारानी के नाम से एक विशाल भवन भी बनवाया था, जो आज का नगर-निगम का ऑफिस है, उसके सामने विशाल प्रांगण को सजाने के उद्देश्य से ही उन्होंने यह विशिष्ट और खूबसूरत प्रतिमा मँगवाई थी। लेकिन उससे पहले कि वह इसे लगवा पाते उन्हें अंग्रेजों ने राजच्युत कर दिया, प्रतिमा कोठी कंपाउंड परिसर में ही पड़ी रही, इसके कुछ वर्षों बाद 1952 में जब कस्तूरीरंगम संथानम, विंध्यप्रदेश के लेफ्टिनेंट गवर्नर बने तो उन्होंने इस मूर्ति को पुनः स्थापित करने का विचार किया और इसके लिए उन्होंने सुंदर लाल पत्थरों की गुंबद वाली चौपहली छतरी का निर्माण करवा के उस के अंदर ही यह हर-गौरी की प्रतिमा स्थापित करवा दी।
कलचुरी काल में निर्मित है प्रतिमा
इस प्रतिमा का निर्माण 10वीं 11 वीं शताब्दी कलचुरी काल में हुआ था। लगभग 15 फीट लंबी और 6 फीट चौड़ी बलुआ पत्थर से निर्मित और कुचस्पर्श मुद्रा को दर्शाती यह भव्य हर-गौरी प्रतिमा प्राचीन समय के भारत के उत्कृष्ट शिल्प परंपरा का अद्भुत उदाहरण है। जिसमें कलचुरी काल की बेहतरीन परिष्कृत एवं सजीव कला-शैली का उत्कृष्ट चित्रण दिखाई देता है। प्रतिमा के ऊपरी भाग में गंधर्वों के दो युग्म अर्थात जोड़े अंकित हैं, जो अलौकिकता के साथ ही उन्मुक्तता का भी आभास कराते हैं। वहीं निचले भाग में शिव के पैरों की तरफ उनका वाहन नंदी, तथा देवी उमा की तरफ उनके वाहन सिंह का अंकन है जो शिव-परिवार की शक्ति के प्रतीक हैं। तथा नीचे के दोनों तरफ खड़े हुए दो सेवक उत्कीर्ण हैं, जो शिवगणों की सेवा भावना का प्रतीक हैं।
रीवा की हर-गौरी प्रतिमा का रहस्य | The mystery of the Har-Gauri statue of Rewa
इस प्रतिमा में शिव-पार्वती त्रिभंग मुद्रा में खड़े हुए हैं जिसमें- गर्दन, कटिभाग अर्थात कमर तथा घुटने में एक स्वाभाविक सौम्य वक्रता दिखाई देती है। प्रतिमा को देखते हुए ऐसा प्रतीत होता है मानो देवी पार्वती अपने स्नेह और आकर्षण से भगवान शिव को अपनी ओर आकृष्ट कर रही हों, और शिव उन्हें तिरछी स्नेहिल दृष्टि से निहार रहे हों। दरसल यह मूर्ति एक प्राकृतिक चट्टान को काट कर बनाई गई है, जिसमें शिल्पकार ने उसके अग्र-भाग को तराशते हुए दाम्पत्य जीवन के हृदयविनोदात्मक और शृंगारिक अंतरंग भाव को अत्यंत सूक्ष्मता से उकेर दिया है।
प्रतिमा के दिव्य अलंकरण
प्रतिमा में भगवान शिव और माता पार्वती दोनों के मुखमंडल अत्यंत शांत, सौम्य और लालित्य ध्यानमग्न भावों से युक्त हैं। प्रतिमा में शिव त्रिनेत्रधारी हैं और ललाट पर उनकी तीसरी आँख स्पष्ट रूप से अंकित है, तथा मस्तक पर सुसज्जित जटाएँ हैं जो उनकी योगी छवि की प्रतीक हैं, उनके कानों में विशाल कुण्डल हैं और गले में तीन धागों वाली माला सुशोभित है। छाती पर सात मोतियों की अलंकरण श्रृंखला, दाहिने कंधे पर यज्ञोपवीत, नाभि के चारों ओर करधनी, भुजाओं में बाजूबंद तथा चरणों में