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भारत की किस माँ की कहानी है फिल्म-मदर इंडिया

MOTHER (1)MOTHER (1)

MOTHER (1)

About The Superhit Film Mother India In Hindi: आज आपके लिए लाए हैं ऐसी फिल्म जो सन 1957 में रुपहले पर्दे पर जगमगाई और हर भारतवासी के दिल में घर कर गई क्योंकि इसने जिस प्रेम का हरा भरा पौधा हमें दिखाया उसका बीज हमारे मन में पहले से था और ये बीज रोपने वाली वो औरत थी जिसने हमें जनम दिया था जिसे हम पूजते थे और वो जिसे पूजती थी ,वो थी उसकी मातृ भूमि ,जिसकी मिट्टी पे ,मर मिटने की उसने ठानी थी जी हाँ ये थी हमारी आपकी यानी भारत की माँ (Mother India)। ये वही माँ थी जिसके लिए,लाज ,ईमान और मेहनत ही उसका धरम था जो गाती थी ,”दुनिया में हम आए हैं तो जीना ही पड़ेगा जीवन है अगर ज़हर तो पीना ही पड़ेगा …” आगे तो आपने सुना ही होगा नहीं सुना है तो ज़रूर सुनिएगा , मदर इंडिया फिल्म में जिसकी आज हम बात कर रहे हैं ,इसके संवाद लिखे हैं वजाहत मिर्ज़ा और एस अली रज़ा ने। निर्माता और निर्देशक हैं महबूब ख़ान। फ़िल्म में नर्गिस, सुनील दत्त, राजेंद्र कुमार, राज कुमार, कन्हैया लाल और कुमकुम ने मुख्य भूमिकाएँ निभाई हैं।


महबूब ख़ान ने ‘मदर इंडिया’ को अपनी 1940 की फिल्म ‘औरत’ के रीमेक के तौर पर बनाया था। फ़िल्म का शीर्षक अमरीकी लेखिका कैथरीन मायो की 1927 में लिखी किताब ‘मदर इण्डिया’ से लिया गया है। कहानी लिखी है बाबूभाई ए मेहता। फिल्म के गीत लिखे हैं शकील बदायूँनी ने संगीत नौशाद का है और इन नग़मों को आवाज़ दी है लता मंगेशकर , मोहम्मद रफ़ी ,आशा भोसले ,शमशाद बेगम, मन्ना डे ,मीना मंगेशकर और ऊषा मंगेशकर ने। शमशाद बेगम की आवाज़ में होली के गीत का तो आज भी कोई जवाब नहीं जी हाँ ‘होली आई रे कन्हाई रंग छलके सुना दे ज़रा बाँसुरी ….’

फिल्म की कहानी हमारी ज़ुबानी :-

फिल्म की शुरुआत आधुनिक भारत में प्रवेश कर चुके गाँव के दर्शन से होती है जहाँ नहर का काम पूरा हो गया है और राधा यानी नायिका नर्गिस,अपने बेटे और गाँव वालों के बहुत मनाने के बाद जीप में बैठकर गाँव की माँ के रूप में, नहर का उद्घाटन करने आती है पर नहर के खुलते ही उसके जोशीले चमकदार पानी के बहाव को देखकर बीते हुए लम्हों में खो जाती है जब वो, शामू यानी नायक ,राज कुमार की नई नवेली दुल्हन बनके इस गाँव में आई थी।


