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विंध्य की काली खप्पर नृत्य नही. मां काली की ऐसी है आस्था, हाथ में तलवार, जलते अंगारे पर होते है नृत्य

रीवा। विंध्य क्षेत्र (बघेलखंड) में ’काली खप्पर’ एक पारंपरिक आदिवासी नृत्य और धार्मिक अनुष्ठान है, जो मुख्य रूप से चैत्र नवरात्र के दौरान किया जाता है। इसमें नर्तक जलते हुए मिट्टी के पात्र (खप्पर) और तलवार लेकर माँ काली की आराधना में नृत्य करते हैं, जो इस क्षेत्र की अनोखी सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहर का हिस्सा है। यह कोई मनोरंजन का नृत्य नही बल्कि उपासकों की वह आराधना होती है। जिसमें आदिवासी समुदाय के लोग काली खप्पर नृत्य करते हुए मां की आराधना में लीन हो जाते है।

भगत गीत के साथ निकाले जाते है जवारे

चैत्र नवरात्रि में आदिवासी समुदाय नवरात्रि की शुरूआत में ही माता की उपासना करते हुए जवारे तैयार करता है। तैयार हुए जवारे को लेकर अष्टी और नौवी तिथी से उसे जल प्रवाहित करने के लिए टोली बनाकर पूरे आस्था के साथ निकलते है। इस दौरान ढ़ोल की थाप पर भगत गीत से पूरा क्षेत्र गुंजयामान होता है तो काली का मुखौटा पहन कर पुरूष तथा उसके अन्य अनुयायी साथी जलता हुआ अंगरा लेकर माता काली वेश धारी के समक्ष नृत्य करता है, तलवार लिए मां काली का वेश धारी उसी अंदाज में तलवार चलाते हुए नृत्य करता है। मां काली को समर्पित इस नृत्य की छठा और भक्तों की माता के प्रति आस्था देखते ही बनती है। आज भी विंध्य क्षेत्र मां-कामी खप्पर नृत्य की अपनी अनूठी परंपरा कायम है। जो कि इन दिनों पूरे क्षेत्र में सहज ही सुनाई दे जाती है।

मुख्य विवरणः

अवसरः यह मुख्य रूप से नवरात्र में रीवा, सतना (विंध्य क्षेत्र) में होता है।
अनुष्ठानः नर्तक अपने चेहरे पर माँ काली का मुखौटा पहनते हैं और हाथ में जलता हुआ खप्पर लेकर नृत्य करते हैं, जो भक्तों को आकर्षित करता है।
महत्वः यह नृत्य परंपरा और श्रद्धा का प्रतीक है, जिसमें माँ काली की शक्ति की आराधना की जाती है।

विघ्य में काली खप्पर का महत्वं

विद्या (विशेषकर तंत्र विद्या) में काली खप्पर (खोपड़ी) का अत्यधिक आध्यात्मिक और तांत्रिक महत्व है, जो अहंकारी मृत्यु और अज्ञानता पर विजय का प्रतीक है। यह महाकाली की कृपा से आध्यात्मिक सुरक्षा, शत्रु दमन, और नकारात्मक ऊर्जाओं को नष्ट करने का एक अत्यंत जागृत और पवित्र पात्र माना जाता है, जिससे साधक को शीघ्र फल प्राप्त होता है।

काली खप्पर का महत्वः

अहंकार का विनाशः खप्पर यह सिखाता है कि शरीर नश्वर है और अंततः समय के साथ सब कुछ विलीन हो जाता है, जिससे अहंकार और मोहभंग होता है।
शत्रु और नकारात्मकता का दमनः जागृत खप्पर का उपयोग शत्रु दमन, तंत्र बाधाओं और नकारात्मक ऊर्जाओं को नष्ट करने के लिए किया जाता है।
तांत्रिक ऊर्जा का पात्रः तांत्रिक साधनाओं में, गुरु द्वारा अभिमंत्रित खप्पर, महाकाली और भैरव की भेंट स्वीकार करने और शक्ति को धारण करने का पवित्र साधन है।
भय से मुक्तिः माँ काली के इस स्वरूप को पूजने से साधक में निर्भयता, साहस और मानसिक शक्ति का विकास होता है।
मुक्ति का द्वारः खप्पर धारी माता यह दर्शाती हैं कि मृत्यु अंत नहीं, बल्कि मुक्ति का द्वार है।

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