पायल अत्यंत सूक्ष्म कलात्मकता के साथ उकेरे गए हैं। जबकि भगवान शिव के वामांग अर्थात बाईं तरफ माता पार्वती की भव्य आकृति दर्शाई गई है। उनके हाथ चूड़ियों और कंगनों से अलंकृत हैं। गले में लंबी माला है, जबकि स्तनों को ढँकता हुआ चौड़ा हार और उसके मध्य लटका हुआ लोलक अर्थात पेंडेंट है, जो स्त्री सौंदर्य और दिव्यता का प्रतीक है। उनकी नाभि के चारों ओर सजी सांकल, पैरों में पायल तथा नाभि के नीचे पुष्पालंकरण से युक्त पारदर्शी वस्त्र कोर्सेट, प्रतिमा के शिल्प सौंदर्य को जीवंत कर देते हैं।
शिव-पार्वती की मोहक भंगिमा
लेकिन इस प्रतिमा की सबसे मोहक और कलात्मक विशेषता माता पार्वती की वह स्नेहिल भंगिमा है, जिसमें उन्होंने अत्यंत कोमलता युक्त मैत्री भाव के साथ अपना दाहिना हाथ भगवान शिव के कंधे पर रखा हुआ है, जिसे देख यूं लगता है मानो दाम्पत्य का विश्वास और आत्मीयता स्वयं पत्थर में ढल गई हो। जबकि उन्होंने अपने बाएँ हाथ में कमल का पुष्प ले रखा है, जो शुद्धता, सौंदर्य और दिव्यता का प्रतीक है। वहीं भगवान शिव का का बायाँ हाथ खंडित है, जबकि दाहिना हाथ, देवी पार्वती के पीठ से होता हुआ वक्षस्थल की ओर जाता हुआ दिखाई देता है, पर इस सम्पूर्ण मुद्रा और भाव भंगिमा में लौकिक कामुकता का लेशमात्र भी नहीं है। बल्कि इसके विपरीत यह तो शिव-शक्ति के अभिन्न, पूर्ण और संतुलित दाम्पत्य भाव को अभिव्यक्त करता है। जहाँ- करुणा, स्नेह, प्रेम-विश्वास और आध्यात्मिक संतुलन एक साथ मूर्त रूप में सुसज्जित होकर प्रतिष्ठित हो जाते हैं।
राखलदास बनर्जी का विवरण
राखलदास बनर्जी अपनी किताब “द हैहय ऑफ त्रिपुरी एंड देयर मॉन्यूमेंट्स” में गुरगी के पुरातात्त्विक महत्व पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए इस प्रतिमा की भी जानकारी देते हैं। वे जनरल कनिंघम तथा उनके सहायक मिस्टर गैरिक की गुरगी यात्राओं के विवरणों के साथ-साथ सन् 1920 में की गई अपनी स्वयं की यात्रा के आधार पर बताते हैं कि गुरगी में लगभग 15 से 20 फीट ऊँचा एक विशाल टीला है, जिसे स्थानीय लोग “गुरगज” कहते हैं। इस टीले के आसपास अनेक मंदिरों के अवशेष तथा कई विशाल प्रतिमाएँ बिखरी हुई थीं। इन प्रतिमाओं में से एक अत्यंत भव्य और अलंकृत हर-गौरी अर्थात उमा-महेश्वर की भी प्रतिमा है।
त्रिपुरी के शासक युवराजदेव ने बनवाया था विशाल मंदिर
बैनर्जी आगे लिखते हैं कि गुरगी से एक अन्य महत्वपूर्ण पुरातात्त्विक साक्ष्य शैव सन्यासी प्रभावशिव का एक बिना तिथि अंकित अभिलेख भी प्राप्त हुआ है। इस अभिलेख में उल्लेख है कि त्रिपुरी के राजा युवराजदेव ने यहाँ एक अत्यंत विशाल और भव्य मंदिर का निर्माण करवाया था, जिसकी भव्यता की तुलना स्वयं कैलाश पर्वत से की गई है। राखलदास बनर्जी इस मंदिर की ऊँचाई लगभग 150 फीट के आसपास अनुमानित करते हैं। इसी अभिलेख से यह जानकारी