Interesting Story Of Tea: बात ख़ुशी की हो या ग़म की हर बात पे हम कहते हैं चलो एक कप चाय हो जाए ! कुछ अच्छा लगेगा ,हम ख़ुश होंगे तो और जोश आ ही जाएगा ,हम थके भी होंगे तो भी एनर्जी आ जाएगी ,किसी बात का दुख भी होगा तो जानें क्यों चाय की गर्माहट भरी चुस्कियों में थोड़े आँसू सूख ही जाएँगे। कहने का मतलब ये है कि आज हमारी लाइफस्टाइल का अहम हिस्सा है चाय। सुबह उठते ही सबसे पहले हम भारतीय चाय पीते हैं , एक एनर्जी ड्रिंक की तरह ,और ये चलन भी आज का नहीं बल्कि सदियों पुराना है , जिसे हम भारतवासी ही नहीं बल्कि विश्व के कई देश फॉलो करते हैं और चाय का लुत्फ़ लेते हैं पर अपने -अपने अलग अंदाज़ में जिसमें इसे बनाने का तरीक़ा ही नहीं नाम भी बदल जाता है और अब तो सर्दियों ने दस्तक दे दी है तो ठंड का बहाना काफ़ी है बार-बार चाय पीने के लिए तो आइये ज़रा ग़ौर करते हैं इसके प्रचलित नाम “चाय” पर आख़िर इसे चाय क्यों कहते हैं !क्या ये जहाँ से आए है उससे कुछ मिलता -जुलता है ,इसका नाम ! तो अंदाज़ा लगाते -लगाते जब आप दिमाग़ी घोड़े दौड़ाते हुए कई देशों की यात्रा करेंगे तो सबसे क़रीबी नाम आपको चीन ही लगेगा जो वाक़ई इसकी जन्म भूमि है जी हाँ चाय का अविष्कार चीन में ही हुआ था लेकिन फिर ये भारत और कई देशों में कैसे पहुंच गई ये सोचने वाली बात है।
इत्तेफ़ाक़ से बनीं चाय :-
जब चाय नहीं थी तो थोड़ी गर्माहट पाने के लिए लोग गर्म पानी पी लेते थे, तो ऐसे ही कहते हैं कि क़रीब 2700 ईसापूर्व ‘शेन नुंग ‘जो चीनी शासक थे एक दिन बाग़ीचे में बैठे गर्म पानी पी रहे थे, तभी एक पेड़ की पत्ती अचानक उस पानी में आ गिरी जिससे उसका रंग बदल गया और एक दिलकश महक भी आने लगी पानी से, अब राजा जी ने पानी फेंकने की बजाय उसे चख लिया और जो लज़्ज़त उस पानी में आई उसने उन्हें मजबूर कर दिया, उसमें शक्कर मिलाने के लिए और इस तरह ज़ायका बढ़ गया और चाय बन गई। चाय से जुडी एक और कहानी है कि छठवीं शताब्दी में चीन के ही हुनान प्रांत में भारतीय बौद्ध भिक्षु बोधिधर्म ध्यान साधना करते थे वो भी बिना सोए, दिन रात जागकर और वो जागते रहने के लिए कुछ पत्तियाँ चबाते रहते थे , ये वही पत्तियाँ थीं जिन्हें बाद में चाय की पत्तियों के नाम से जाना गया।
भारत में चाय कैसे आई :-
दरअसल ब्रिटेन के बाज़ारों में चाय की मांग को पूरा करने के लिए 1824 में बर्मा (म्यांमार) और असम की सीमांत पहाड़ियों पर चाय के पौधे उगाए जाते थे , लेकिन सूचीबद्ध तरीक़े से चाय उत्पादन की शुरुआत अंग्रेज़ों ने 1836 में भारत और 1867 में श्रीलंका में की और खेती के लिए शुरुआत में वो बीज चीन से ही लाते थे पर फिर असम से भी बीज मँगाने लगे हालाँकि उन्नीसवी शताब्दी के उत्तरार्ध तक भारत में चाय की खपत न के बराबर ही आँकी गई थी।
चाय की भी हैं कई वेराइटियाँ :-
जब चाय की पत्तियों की पहचान हो गई तो इसके प्रकार को भी परखा गया जिसमें सामने आई वाइट ,ग्रीन ,ओलांग ,ब्लैक और हर्बल। तो पहले बात करते हैं , वाइट टी की जो सबसे शुद्ध मानी जाती है क्योंकि ये सबसे कम प्रोसेस्ड होती है। ग्रीन टी की बात करें तो ये पूरे एशिया में पसंद की जाती है और हेल्थ के लिए अच्छी मानी जाती है खासकर वज़न घटाने के लिए। ओलांग टी एक चीनी चाय है जो आज भी अपना शुरआती ज़ायका बरक़रार रखे हुए है और आपको चीनी घरों के अलावा चाइनीज़ रेस्त्रां में आसानी से मिल जाएगी। ब्लैक टी थोड़ा डार्क कलर देती है और आप अपनी मर्ज़ी से इसे विथ मिल्क या विदाउट मिल्क पी सकते हैं। हर्बल टी की बात करें तो ये सिर्फ चाय की तरह पी जाती है इसलिए इसे टी कहते हैं जबकि इसमें में किसी भी प्रकार की चाय की पत्तियों का इस्तेमाल नहीं होता।
क्षेत्र के नाम पर पहचानी गयी चाय :-
चाय को खेती की जगह के हिसाब से बाँटा जाता है जिसमें कुछ देशों की चाय के नाम उनके नाम पर ही है जी हाँ , चीनी, जापानी, श्रीलंका, इंडोनेशिया और अफ्रीकन चाय। चाय अपने क्षेत्रों के मुताबिक ही पसंद भी की जाती हैं , जैसे भारत में दार्जिलिंग, असम और नीलगिरी की चाय का चलन है ,श्रीलंका में अपने उत्पादक ज़िले का नाम और खुशबू समेटे उवा और डिम्बुला चाय ज़्यादा पसंद की जाती है , चीन के अन्हुई प्रांत के कीमन क्षेत्र की कीमुन चाय और जापान की एंशु चाय, अपनी जगह की ख़ासियत लिए अपने -अपने स्वाद के लिए जानी जाती है।
क्यों उगाई अंग्रेज़ों ने अपनी चाय पत्ती :-
अंग्रेज़, ब्रिटिश बाज़ार में चाय की बढ़ती मांग को देखते हुए इसकी आपूर्ति में कोई बाधा नहीं चाहते थे इसलिए उन्होंने इस पर चीन का एकाधिकार समाप्त करने के लिए भारत में अपनी चाय की खेती शुरू की। हालाँकि चाय बाग़ानों पर ईस्ट इंडिया कंपनी के वर्चस्व और स्वामित्व को ख़त्म करने के लिए असम के व्यापारी संघ ने 1839 में असम टी कंपनी की स्थापना की और 1911 में टोकलाई चाय अनुसंधान केंद्र की स्थापना की गई जो आज भी भारत का सबसे पुराना चाय अनुसंधान केंद्र है। आखिर में हम आपको बता दें कि आज भी हम में से ज़्यादातर लोग अंगेज़ों के तरीके से ही चाय चाय बनाते हैं