बड़ी धूम धाम से हुई इस शादी के पूरे गांव में चर्चे हो रहे थे कि तभी राधा के कानों में भनक पड़ गई कि इस शादी का ख़र्चा राधा की सास ने सुखीलाला से उधार लेकर उठाया है और बस उसी क्षण से राधा की खुशियों पर मानों ग्रहण लग गया , वो अपने ज़ेवर उतारकर रख देती है और बस लाला का क़र्ज़ उतारने के लिए दिन रात मेहनत करने में जुट जाती है ताकि लाला से लिया क़र्ज़ चुका सके ,उसकी मेहनत से फसल भी अच्छी हुई पर ब्याज बढ़ता गया ,तो सूत की रकम और क़र्ज़ के 500 वहीं के वहीं रहे जिससे राधा और उसका परिवार ग़रीबी से जूझते हुए सुखीलाला के बनाए चक्रव्यूह में फँसता चला जाता है और जब शामू उधार के पैसों में अपना सब दे देने के बाद लाला से सवाल -जवाब करने गया तो मामला पंचों तक पहुंच गया और गाँव के सरपंच भी सुखीलाला के हक़ में फैसला सुनाते हुए बोले शामू और राधा को अपनी फ़सल का एक तिहाई हिस्सा सुखीलाला को ₹ 500के ब्याज़ के तौर पर देना ही होगा हालांकि पूरे गाँव में ही कोई कुछ भी पढ़ा लिखा नहीं था इसलिए सुखीलाला के मूलधन और ब्याज को समझना किसी के बस की बात नहीं थी।


राधा अब तक दो बच्चों की माँ बन चुकी थी लेकिन कभी अपनी ज़िम्मेदारियों से पीछे नहीं हटी थी वो अपने बच्चों को गाँव के पंडित जी के पास चार अक्षर पढ़ाने भी ले गई जिससे बड़ा बेटा तो कुछ सीख भी गया लेकिन छोटा बेटा बिरजू तो सिवाए शरारत करने ,और लाला को परेशान करने के अलावा कुछ नहीं जानता था।धीरे – धीरे राधा के घर के ऐसे हालात आ जाते हैं कि सब कुछ उन्हें सुखीलाला को देना पड़ जाता है फिर भी उनका ब्याज नहीं खत्म होता और उनके अपने खाने के लिए भी कुछ नहीं बचता ऐसे में राधा शामू से अपनी दूसरी मगर बंजर ज़मीन की जुताई करने को कहती है ये जानते हुए कि वो बड़े बड़े चट्टान नुमा पत्थरों से भरी पड़ी है दोनों उसकी जुताई की कोशिश करते हैं और अपने बैलों के साथ चट्टान को खींचने में लग जाते हैं लेकिन बैल भी हिम्मत हार कर दम तोड़ देते हैं अब और ग़रीबी आ जाती है जिसका सुखीलाला मज़ाक उड़ाता है राधा के परिवार को एक- एक दाने के लिए तरसना पड़ता है ,दो छोटे बच्चे ,उनकी दादी और शामू सबको थोड़ा थोड़ा खाकर गुज़ारा करना पड़ता है, ऐसे ही एक दिन सुखीलाला के पास सबकुछ गिरवी रखने के बाद चार दाने मिले थे उसे भी शामू गुस्से में आकर फेंक देता है और मिट्टी के बर्तनों में रखा खाना बर्तन टूटने की वजह से बिखर जाता है जिन्हें राधा शामू के क़दमों में गिर कर और अन्न को ढंंक कर ये कहते हुए बचाती है कि मेरे बच्चे भूखे हैं और फिर शामू को अपने सारे ज़ेवर दे देती है कि अब इन्हें भी बेचकर एक जोड़ी बैल ले आओ पर शामू बस उसके ज़ेवरों को हाँथ नहीं लगाना चाहता था इसलिए अब तक बचा के रखे थे पर आज वो बहुत मजबूर था राधा की बात मानने के लिए फिर भी जाते जाते एक कंगन उसके हाथों में डाल जाता है और बाक़ी ज़ेवर बेचकर एक जोड़ी बैल ले आता है।