भी मिलती है कि इस मंदिर के समीप ही प्रशांतशिव द्वारा ईश्वर, अर्थात महादेव का एक और मंदिर बनवाया गया था। चूँकि यह भव्य और कलात्मक हर-गौरी प्रतिमा गुरगी में उसी स्थान पर ही एक गड्ढे में पड़ी हुई अवस्था में प्राप्त हुई थी, इसलिए अनुमानतः यह प्रतिमा इन्हीं दोनों प्राचीन मंदिरों में से किसी एक में प्रतिष्ठित रही होगी। सबसे अधिक संभावना इस बात की है कि यह युवराजदेव कल्चुरि द्वारा निर्मित उस मंदिर की ही प्रतिमा थी, जिसकी तुलना कैलाश पर्वत से की गई है। क्योंकि गुरगी अभिलेख के अनुसार प्रशांतशिव द्वारा इस मंदिर के प्रांगण में कई मूर्तियों की स्थापना की गई, जिसमें उमा सहित शिव की भी प्रतिमा थी।
रीवा किले का भव्य पुतरिहा दरवाजा
हालांकि बहुत संभव है कि यह उमा-माहेश्वर को समर्पित मंदिर ही रहा हो, क्योंकि इस मत की पुष्टि एक अन्य तथ्य से भी होती है, बनर्जी के अनुसार पूर्व रीवा महाराज के सचिव पं. जानकी प्रसाद ने उन्हें बताया था कि लगभग पचास वर्ष पूर्व गुरगी से एक विशाल, अलंकृत तोरण उठवाकर रीवा किले के पूर्वी द्वार पर स्थापित किया गया था, जो पहले गुरगी के खंडहरों में ही पूर्वाभिमुख स्थित था। 12 फीट चौड़े और 30 फीट लंबे इस तोरण पर हिमालयराज के घर की ओर प्रस्थान करती भगवान शिव की दिव्य बारात का अत्यंत भावपूर्ण अंकन किया गया है। इसमें शिव नंदी पर आरूढ़ दिखाई देते हैं, जबकि उनके पीछे-पीछे उल्लास, उमंग और आनंद से परिपूर्ण शिवगण बारात में चलते हुए अंकित किए गए हैं। तोरण के स्तंभों पर अप्सराओं की मनोहारी आकृतियाँ उत्कीर्ण हैं, जहाँ वे शृंगार करती हुईं, नृत्य की तैयारी में मग्न और भाव-भंगिमाओं से युक्त हैं। उनके वस्त्र, आभूषण, केश-सज्जा और मुद्राएँ बहुत ही सूक्ष्मता और कलात्मक के साथ उकेरी गई हैं।
गुरगी के उसी मंदिर में स्थापित थी प्रतिमा
दरसल इस तोरण को रीवा महाराज विश्वनाथ सिंह द्वारा गुरगी से उठवाकर रीवा लाया गया था और इसे किले के पूर्वीद्वार पर लगवाया गया था, चूंकि इसमें कई छोटी-छोटी कलात्मक प्रतिमाएं थीं, जिन्हें बघेली भाषा में “पुतरी” कहा जाता है, इसीलिए स्थानीय लोगों द्वारा इसे पुतरिहा दरवाजा कहा जाता था। जबकि इसे कई जगह झूला दरवाजा भी कहा गया है, इसके बेजोड़ स्थापत्य और भावपूर्ण अलंकरण के कारण, ब्रिटिश लेखक समर सिपलेनी ने तो इसे दुनिया का सबसे खूबसूरत दरवाजा कहा था। इसीलिए बहुत संभव है कि शिव बारात चित्रित यह दरवाजा उमा-माहेश्वर को समर्पित कैलाश सदृश्य मंदिर में ही सामने स्थापित रहा होगा। इसके विपरीत, दूसरे मंदिर को विशेष रूप से ईश्वर अर्थात महादेव का मंदिर कहा गया है, इसीलिए संभवतः वहाँ केवल शिवलिंग ही स्थापित रहा होगा। राखलदास बनर्जी एक और संभावना जताते हैं और महसाँव वाले मंदिर को ही वह दूसरा मंदिर मानते हैं, जिसका निर्माण प्रशांतशिव ने करवाया था।
