The First Tribal Freedom Fighter of India : 1857 में अंग्रेजों से किसने किया पहला आदिवासी विद्रोह जानें कौन था तिलका मांझी-बाबा तिलका मांझी की 1857 से पहले अंग्रेजों के खिलाफ पहला आदिवासी विद्रोह, जानिए संघर्ष, शौर्य और बलिदान की अमर गाथा-भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल 1857 की क्रांति से शुरू नहीं होता, बल्कि इससे दशकों पहले ही देश की आदिवासी चेतना ने विदेशी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंक दिया था। ऐसे ही एक महान आदिवासी योद्धा थे। बाबा तिलका मांझी (1750–1785) जिन्हें अंग्रेजी शासन के विरुद्ध हथियार उठाने वाले पहले ‘आदि विद्रोही’ के रूप में जाना जाता है। बिहार और झारखंड के संताल परगना क्षेत्र में जन्मे बाबा तिलका मांझी ने ब्रिटिश शोषण, जमींदारी अत्याचार और साहूकारों के अन्याय के खिलाफ लगभग 13 वर्षों तक सशस्त्र संघर्ष का नेतृत्व किया। उनका जीवन साहस, बलिदान और स्वाभिमान की ऐसी मिसाल है, जो आज भी सामाजिक न्याय और स्वतंत्रता की प्रेरणा देता है। बाबा तिलका मांझी का जीवन परिचय,आदिवासी विद्रोह, अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष, ऑगस्टस क्लीवलैंड की हत्या और शहादत की पूरी कहानी पढ़ें। जानिए क्यों उन्हें भारत का पहला “आदि विद्रोही” कहा जाता है।
बाबा तिलका मांझी का प्रारंभिक जीवन
बाबा तिलका मांझी का जन्म 11 फरवरी 1750 को बिहार के सुल्तानगंज के समीप तिलकपुर गांव में एक संताल परिवार में हुआ था। उनका मूल नाम जबरा पहाड़िया था। बचपन से ही वे साहसी,स्वाभिमानी और अन्याय के विरुद्ध विद्रोही स्वभाव के थे। जंगल, पहाड़ और प्रकृति से उनका गहरा जुड़ाव था, जिसने उन्हें एक कुशल धनुर्धर और योद्धा बनाया।
अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह (1771-1784)
18-वीं शताब्दी में अंग्रेजों द्वारा लागू की गई राजस्व नीति, जमींदारी प्रथा और साहूकारों के अत्याचार से आदिवासी समाज बुरी तरह पीड़ित था। जमीन, जंगल और आजीविका छिन जाने से संताल और पहाड़िया समुदाय में आक्रोश फैलने लगा। इसी दौर में बाबा तिलका मांझी ने आदिवासी सरदारों को संगठित कर गुरिल्ला युद्ध की रणनीति अपनाई और अंग्रेजी ठिकानों पर लगातार हमले शुरू किए। उन्होंने रामगढ़ छावनी पर आक्रमण कर अंग्रेजी सत्ता को सीधी चुनौती दी। उनका संघर्ष केवल सैन्य नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और आत्मसम्मान की लड़ाई थी।
कलेक्टर ऑगस्टस क्लीवलैंड की हत्या
1784-में, बाबा तिलका मांझी ने ब्रिटिश अत्याचार के प्रतीक माने जाने वाले राजमहल के कलेक्टर ऑगस्टस क्लीवलैंड को एक जहरीले तीर से मार गिराया। यह घटना अंग्रेजी प्रशासन के लिए बड़ा झटका साबित हुई। इसके बाद अंग्रेजों ने उन्हें पकड़ने के लिए व्यापक अभियान चलाया।
गिरफ्तारी और वीरगति (13 जनवरी 1785)
अंततः विश्वासघात के माध्यम से बाबा तिलका मांझी को गिरफ्तार कर लिया गया। अंग्रेजों ने उन्हें चार घोड़ों से बांधकर घसीटते हुए भागलपुर लाया और 13 जनवरी 1785 को शहर के चौराहे पर बरगद के वृक्ष से लटकाकर फांसी दे दी। उनकी यह शहादत भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अद्वितीय साहस और बलिदान की मिसाल बन गई।
बाबा तिलका मांझी की विरासत और सम्मान
बाबा तिलका मांझी की स्मृति में भागलपुर में तिलका मांझी भागलपुर विश्वविद्यालय की स्थापना की गई है। वहीं झारखंड के दुमका में उनकी भव्य प्रतिमा स्थापित है। आज भी वे आदिवासी समाज के गौरव, संघर्ष और अस्मिता के प्रतीक माने जाते हैं।
निष्कर्ष-बाबा तिलका मांझी केवल एक योद्धा नहीं, बल्कि आदिवासी चेतना, सामाजिक न्याय और स्वाधीनता के अग्रदूत थे। उन्होंने 1857 से बहुत पहले अंग्रेजों के खिलाफ संगठित संघर्ष कर यह साबित कर दिया कि भारत की आत्मा सदैव स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत रही है। उनका जीवन हमें अन्याय के खिलाफ खड़े होने, अपने अधिकारों के लिए लड़ने और आत्मसम्मान की रक्षा करने की प्रेरणा देता है।