इसके बाद दोनों लग जाते हैं खेत जोतने में पर फिर भी चट्टान नहीं हटती और उल्टा वो खिसक के शामू के हाँथ में ही गिर जाती है जिससे उसके दोनों हाँथ बेकार हो जाते हैं।अब सुखीलाला शामू का और मज़ाक उड़ाता है ये कहकर कि वो बीवी की कमाई खा रहा है , ग़ैरतमन्द शामू ये बर्दाश्त नहीं कर पाता और ये सोचकर कि अब वो अपने परिवार के किसी काम का नहीं रहा उल्टा बोझ बन गया है ,रात के अँधेरे में उन्हें छोड़ कर हमेशा के लिए चला जाता है ,राधा और उसकी सास उसे बहोत ढूँढती हैं पर वो कहीं नहीं मिलता इसके बावजूद राधा को ये भरोसा होता है कि वो लौट आएगा। कुछ वक़्त बाद ही राधा की सास गुज़र जाती है फिर भी राधा अपने दोनों बेटों के साथ खेतों में काम करना जारी रखती है और एक और बेटे को जन्म देती है। सुखीलाला उसे अपनी ग़रीबी दूर करने के लिए खुद से शादी करने का प्रस्ताव रखता है पर राधा खुद को बेचने से इंकार कर देती है।

इसके बाद आँधी तूफ़ान लिए बाढ़ आती है और पूरे गाँव को अपनी चपेट में ले लेती है जिससे सारी फ़सलें बर्बाद हो जाती हैं ,घर ढह जाते हैं सब कुछ तबाह हो जाता है, राधा एक मचान बनाकर उसे एक तरफ से अपने कंधे से थामे बच्चों को बाढ़ के पानी और साँप से बचाती है लेकिन इन हालात में राधा का छोटा बेटा भूख प्यास से दम तोड़ देता है ,पानी निकलने के बाद घर कीचड़ और दलदल में तब्दील हो जाता है जहाँ लाला तब भी आता है राधा को आसरे की पेशकश करने ,उसके और बच्चों की जान बचाने की बात करने लेकिन राधा नहीं मानती ,उसका लाया चना भी फ़ेंक देती है पर फिर उसकी नज़र पड़ती है अपने उस बच्चे पर पड़ती हैं जो कीचड़ से चने बीनकर खाना चाहता है पर माँ के डर से नहीं खाता ये देखकर राधा मजबूरी में लाला के दरवाज़े पर पहुँच जाती है मगर एक भारतीय नारी की तरह देवी माँ को अपनी लाज रखने का हवाला देते हुए इसके बाद लाला का उसकी इज़्ज़त पे पहला वार ही उसके शादीशुदा होने की निशानी यानी मंगलसूत्र पर होता है जिसकी रक्षा स्वयं देवी माँ करती है और वो लाला के फेकने के बाद भी ज़मीन में नहीं गिरता बल्कि देवी माँ के गले में चढ़ जाता है ये देखकर राधा समझ जाती है कि अभी भी वो अपना धर्म निभा सकती है उसे हारना नहीं है और वो लाला के चंगुल से भाग आती है फिर सारा गाँव पलायन करने लगता है पर राधा अपना घर छोड़ने को राज़ी नहीं होती कंदमूल खिलाके बच्चों की भूख मिटाती है , गाँववालों को भी मना लेती है दोबारा गाँव बसाने के लिए और फिर लहलहाते खेतों के बीच फ़िल्म कई साल आगे पहुँचती है जब राधा के दोनों बेटे, बिरजू (सुनील दत्त) और रामू (राजेंद्र कुमार) अब बड़े हो चुके है और माँ की गोद में सर रखकर बैलगाड़ी में चले जा रहे है और सब गा रहे हैं- दुख भरे दिन बीते रे भइया बीते रे भइया… .

राधा बिरजू और रामू के साथ

बिरजू सुखीलाला के बर्ताव का प्रतिशोध लेने के लिए गाँव की लड़कियों को छेड़ना शुरू कर देता है, ख़ास कर सुखीलाला की बेटी को तो दूसरी तरफ रामू बेहद शांत स्वभाव का है और चंपा यानी अभिनेत्री कुमकुम के प्यार में पड़ कर माँ की मर्ज़ी से जल्द ही शादी भी कर लेता है। लेकिन जब तक वो बाप बनता है फिर ग़रीबी उसके परिवार को घेर लेती है लाला पाई -पाई समेट ले जाता है यहाँ तक कि उसकी माँ के गहनों में वो आखरी कंगन भी जिसे राधा ने आज तक संभाल कर रखा था इस बात से बिरजू का ग़ुस्सा ख़तरनाक रूप ले लेता है और वो सुखीलाला और उसकी बेटी पर हमला कर देता है फिर उसे गाँव से निकाल दिया जाता है, जिस पर बिरजू कहता है कि वो लाला की बेटी की शादी नहीं होने देगा और डाकुओं का सरगना बन जाता है।