शिव-पार्वती के दिव्य दाम्पत्य की प्रतिमूर्ति
अब एक सवाल स्वाभाविक रूप से आप सबके मन में उठ सकता है कि इस प्रतिमा को शिव-पार्वती कैसे माना जाए, जबकि इसमें शिव के परिचित प्रतीक, जैसे त्रिशूल, नाग या चंद्रमा का स्पष्ट रूप से अंकित नहीं हैं। इसका उत्तर हमने पहले ही दे दिया था, कि प्राचीन काल में शैव मूर्तिकला के पच्चीस रूप प्रचलित थे, इन्हीं में से एक इस तरह की युगल प्रतिमाएं भी होती हैं, जो शिव और पार्वती के प्रेमपूर्ण दाम्पत्य जीवन को दर्शाती हैं। ऐसे रूपों में तपस्वी या संहारक शिव की नहीं, बल्कि गृहस्थ और करुणामय शिव की कल्पना की गई है, इसलिए उनके आभूषण और आयुध गौण हो जाते हैं। लेकिन फिर भी, इस प्रतिमा की पहचान के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत नीचे की ओर अंकित बैल और सिंह हैं, जो क्रमशः शिव और पार्वती के वाहन हैं और ये दोनों ही स्पष्ट रूप से संकेत देते हैं कि यह केवल एक सामान्य युगल मूर्ति नहीं, बल्कि शिव-पार्वती के दिव्य दाम्पत्य रूप, अर्थात उमा-महेश्वर की ही प्रतिमा है।
रीवा और विंध्य के लोगों की अनभिज्ञता
अपनी उत्कृष्ट और विशिष्ट स्थापत्य कला के लिए प्रसिद्ध इस प्रतिमा को देखने देशभर से इतिहास और पुरातत्व के विद्यार्थी और शोधार्थी आते हैं। किंतु यह एक विडंबना ही है कि रीवा और समूचे विंध्य क्षेत्र के लोग इसके वास्तविक महत्व से आज भी परिचित नहीं हैं। इसीलिए आज ये अद्वितीय प्रतिमा अपने उपेक्षा की मौन पीड़ा सह रही है, यूं लगता है मानो अपनी ही बदहाली पर विलाप कर रही हो। अगर आज यह प्रतिमा किसी मंदिर में स्थापित होती, तो यहाँ निश्चय ही भक्तों और दर्शनार्थियों की निरंतर भीड़ लगी रहती, हम अकसर किसी देव मूर्ति को देखते ही धार्मिक भाव से भर उठते हैं, क्योंकि मंदिरों में स्थापित प्रतिमाएँ हमें सहज ही श्रद्धा और भक्ति से भर देती हैं। वर्तमान समय में यह प्रतिमा एक पार्क में स्थापित है, और हम प्रायः पार्कों में लगी मूर्तियों को केवल सजावट की वस्तु मान लेते हैं। हमारी दृष्टि इतनी सतही हो गई है कि जहाँ विशुद्ध दाम्पत्य का पावन भाव देखना चाहिए, वहाँ भी हम कामुकता खोजने लगते हैं। इसीलिए तो हमने ऐसी कहानियां गढ़ लीं, यह तो जेठ और भयाहु की प्रतिमा है जो अंतरंग अवस्था में खड़े थे इसीलिए पत्थर के हो गए।
गूढ़ संदेश व्यक्त करती प्रतिमा
किन्तु इन कल्पनाओं से परे, इस प्रतिमा के भीतर निहित गूढ़ अर्थ को समझने का हमने बहुत कम प्रयास किया। वस्तुतः यह शिव और पार्वती के आदर्श दांपत्य का प्रतीक है, जो स्त्री और पुरुष के बीच मित्रता, प्रेम और परस्पर विश्वास का भावपूर्ण रूपक है, वही जो किसी भी सफल और सुदृढ़ विवाह की नींव होता है। ऐसा दांपत्य जिसमें केवल दैहिक निकटता मात्र ही नहीं होती, बल्कि आत्मिक एकत्व भी होता है, जो इस संसार को पूर्णत्व प्रदान करता है।