अब लाला भी अपनी इज़्ज़त की भीख माँगते हुए राधा के चरणों में अपनी पगड़ी रख देता है और राधा बड़े भरोसे से कहती है कि बिरजू उसका बेटा है इसलिए वो किसी को कोई नुकसान नहीं पहुँचाएगा गाँव की इज़्ज़त उसकी इज़्ज़त है लेकिन सुखीलाला की बेटी की शादी के दिन बिरजू बदला लेने वापस आता है और सुखीलाला से अपनी माँ का कंगन छीनता है ,सभी बही खाते जला देता है ताकि गाँव के किसी इंसान के उधार और ब्याज का कोई रिकॉर्ड ही नहीं रहे और फिर सुखीलाला को मार कर मंडप से उसकी बेटी को भगा ले जाने की कोशिश करता है। राधा,उसे रोकने की बहोत कोशिश करती है चंपा और रामू भी (ये सीन बेहद भावुक है और माँ के साथ भाई और भाभी का प्यार भी ऐसा है जिसके लिए आँखे तरस जाएँ ) मगर बिरजू नहीं मानता और आख़िर में राधा बिरजू का रास्ता रोकते हुए उसे गोली मार देती है और बिरजू माँ को उसका कंगन सौंपते हुए राधा की गोद में दम तोड़ देता है। फ़िल्म वर्तमान काल में आ जाती है और राधा को नहर का पानी लाल रंग में दिखने लगता है जो धीरे धीरे खेतों में पहुँच जाता है, जहाँ फिल्म समाप्त लिख कर स्क्रीन पर आ जाता है पर दिल कहता है ये भारत की हर उस माँ की कहानी है जिसके लिए दुश्मन की भी इज़्ज़त, उसकी इज़्ज़त है और वो किसी को उस इज़्ज़त आबरू से खिलवाड़ नहीं करने देगी भले ही वो उसकी खुद की औलाद ही क्यों न हो।

फिल्म की कुछ दिलचस्प बातें :-

इस फिल्म की शूटिंग इसकी स्क्रिप्ट फ़ाइनल हो जाने से पहले ही शुरु हो चुकी थी दरअसल फिल्म की कहानी में थोड़े फेर बदल हो रहे थे तभी 1955 में उत्तरप्रदेश में बाढ़ आ गई थी और फिल्म में इस बाढ़ का सीन शायद दिखाना पड़े ये सोचकर महबूब ख़ान ने फ़िल्म के लिए बाढ़ के दृश्य को फ़िल्माने के लिए टीम वहाँ भेज दी थी जिसने फिल्म में बाढ़ की भयावहता को हूबहू परदे पर उकेर दिया , फिल्म की बाकी की शूटिंग महाराष्ट्र के कुछ गाँव में और कुछ महबूब स्टूडियो में हु्ई थी।

पहले बिरजू के किरदार के लिए अभिनेता जगदीप को लिया गया था उन्होंनें कुछ दिन तक फिल्म की शूटिंग भी की. लेकिन महबूब खान को लगा कि उनके चेहरे पर वो ग़ुस्सा नहीं आ रहा है और इस लिए फिर सुनील दत्त का नाम लिया गया हालाँकि बिरजू की भूमिका निभाने की ख्वाहिश मशहूर अभिनेता दिलीप कुमार ने भी ज़ाहिर की थी लेकिन वो फिल्म में कुछ बदलाव के साथ अपना रोल और दमदार बनाना चाहते थे इस पर पहले तो मेहबूब ख़ान ने हामी भर दी थी लेकिन मुख्य अभिनेत्री नरगिस ने निर्देशक महबूब ख़ान को याद दिलाया कि दर्शकों ने दिलीप कुमार और नरगिस की रोमांटिक जोड़ी खूब देखी और पसंद की है इसलिए इस बार माँ बेटे के किरदार में हम दोनों का आना शायद उन्हें अच्छा न लगे इसलिए फिर महबूब ख़ान ने दिलीप साहब से कहा कि उनकी फिल्म नारी प्रधान है इसी वजह से उसका नाम ‘मदर इंडिया ‘है ,वो उसके बेटे के किरदार को उससे ज़्यादा प्रभावशाली बनाकर सन इंडिया नहीं बनाना चाहते ,और आखिरकार सुनील दत्त के नाम पर मोहर लगी।


एक कमाल की बात और कि फिल्म में फसलों में आग लगने का एक दृश्य है जिसमें राधा ,बिरजू को ढूँढती है , जिसकी शूटिंग के दौरान नरगिस सच में आग में घिर गई थीं और सुनील दत्त ने अपनी जान की परवाह किए बग़ैर नरगिस को आग से बचाया था जिसके चलते नरगिस और सुनील दत्त में प्यार हो गया, जिसकी भनक निर्देशक महबूब खान को भी जल्द लग गई थी और उन्होंनें दोनों को ये बात फ़िल्म रिलीज़ होने तक छुपा कर रखने के लिए कही थी क्योंकि फ़िल्म में दोनों माँ -बेटे का किरदार निभा रहे थे ख़ैर दोनों का प्यार परवान चढ़ा और अगले साल 1958 में दोनों ने शादी कर ली।

एक और दिलचस्प क़िस्सा जुड़ा है इस फ़िल्म के साथ और वो है बिरजु के बचपन का किरदार निभाने वाले मास्टर साजिद ख़ान के बारे में । जिस पर महबूब खान की नज़र जब पड़ी तो वो मुंबई की बस्ती में रहने वाला बिन माँ -बाप का बच्चा था जिसका बेबाक अंदाज़ महबूब खान को इतना पसंद आया कि उन्होंने उसे फिल्म में बिरजू के बचपन के चंचल ,शरारती किरदार को निभाने के लिए ले लिया था जो कभी नाचता था कभी लाला की छड़ी चीन लेता था ,जब फ़िल्म का काम शुरू हुआ तब साजिद की उम्र महज़ चार साल थी। लोगों को फ़िल्म में साजिद का काम ख़ास तौर पर पसंद आया और इसके बाद इस बच्चे की ज़िंदगी भी सँवर गई क्योंकि निर्देशक महबूब खान ने साजिद को गोद ले लिया था।

1958 में भारत की ओर से इस फिल्म को ऑस्कर के लिए भी भेजा गया था जहाँ ये मात्र एक वोट से विदेशी भाषा की सर्वश्रेष्ठ फिल्म का अवॉर्ड पाने से चूक गई थी। मदर इंडिया फिल्म के संगीत में नौशाद ने पहली बार हॉलीवुड ऑरकेस्ट्रा का इस्तेमाल किया था ।

ये फ़िल्म अबतक बनी सबसे बड़ी बॉक्स ऑफिस हिट भारतीय फ़िल्मों में गिनी जाती है। इसे 1958 में तीसरी सर्वश्रेष्ठ फीचर फ़िल्म के लिए राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार से नवाज़ा गया था। ‘मदर इंडिया’ ,उन चुनिन्दा फ़िल्मों में आती है जिन्हें आज भी लोग देखना पसंद करते हैं और ये हिन्दी सांस्कृतिक फ़िल्मों की श्रेणी में विराजमान है , आपको ये भी बता दें कि ये फ़िल्म भारत की ओर से पहली बार अकादमी पुरस्कारों के लिए भेजी गई फ़िल्म थी।

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